सनातन हिंदू धर्म (भाग 6)

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विचारशृंखला : सनातन हिंदू धर्म (भाग 6)

महादेव शिव

नित्यता के श्वेत शिखर पर विराजमान
विवृत अनन्ताओं की अद्वितीय आत्मा, 
सदासतर्क शांतिरूपी अग्नि-आवरण धारी
नग्न परमानंद की शिव की गुह्य एकांत

(शिव, महाऋषि अरविंद की आंग्लभाषा में रचित कविता)

शिव, सनातन हिंदू परम्परा के, आध्यात्मिक तथा यौगिक प्रतीक चिन्हों में परमचैतन्य के सम्भवतः सर्वोच्च उदबोधक प्रतीक हैं। वास्तव में शिव स्वयं परमचैतन्य हैं, वह नित्य अस्तित्व हैं, शिव ही सत्‌ हैं। शिव अनंत चैतन्य हैं, वह चित्त हैं जिसके गर्भ से सम्पूर्ण सृष्टि की उत्पत्ति होती है और जिसके गर्भ में सृष्टि अंततः विलीन हो जाती है।

योगियों के मतानुसार शिव वह परम शून्य हैं जिससे समस्त सृष्टि जन्म लेती है। शून्यस्वरूपी शिव वह अतिब्रह्मांडीय गर्भाशय हैं जिसमें से सभी प्राणियों की उत्पत्ति हुई है। समस्त ब्रह्मांडों के आदि बीज भी शिव हैं। शिव के अंतर में ही शक्ति, प्रकृति की अनंत संभावनाओं के रूप में, विश्रामरत हैं। शिव तब तक अव्यक्त हैं, जब तक शक्ति; प्रकृति को अभिव्यक्त करते हुए, जागृत और गतिशील नहीं होती। प्रकृति में वह सब अंतरभूत है जो भी ब्रह्मांड स्वरूप में प्रकट होता है, जगत और जीव, जिसको हम व्यावहारिक भाषा में सृष्टि की संज्ञा देते हैं।

शिव ही वह दिव्य अन्धकार हैं जहां से प्रकाश, प्रकृति का जनक, स्वयं जन्म लेता है। शिव के इस दैवीय अंधकार में समग्र प्रकाश समाविष्ट है, और फलतः, संभावना रूप में सम्पूर्ण सृष्टि विद्यमान है। शिव एक कृष्ण-विवर (black hole) के समान हैं, असीमित सघन। शिव शक्ति एवं भौतिक पदार्थों से परिपूर्ण हैं पर स्वयं अदृश्य हैं। प्रकाश की एक भी किरण, कृष्ण-विवर के अनन्त गुरुत्वाकर्षण के परिणामस्वरूप, कृष्ण-विवर से बाहर नहीं निकल सकती। बाह्य दृष्टि से, अगर शिव से बाहर कुछ होने की कोई सम्भावना हो और हम अगर बाहर से देख पाए, तो शिव शून्य या रिक्त प्रतीत होंगे। परंतु अन्तर में, स्वयं की परम गहनता में, शिव सर्वभूत एवं सर्वव्यापी हैं। अस्तित्व की समस्त संभावनाएँ शिव के गर्भ में धारित हैं। सर्वदेश एवं सर्वकाल शिव के अंदर एक तात्त्विक सर्प के समान अजागृत अवस्था में कुंडलित पड़े रहते हैं। शिव अपनी पूर्ण स्थिरता में ब्रह्मांडों के अनंत विस्तार को धारण करते है; ब्रह्मगति की तरंगो का अनंत अनुक्रम धारण करते हैं।

शिव का यह अंधतत्व, प्रकाश की अनुपस्थिति नहीं बल्कि प्रकाश की शुद्ध चैतन्य में अनंत एकाग्रता है जो कि अव्यक्त अवस्था में स्वयं शिव की भी स्थिति है। शिव का दैवीय तम रूप में बोध करना, सामान्य प्रकाश और द्वेतभाव से बने जगत का अतिक्रमण करने के समान है। शिव का दैवीय तम निराकार अद्वितीयता है जिसका बोध केवल तब होता है जब भौतिक चक्षु निर्विकल्प समाधि में आवृत हो जाते हैं, योगी की स्थिति अचल एवं अपरिवर्तनीय हो जाती है तथा तीसरा, अप्रत्यक्ष नेत्र, अवलोकन आरम्भ करता है, वह आत्म-प्रकाशित नेत्र, जिसे किसी बाह्य प्रकाश स्रोत की आवश्यकता नहीं है। यह शिव का वह नेत्र है जिसमें दृष्टा और दृश्य, करता और क़र्म, एक हैं।

