दिवेर का युद्ध – एक युग प्रवर्तक संग्राम का विस्मरण

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दिवेर के स्मारक पर महाराणा प्रताप के चरणों में लेखक ।

वैसे तो हिन्दुओं की सामूहिक चेतना में दिवेर नाम के स्थान का कोई बोध ही नहीं है , परन्तु यदि गूगल पर भी जाएँ तो दिवेर का द्वितीय युद्ध ही प्रगट होता है जहाँ महाराणा अमर सिंह ने मुग़ल घुसपैठिए जहांगीर को पराजित किया था । 

वास्तविक महत्व का युद्ध था दिवेर का पहला युद्ध जो कि मेवाड़ के महाराणा प्रताप सिंह व सुल्तान खां के नेतृत्व में मुग़ल सेना के बीच लड़ा गया । यह युद्ध हल्दीघाटी ( 1576 ) के सात वर्षों बाद दिवेर की घाटी में हुआ जहाँ प्रताप ने मुग़लों को निर्णायक रूप से पराजित कर 36,000 यवनों को मौत के घाट उतार कर पूरे मेवाड़ से मुग़ल ज़ख़ीरे को मटियामेट कर दिया । 

यह लेख इस महान युद्ध के तथ्यों पर नहीं लिखा जा रहा । वह भिन्न विषय है ।

यह लेख, लेखक द्वारा चार भिन्न स्त्रोतों, दिवेर की व्यक्तिगत यात्रा तथा तत्कालीन शिलालेखों से ऐतिहासिक प्रामाणिकता सिद्ध करने के बाद इसलिए लिखा जा रहा है कि दिवेर जितने महत्वपूर्ण युद्ध को हमारी शिक्षा प्रणाली, इतिहास व सार्वजनिक जीवन से क्यूँ पोंछ दिया गया । 

क्या कारण है कि वामपंथी इतिहासकारों, तथाकथित बुद्धिजीवियों, व विचारकों ने एक क्रान्तिकारी युद्ध को हमारी सामूहिक स्मृति से ही मिटा दिया है ? 

इस पर हम चर्चा करेंगे किंतु पहले कुछ तथ्यों द्वारा दिवेर की सत्यता स्थापित कर लेते हैं। 

पहला, अंग्रेज़ इतिहासकार जेम्स टॉड लिखता है कि दिवेर का युद्ध ही वह युद्ध था जिसमें मुग़लों पर हिन्दुओं ने निर्णायक विजय पताका लहरा दी ।

जिस प्रकार ग्रीक इतिहास में मैराथन की लड़ाई हुई , जिसमें ग्रीक सेना ने फ़ारस की सेना को पूरी तरह पराजित किया था इसी प्रकार दिवेर को भी टॉड Battle of Marathon of Mewar की संज्ञा देता है । 

टॉड के शब्दों में : “ दिवेर की नाल में प्रताप ने मुग़ल सेना को भी गाजर मूली की तरह काट डाला । भगोड़ों का आमेट तक पीछा कर के सारे ज़ख़ीरे को मौत के घाट उतार दिया।कोमलमेर में अब्दुल्ला व उसकी सेना निर्ममता से काट डाली गई ।

उदयपुर से तो मुग़ल सेना भाग ही खड़ी हुई।  चित्तौड़ के अतिरिक्त पूरा मेवाड़ प्रताप ने जीत लिया।

प्रताप के प्रतिशोध ने मेवाड़ को मरुस्थल बना दिया। “ 

दूसरा, दिवेर का युद्ध ही वह युद्ध है जहाँ के लिए भामाशाह ने अपने जीवन की पूरी संपत्ति महाराणा प्रताप को अर्पित कर दी । 

भामाशाह का नाम तो वाम पंथी छुपा न पाए,  पर दिवेर का सत्य चबा गए ।

तीसरा, दिवेर के युद्ध में ही वह प्रसिद्ध प्रकरण घटा जहाँ बहलोल खां नाम के मुगल सिपहसलार को प्रताप ने घोड़े सहित काट डाला था ।

चौथा, भिन्न भिन्न कालखंडों में इतिहासकारों द्वारा दिवेर का युद्ध वर्णित है जिनमें कर्नल टॉड के अतिरिक्त मुख्य हैं रणछोड़ भट्ट तैलंग द्वारा लिखित ‘ राज प्रशस्ति ‘ तथा कविराज श्यामलदास जी द्वारा रचित ‘ वीर विनोद ‘ । कई आधुनिक इतिहासकारों ने भी दिवेर का विस्तृत वर्णन किया है । 