शिव वह निरायाम चैतन्य हैं जो अपने अंदर जीवन और अस्तित्व के अनंत आयामों को धारण करते हैं। शिव की इस कालातीत और अथाह समाधि में; व्यक्त होने की प्रक्रिया का प्रथम दिव्य स्फुलिंग प्रकाशित होता है। वह प्रथम दिव्य इच्छा; एक से अनेक होने की प्रकट होती है, इस इच्छा के परिणामस्वरूप शक्ति, शिव की सृजनशील चित्तशक्ति जो शिव के एकत्व को ईश्वर और इश्वरी के दो प्राचीन द्वैत रूपों में चीर देती है, की उत्पत्ति होती है। इस प्रकार से शिव के चैतन्य गर्भ से, सर्व अस्तित्व की अनंत आधात्री, सभी प्राणियों का स्रोत और व्यक्त होने की प्रकिया का स्रोत, दिव्य जगतजननी की उत्तपत्ति होती है। परंतु इस सम्पूर्ण पृथकीकरण एवं विघटन के मध्य में शिव और शक्ति सदा अद्वैत रहते हैं, एक के अंदर दूसरा, एक दिव्य उत्तमोत्तम रहस्य की भाँति। जब शिव अपने नेत्र खोल कर बाह्य अवलोकन अवस्था धारण करते हैं, तब शक्ति शिव का व्यक्त रूप है। जब शिव अपने नेत्र मूँद लेते हैं और अपने अन्तर का अवलोकन करते हैं, तब शिव वह शक्ति रूप हैं जो बीज में धारित है। जो योगी सत्यदृष्टि का धारण करते हैं उन्हें शक्ति, गतिशील शिव के रूप में दृष्ट होती हैं और शिव निष्क्रिय कुंडलित शक्ति के रूप में।

शक्ति जो नित्य स्त्रीरूप और दिव्य जगजननी हैं, उस शक्ति के रूप में शिव स्वयं ब्रह्मांड में परिवर्तित हो जाते हैं। वह अपनी सृजनशक्ति से केवल ब्रह्मांड की प्रकल्पना नहीं करते, बल्कि स्वयं साक्षात ब्रह्मांड का रूप ले लेते हैं। इस प्रकार योगी को इस सत्य का बोध है की वह सब जो प्रत्यक्ष है, जो अस्तित्व में है, जो दृष्टिगोचर है, जिसका बोध किया जा सकता है, आभास किया जा सकता है एवं छुआ जा सकता है, वह स्वयं शिव ही हैं, अपनी शक्ति के रूप में। और वह आत्मा जो योगी के अन्तर में अपने अस्तित्व के प्रति चैतन्य है, वह जो उसकी तत्वता का परम सत्य है, वह शिव ही हैं। इसलिए “शिवोहम” को योग के प्रथम एवं सर्वप्रधान मंत्र की मान्यता प्राप्त है : मैं स्वयं शिव हूँ।और जैसे जैसे यह मंत्र योगी के चित्त का भेद कर उसमें प्रवेश करता है और उसे अपने स्पंदन से परिपूर्ण कर देता है, वैसे वैसे समस्त भेद एवं द्वंद्व सहज ही नष्ट हो जाते हैं, केवल और स्वयं शिव – आत्मा, जगत एवं ब्रह्मांड रूप में प्रकाशमान होते हैं।

यद्यपि शिव समस्त सृष्टि में व्याप्त हैं, फिर भी कोई भी शिव का पूर्ण ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकता, क्योंकि शिव स्वयं ही सकल सृष्टि के ज्ञाता एवं दृष्टा हैं, सर्व अस्तित्व के महासाक्षी वह स्वयं हैं। महाशिव के साथ एकत्व का बोध योगी की परमोपरम उपलब्धी है। शिव साक्षात एवं पूर्ण अद्वितीयता हैं, फलतः शिव में समस्त द्वंद्व, ज्ञाता एवं ज्ञात की समस्त श्रेणियाँ एवं विभाजन विलीन हो जाते हैं। शिव का ज्ञान होना असंभव है क्योंकि शिव के बाहर किसी ज्ञाता अथवा ज्ञान का अस्तित्व ही नहीं है। इसी कारण, शिव का बोध शून्यबोध के समान होता है, इसलिए नहीं क्योंकि यथार्थ में वह रिक्त एवं शून्य हैं परंतु इसलिए क्योंकि शिव द्वंदपूर्ण मानव चेतना और मनुष्य की सब ज्ञान इन्द्रीओं से परे हैं। कृष्ण-विवर (blackhole) के समान, शिव भी अदृश्य और अगम्य हैं, फलतः मानव चेतना के लिए शिव शून्यस्वरूपी हैं। यथार्थ मे शिव का यही शून्य स्वरूप समस्त व्यक्त सृष्टि की पृष्ठभूमि एवं मूलभूत आधार है, क्योंकि जब ब्रह्मांड के कालातीत कुंडलित चक्रों में समस्त सृष्टि का पूर्ण विलय हो जाता है तत्पश्चात भी यह शून्य शेष रहता है, अपरिवर्त्य एवं अगाध। जब समस्त प्रकाश जिससे सृष्टि की अभिव्यक्ति होती है, उस प्रकाश का प्रत्याहरण एवं निर्वापण होता है; उसके पश्चात जो शेष रह जाता है वह शिव का दिव्य तम है।

शिव के दिव्य तम में प्रवेश करना एक सर्वोच्च रहस्य की हृदय गुहा में प्रवेश करने के समान है, क्योंकि वास्तव में इसी दिव्य गहन तम में स्वयं को स्वयं के गूढ़ अस्तित्व का ज्ञान होता है, शुद्ध एवं एकल अद्वितीय‌ आत्मा की प्रतक्ष्यता होती है, शंकराचार्य का शिवोहम शिवोहम चरितार्थ होता है। गहन हृदय की अन्तरम गुहा के अंदर साधक आत्मिक समाधि के सर्वोच्च आनंद में शिव स्वरूप का धारण करता है। जब शक्ति, प्रकृति स्वरूप में, जो की नित्य स्त्री स्वरूप हैं, सर्वोत्तम पुरुष, शिव के पास लौट जाती हैं, और स्वयं को शिव में विलीन कर लेती हैं। यह कोई अत्यंत दूरस्थ, केवल एकबार होने वाली अतिब्रह्माण्डिय घटना नहीं है पर एक आत्मीय यौगिक अनुभव है जो की निरन्तर पुनर्घटित होता रहता है, समस्त मानवता के माध्यम से। जहाँ भी और जब भी एक जीवात्मा शिव के साथ अपने एकत्व का साक्षात्कार कर लेती है और शिव के अगाध विस्तार में विलीन हो जाती है, तब यह मंगलकारी अतिब्रह्माण्डिय घटना उस जीवात्मा के साथ हो रही होती है। इस प्रकार की शिव में विलीनता ही सर्वोच्च निर्वाणस्थिति है एवं पूर्ण मोक्ष है।

अधिकतर हिंदू शिव को विनाश के ईश्वर की मान्यता देते हैं एवं प्रलयकारी महादेव जैसे शब्दों से अलंकृत करते हैं। परंतु शिव विनाश नहीं करते, ईश्वर की इस व्यवस्था में विनाश अनावश्यक है – जब ब्रह्माण्डिय विकासशीलता की दिव्यानुभूति क्षीण हो जाती है तो शिव स्वयं की बनाई सृष्टि को पुनः स्वयं में विलीन कर लेते हैं, वैसे ही जैसे एक मकड़ी अपने जाल को स्वयं में पुनः ग्रहण करती है। अनेक नामरूप, एकत्व में विलीन हो जाते हैं, अनेकता अद्वितीयता में लुप्त हो जाती है। यह सृष्टि को स्वयं में प्रत्याहरित करने की शिव की प्रक्रिया है जिसमें शिव उसका विनाश नहीं बल्कि उसका रूपांतरण करते हैं। प्रलय के बारे में लोकप्रिय धारणाएँ ज्ञानोचित नहीं हैं। प्रलय ब्रह्मांड के पूर्णतम विनाश की प्रक्रिया नहीं है, यह असत्यवादी ब्रह्मांड और असत् अहम की शिव के सत्य में विलीनता मात्र है। इसीलिए योगीजन शिव को रूपांतरण के ईशवर के रूप में जानते हैं विनाश के ईशवर के रूप में नहीं। शिव की शुभ समक्षता में स्वयं मृत्यु का अस्तित्व व्यक्तिगत प्रलय के रूप में समाप्त हो जाता है, ज्ञानयुक्त योगी के लिए वह आत्मिक कायाकल्प में परिवर्तित हो जाती है।