द्विवेर का तिथिक्रम – विजय दशमी १६४० तदनुसार, 16 सितम्बर 1583 । 

द्विवेर युद्ध का निर्णय – मेवाड़ की निर्णायक जीत 84 मुगल चौकियां ध्वस्त की गईं, व 36 थाने मेवाड़ से उठ गए ,कुम्भलगढ़ पर पुनः प्रताप ने कब्जा किया तथा केवल चितौड़ व मांडल गढ़ को छोड़ कर सम्पूर्ण मेवाड़ पर प्रताप का आधिपत्य हो गया ।( राज प्रशस्ति ग्रंथ ) 

राजस्थान विश्वविद्यालय के शीर्षस्थ इतिहासकार स्व० डॉ गोपीनाथ लिखते हैं –

‘ दिवेर की विजय महाराणा के जीवन का उज्ज्वल कीर्तिमान था । हल्दीघाटी का जो नैतिक विजय व परीक्षण युद्ध था, वहाँ दिवेर का युद्ध एक निर्णायक युद्ध सिद्ध हुआ । 

इसी विजय के फल स्वरूप सम्पूर्ण मेवाड़ पर महाराणा का अधिकार स्थापित हो गया ।इस युद्ध के पश्चात मुगल सैनिक हतोत्साहित हो गए ।हल्दीघाटी युद्ध मे बहे राजपूतों के रक्त का बदला दिवेर में चुकाया गया।

दिवेर  की विजय ने यह प्रमाणित कर दिया कि महाराणा प्रताप का शौर्य, संकल्प और वंश गौरव अकाट्य और अमिट है, जिसने त्याग व बलिदान से सत्ता वादी नीति को परास्त किया । ‘

किन्तु यदि एक सरल तर्क से भी देखा जाए तो भी दिवेर का युद्ध हिन्दू मुस्लिम संघर्ष में एक निर्णायक मोड़ का महत्व रखता है । 

यदि हल्दीघाटी का युद्ध ही निर्णायक होता तो हम हिन्दू होते ही कैसे ? यदि प्रताप के जीवन पर छापामार युद्ध करते हुए भटकते ही रहे थे तो उस काल में प्रताप के नाम के सिक्के व ज़मीनों के अधिकार के ताम्रपत्र कैसे मिलते हैं ? 

यदि हल्दीघाटी का युद्ध अनिर्णीत रहा ( जो कि विवादित है ) तथा प्रताप अरावली के जंगलों में आश्रयहीन भटकते रहे तो मेवाड़ में हिन्दू बचा कैसे ? मेवाड़ में हिन्दुओं का नरसंहार क्यूँ नहीं हुआ ? मेवाड़ के मन्दिर कैसे अक्षुण्ण रहे ? मेवाड़ में हिन्दुओं का जबरन धर्मान्तरण क्यूँ नहीं हुआ ? 

दिवेर के संग्राम में हिन्दुओं की निर्णायक विजय ही वह कारण रही कि ना केवल मेवाड़ बल्कि समूचे भारतवर्ष में हिन्दू धर्म बच गया । 

दिवेर की विजय से ही वह नींव पड़ी जिसके चलते उत्साह व संसाधन से सुसज्जित मेवाड़ की सेना ने आने वाली पीढ़ियों में जहांगीर को महाराणा अमर सिंह व औरंगज़ेब को महाराणा राज सिंह जी ने धूल चटाई । 

तो दिवेर का युद्ध किस षड़यन्त्र के चलते हिन्दू चेतना से मिटा दिया गया ? 

क्या कारण है कि दिवेर का युद्ध NCERT की पुस्तकों में वर्णित ही नहीं है ? 

क्यूँ प्रताप के शौर्य व स्वाधीनता के संकल्प को लघु कर के उन्हें एक पराजित योद्धा के रूप में स्थापित किया गया ? 

मेवाड़ को एक स्वतंत्र, संप्रभु राज्य ना दिखाकर केवल काल्पनिक मुग़ल सल्तनत का विद्रोही राज्य दिखाने के पीछे इस देश के इतिहासकारों का मन्तव्य क्या था ? 

इन मौलिक प्रश्नों का अन्वेषण हमें करना ही होगा, अन्यथा हम अपने स्वर्णिम इतिहास को तो झुठालाएंगे ही, हमारी अमूल्य धरोहर को भी सदा के लिए गँवा देंगे । 

पहला कारण जो स्पष्ट दिखता है वह यह है कि अंग्रेज़ों से स्वतन्त्रता के पश्चात् 1947- 1977 के कालखंड में चार मुसलमान ; अबुल कलाम , नूरुल हसन, फक्कुद्दीन अली अहमद व हुमांयू कबीर भिन्न भिन्न समय पर भारत के शिक्षा मंत्री रहे ।

क्या ये चारों अपनी मुस्लिम निष्ठा के चलते दिवेर का युद्ध व उसके बाद मेवाड़ के राणाओं के पराक्रम का पूरा इतिहास ही छुपा गए ? 