शिव की यह लीला – सृष्टि की अभिव्यक्ति एवं प्रत्याहरण, एकत्व और अनेकत्व, प्रक्षेपण एवं विक्षेपण, केवल युग-युगान्तर की अतिदीर्घ अवधि में ही होने वाला घटनाक्रम नहीं है बल्कि मानव चेतना के माध्यम से मानव जीवन की अवधि में होने वाला घटनाक्रम भी है। चेतना का सकारात्मक परिवर्तन ही समस्त योगसाधनाओं का स्वाभाविक परिणाम है। और शिव स्वयं, आदियोगी की भाँति, युगों की कालावधि में एवं मनुष्य की जीवन अवधि में, मानव चैतन्य की विकास प्रक्रिया का मार्गदर्शन करते हैं। इसीलिए शिव को हम योगेश्वर की संज्ञा भी देते हैं। पुरातन ऋषि जिन्होंने शिव का आत्मबोध किया था, उनके कथनानुसार, जो भी व्यक्ति निष्कपटभाव से स्वयं को शिव के चरणों में पूर्णतः समर्पित कर देता है, आदियोगी शिव, स्वयं उसका मार्गदर्शन करते हैं, और मात्र एक जीवन की अवधि में ही आत्मसाक्षात्कार की सर्वोच्च पराकाष्ठा तक ले जाते है। जो भी शिव का आह्वान निष्कपटता एवं निरंतरता से करता है, उसके प्रति शिव की करुणा एवं उदारता अतिप्रसिद्ध है।

योगिजन शिव को स्वयंभू के नाम से भी जानते हैं, वह जो स्वयं प्रकट हुआ है। शिव स्वयं के गर्भ से समस्त सृष्टि की अभिव्यक्ति करते हैं पर स्वयमेव शिव का कोई स्रोत या मूल बीज नहीं है। यह एक गहन रहस्य है। यदि सृष्टि की उत्तपति शिव के गर्भ से होती है, तो स्वयं शिव सृष्टि से अतिरिक्त हैं, और जो सृष्टि से अतिरिक्त है वह कभी अस्तित्व में नहीं आ सकता। यह शिव तत्व जो की अस्तित्व से परे है, और ऋषियों के कथनानुसार मूल अस्तित्व है, वही सत् है। सत्, मूल अस्तित्व के रूप में स्रोत एवं वास्तविकता है, सकल सृष्टि का मूल तत्व; जिसमें से समस्त सृष्टि की उत्पत्ति, एवं प्रवाह होता है। इसीलिए शुद्ध अस्तित्व स्वयंभू है; स्वयं ही, स्वयं के गर्भ से उत्पन्न होता हुआ, अकारण एवं अकाल, एक ऐसा गूढ़ रहस्य जो कि अस्तित्व और चैतन्य के समस्त आयामों से परे है। जैसे कि शून्य से उत्तपत्त होता शून्य, क्योंकि जिसका कारणत्व में वास नहीं है वह भौतिकत्व से भी परे है, वह अत्यधिक अबोध्य निराकारता है, इसी फलस्वरूप वह शून्य के समान प्रतीत होती है।

योगी अपनी साधना के द्वारा इस श्रेणी के अतिगूढ़ रहस्यों के साथ सहज हो जाता है, वह इन रहस्यों का अर्थ ढूंढने का कोई प्रयास नहीं करता। शिव के गूढ़तम रहस्यों का मार्ग उदासीनता एवं समर्पण के अगाध अनुभव से उत्कृष्ट होता है, जहाँ बुद्धि एवं हृदय प्रगाढ़ शांति में अवरोहित हो जाते हैं और दृष्टि अंतरात्मा की ओर केंद्रित हो जाती है, क्योंकि शिव इस अंतरात्मा के गर्भ में निवास करते हैं। शिव के स्वयंभू रूप पर इस प्रकार ध्यान लगाना, चैतन्य के द्वंद्वों के पार जाने एवं आत्मिक शांति में प्रवेश करने के लिये, सर्वाधिक शक्तिपूर्ण साधना है।

अर्धनारीश्वर के रूप में, शिव गहन सत्तामूलक अद्वैत के प्रतीक हैं। पुरुष के रूप में – ईश्वर की सृजन शक्ति के सम्पूर्ण मिश्रण एवं संतुलकर्ता, और नारी के रूप में – इश्वरी की निर्वहन एवं पोषण करने की शक्ति। अद्वैत दिव्य चैतन्य-शक्ति स्वरूप शिव, अर्धनारीश्वर रूप में, पुरुषतत्व एवं नारीतत्व की अभेद्यता का प्रतीक हैं [1]। पुरुष एवं नारी तत्व का द्वंद्व, मानव ब्रह्मांड का मूल द्वंद्व है। शिव के अर्धनारीश्वर पर ध्यान करना, ब्रह्मांड के इस मूल द्वंद्व पर विजय प्राप्त करने की शक्तिपूर्ण साधना है। यह, ध्यान एवं कर्म, अव्यवस्था एवं व्यवस्था, विकास-प्रक्रिया एवं आत्मसात्-प्रक्रिया, बाह्य केंद्रित शक्ति एवं आंतरिक गुरुत्वाकर्षण के मूल गतिशील संतुलन को पुनः स्थापित करने का मार्ग है। जो भी इन मूल द्वंद्वों का अतिक्रमण करता है वह शिव के शांतस्वरूपी सम्पूर्ण तादात्म्य, एवं शिव के निराकार रूप के समीप आ जाता है।

सनातन परंपरा में, शिव की आराधना को केवल सम्पूर्ण चैतन्यस्थिति में किया जाता है, यह एक आंतरिक दीक्षण की क्रिया है एवं शरीर, बुद्धि व हृदय का अर्पण है। यह आराधना, बाह्य प्रतीकों एवं मंत्रों की एक विस्तृत व्यवस्था के द्वारा, शिव के यौगिक एवं आत्मिक स्वरूप का निरंतर आह्वान करने की विधि है। यदि किसी को शिव के गूढ़तम एवं परम सुरक्षित रहस्य का ज्ञान हो तो शिव को संतुष्ट करना अत्यंत सरल है, क्योंकि शिव अंतर्वासी हैं, जो स्वयं ही आत्मा की गुहा में आसीन हैं। जो शिव का नाम रूप के ब्रह्मांड में अन्वेषण करता है वह सर्वथा ही विस्मित होता है, पर वह साधक जो नाम रूप का त्याग कर शिव के आंतरिक रूप का आह्वान करने में समर्थ है, उस विरले साधक को शिव के परमचैतन्य का वरदान प्राप्त होगा।

इसीलिए अनेक साधक अपने शरीर पर भस्म का का लेप करते हैं, रूपकालंकार की भाँति में या वास्तविकता में, गृहस्ती का त्याग करते हैं, भिक्षु एवं सन्यासी बन जाते हैं, कठिन तप करते हैं, पर शिव के अन्तरम रहस्यों का अल्पाभास भी उन्हें नहीं हो पाता, किंचित दूरस्थ क्षितिज के समान शिव उनके लिए दुर्लभ ही रहते हैं। परन्तु जिनको यह बोध है की शिव हमारे व्यक्तित्व के अंतःस्वभाव ही हैं, केवल वही स्वयं के हृदय व जीवात्मा के गर्भ में शिव के रहस्यों का भेद करते है। यही वे साधक हैं जिन्हें यह स्पष्ट बोध होता है की शिव का वैराग्य भौतिक व बाह्य नहीं परंतु आंतरिक है; शिव की तपस्या सत्य और शुद्धता की तपस्या है। शिव भक्त को आवश्यक रूप से हृदय की अंधगुहाओं में उतरना होगा और वहाँ स्थापित शाश्वत ज्योति के प्रकाश का साक्षात्कार करना होगा।