दुर्भाग्य से, क्यूँकि स्वतंत्र भारत की बागडोर एक स्वघोषित वामपंथी जवाहर नेहरू के हाथों में थी, उसने रोमिला थापर व इरफ़ान हबीब सरीखे वामपंथियों व छद्म जेहादियों को ही प्रश्रय देकर इस छल को बढ़ाया । 

प्रताप के शौर्य को बौना कर, विदेशी मुग़ल आक्रान्ताओं का असत्य महिमामन्डन हिन्दुओं को हीन भावना से भरने का कुचक्र नहीं तो और क्या था ! 

दूसरा, एक सभ्यतागत झूँठ जो वामपंथियों द्वारा गढ़ा गया व प्रचारित किया गया वह था कि ; हिन्दू एक सहस्त्र वर्षों तक मुसलमानों के दास रहे । 

यदि इस झूठ को स्थापित करना था तो यह आवश्यक था कि हिन्दुओं की विजय गाथा व मुसलमानों की पराजय को इतिहास में वर्णित ही नहीं किया जाए ।

इसीलिये ना केवल दिवेर का युद्ध या मेवाड़ के राजघराने का बलिदान, बल्कि बाप्पा रावल, पृथ्वीराज चौहान, विजयनगर साम्राज्य, आसाम के राजा लाछित, वीर दुर्गादास राठौड़, छत्रपति शिवाजी महाराज, मराठों का पराक्रम, तथा अनेकानेक हिन्दू विजय को या तो लघु कर दिया गया या पोंछ दिया गया । 

बहुत चतुराई से वामपंथियों ने केवल इस्लामी इतिहासकारों जैसे कि अबुल फ़ज़ल या अल बदायूंनी को उद्धृत करते हुए भारतीय इतिहास हमें पढ़ाया । हिन्दू साहित्य व इतिहासकारों की पूर्ण उपेक्षा कर दी गई । यद्यपि दर्जनों इतिहासकारों ने मेवाड़ के युद्धों का विस्तारपूर्वक वर्णन किया है । 

इतिहास का संकलन, आकलन व शिक्षा बहुत गंभीर विषय हैं । जो समाज अपने इतिहास के साथ खिलवाड़ करते हैं, इतिहास उनके साथ भी खिलवाड़ करता है । 

तीसरा कारण यह हो सकता है कि जब इस्लामी आतंकी तलवार के बल पर हिन्दुओं से नहीं जीत पाए तो इन्होंने वामपंथियों व कांग्रेसियों से गठजोड़ करके हमारे गौरवशाली साहित्य को ही मिटा डाला , जिससे कि इस्लामी प्रसारवाद बिना संघर्ष के ही विजयी होता चला जाए । 

इसलिए हिन्दू समाज के लिए यह अत्यधिक महत्वपूर्ण हो जाता है कि दिवेर के युद्ध की ऐतिहासिक सत्यता पूरी निष्पक्षता से स्थापित करके हिन्दू समाज को इस अमर शौर्य गाथा का वर्णन किया जाए । 

तभी और केवल तभी हिंदू समाज उस तामसिक निंद्रा से जाग सकता है जिसमें वामपंथियों के दुष्प्रचार ने उसे जकड़ रखा है।

तब ही हिन्दू समाज यह उद्घोष कर सकता है की सहस्त्र वर्ष तो दूर हिन्दू एक क्षण के लिए भी किसी के दास नहीं रहे।

कुछ ही दर्शकों में मेसोपोटामिया को इराक़,फ़ारस को ईरान, व मिस्त्र तथा पूरे मध्य पूर्व को इस्लामिक बनाने वाला मज़हब भारत में आकर कैसे पराजित हुआ, यही बात इस्लामिक प्रसारवादियों को शूल जैसी चुभती है ।

ये कैसे हुआ की सातवीं शताब्दी में मोहम्मद बिन क़ासिम के हमले से लेकर आज तक के इस्लामी आक्रान्ताओं के उपरांत भी सौ करोड़ हिन्दू भारत में जीवित हैं तथा सनातन धर्म अपनी पूरी गरिमा के साथ भारतीय उपमहाद्वीप में स्पंदित है ? 

नालंदा जैसे दर्जनों पुस्तकालय को जला देने के उपरांत भी श्रुति द्वारा हिन्दू इतिहास को जीवित रखने वाले ब्राह्मण, पूरे जीवन की अर्जित संपत्ति को समाज के हित तो अर्पित करने वाले भामाशाह सरीखे बनिये, अपनी स्त्रियों व कुल देवियों के मान के लिए कट मरने वाले राजपूत, व राष्ट्र पर आए संकट  को देखकर क्षत्रियों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर लड़ने वाले भील ; हिन्दू समाज के हर वर्ग ने सामूहिक रूप से इस्लामी आक्रान्ताओं का न केवल सामना किया वरन् उन्हें बुरी तरह पराजित भी किया।

सुखाड़िया विश्वविद्यालय के प्रख्यात इतिहासकार श्री के० एस० गुप्ता के अनुसार दिवेर का युद्ध भारत के हिन्दू मुस्लिम संघर्ष में इसलिए मील का पत्थर है क्यूँकि पहली बार राणा प्रताप ने मुग़ल सेना पर आक्रमण किया । इससे पहले हमेशा मुग़ल ही मेवाड़ पर आक्रमण करते थे तथा मेवाड़ केवल अपनी रक्षा करता था । 

दिवेर के अमर युद्ध व मेवाड़ के महाराणाओं का विस्मरण हिन्दू समाज के साथ बड़े से बड़ा छल है जिसका निरूपण परम आवश्यक है। 

यदि हिन्दू समाज को समकालीन इस्लामी आतंकवाद से लोहा लेना है तो दशकों से हमारे चित्त में डाली हुई हीन भावना से मुक्त होकर ही वह संभव है , क्योंकि केवल नाम व चेहरे ही बदले हैं ।वही सभ्यतागत संघर्ष आज भी हिन्दुओं की छाती पर खेला जा रहा है।

हम इस युद्ध में पराजित मानसिकता के साथ नहीं उतर सकते हैं । 

यदि हम इस ज्ञान के साथ आतंकवादियों से लड़ने निकलेंगे कि हमारे पुरखों ने इन्हीं दुर्दान्त भेड़ियों को पराजित किया था तो हमें गर्व होगा प्रताप सरीखे पूर्वजों पर जिन्होंने रिक्त हाथों व सीमित संसाधनों के उपरांत भी विजय प्राप्त की । 

हम रृणी होंगे मेवाड़ के वीर राजपूतों, ब्राह्मणों, बनियों व भील समाज के, जिनके कारण हम आज भी ससम्मान हिन्दू हैं ।

हमें घृणा होगी इन मक्कार इतिहासकारों से जिन्होंने सत्य छुपाकर हमें अर्द्धसत्य पढ़ाया व हमारी सहज श्रद्धा के साथ छल किया । 

तातारों व तुर्कों को धूल चटाने वाले हिन्दू यदि आज भी इस्लामी विस्तारवाद के विरुद्ध खड़े हैं तो मात्र इस कारण कि प्रताप जैसे शूरवीरों ने कभी भी अपनी तलवार म्यानस्थ नहीं की । 

उसी गौरव व आत्मबल के आधार पर हमें अधर्म को पराजित करना है ।

कर्नल टॉड मेवाड़ के धर्मनिष्ठ लड़ाकों की तुलना स्वयं की अंग्रेज़ जाति से करते हुए लिखता है ; 

“ जबकि ब्रिटिश लोग रोम से हारे, फिर सैक्सनों व डेनिश सेना से । पूरे साम्राज्य एक युद्ध के परिणाम में हारे या जीते गए तथा विजेता के नियम व धर्म ही पराजित को अपनाने पड़े । 

मेवाड़ ने चौदह सौ साल के संघर्ष में रत्ती भर भी धर्म व रीति रिवाज नहीं गँवाए । मेवाड़ के राणाओं ने अपने रक्त की धाराओं के प्रवाह से हिन्दुओं के सम्मान, धर्म व स्वतंत्रता को सींचा । “ 

आज जबकि हमारे पास धन बल है, संख्या बल है, इंटरनैट व सूचना तंत्र है, तथा संवेदनशील सत्ता तंत्र भी है, तो भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाने से कौन रोक सकता है ? 

सत्य व धर्म की पुनर्स्थापना के महायज्ञ में जब हम पीछे मुड़ कर देखेंगे तो दिवेर का संग्राम वह पावन स्मृति होगा जो हमें प्रताप के नेतृत्व में मेवाड़ के शूरवीरों के त्याग , शौर्य व धर्म के प्रति निष्ठा का स्मरण कराएगा । 

हिन्दू सभ्यता के भविष्य के प्रति हम आश्वस्त होंगे कि यदि एक व्यक्ति अपने धर्म व स्त्रियों की रक्षा के लिए सर्वस्व दाँव पर लगा कर मुग़लों को पराजित कर सकता है तो सौ करोड़ हिन्दू यदि धर्म की हुंकार भरें तो हमारी आर्थिक, भौगोलिक, आध्यात्मिक व राजनैतिक स्वतंत्रता मनुष्यता के अस्तित्व तक अक्षुण्ण रहेगी ।

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