शिव को साधारणतः एक सन्यासी के रूप में दर्शाया जाता है जिसका शरीर शवों की भस्म से लिप्त होता है। यह शिव का एक नितांत प्रतीक है, आदियोगी – तपस्वीस्वरूप धारण किए हुए। तपस्या का तप वह अग्नि है जो भ्रम एवं अज्ञान को भस्म कर देती है। तपस्वी का बाह्यरूप उसके आंतरिक वैराग्य का प्रतीक है, वह इस नश्वर जगत में वास करता है, उसके समस्त आकर्षणों व विकर्षणों के बीच, परंतु उसे निरंतर उसकी नश्वर्ता का बोध रहता है। शवों की भस्म – नश्वर्ता, मृत्यु एवं विलीनता का प्रतीक है – भस्म नश्वर शरीर का अंतिम अवशेष है। इसलिए, भस्म से लिप्त तपस्वी को सदा अपनी बुद्धि एवं हृदय के भीतर निरंतर आंतरिक स्मरण में रखे हुए, योगिनी तीव्रता से अपने शरीर एवं भौतिक जगत के साथ अपनी समरूपता का अतिक्रमण कर सकती है, और शिव के वैराग्य एवं मोक्ष की अपने स्वयं चैतन्य में, प्राप्ति कर सकती हैं।

आद्यप्रारूपीय योगी एवं तपस्वी, आदियोगी शिव, महादेव भी हैं जो नीलकंठ के रूप मे प्रसिद्ध हैं, उनके कंठ का यह नीला रंग उस विष का परिणाम है जो शिव ने सर्वोच्च करुणाभाव में, ब्रह्मांड की अमंगल से रक्षा करने हेतु, ग्रहण किया था। यह एक आदिकालीन प्रतीक है। जब देवासुर महासंग्राम के रूप में, अस्तित्व के महासागर का मंथन हो रहा था, महामंथन के फलस्वरूप – विध्वंशकारी, विषयुक्त पदार्थ पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करते है जिनसे समस्त जीवन नष्ट हो सकता था। शिव, जो करूणानिधि हैं, सृष्टि के रक्षा हेतु, इस समस्त विष को ग्रहण करते हैं, परंतु शिव के अन्तर में शाश्वत निवासीनी दिव्य शक्ति ने विष को शिव के शरीर में प्रवेश करने के पूर्व, कंठ में अवरुद्ध कर दिया, फलतः यह विष शिव के कंठ में ही अवशेषित है और उसके प्रभावस्वरूप शिव का कंठ नीलवर्ण है।

शिव का यह नीलकंठ रूपी प्रतीक; गहन एवं शक्तिशाली है। मानव जगत के अनन्त विकास-प्रक्रिया-चक्र को मंथन की संज्ञा दी गयी है, जिसके द्वारा शुभ और अशुभ शक्तियों का विमोचन होता है: कुछ शक्तियाँ सम्पूर्ण चैतन्य की विकास-प्रक्रिया का बलवर्धन करती हैं और कुछ शक्तियाँ इस प्रक्रिया का विरोध करती हैं। शिव उस विष का पान करते हैं जो अशुभ एवं विकास विरोधी शक्तियों का प्रतीक है और उन्हें अपने कंठ में ही ग्रहण करते हैं। वह ना तो उसका उपभोग करते हैं और ना ही बहिष्कार करते हैं। शिव उसे विराम अवस्था में रखते हैं और उसके प्रभाव को सदाशुभ में परिवर्तित कर देते हैं। शिव के इस स्वरूप का ध्यान करते हुए, उनके नीलकंठ रूप का आह्वान करते हुए, योगी, देवों एवं असुरों के शुभ एवं अशुभ के द्वंद्व का अतिक्रमण कर सकता है; और इस कालातीत महायुद्ध में, जो कि अशुभ एवं विनाश की समस्त शक्तियों को सृष्टि में जीवन के सर्वोच्च शुभ की ओर परिवर्तित करने का युद्ध है, सहयोग दे सकता है। यथार्थ में यही महादेव शिव का सर्वोच्च उद्देश्य है – समस्त सृष्टि का परिवर्तन, ब्रह्मांड के सकल रूपों एवं शक्तियों का परिवर्तन, परम शुभ में।

शिव का स्मरण जटाधारी रूप में भी किया जाता है, उनके कुंडलित केश जटाओं में बद्ध हैं तथा अर्धचंद्र से सुशोभित हैं। यह छवि शिव के जुड़े विविध चिन्हों का पुनः विस्तार करती है। पुराणों के अनुसार, शिव ने गंगा के स्वर्गलोक से तीव्र आगमन पर उसे अपनी जटाओं में अवशोषित कर गंगा के वेग को अवरोधित किया और उसके भीषण प्रवाह को अल्पधारा में परिवर्तित कर दिया। इस कथा में स्पष्ट एवं गहन यौगिक अर्थ है: गंगा एक नदी नहीं बल्कि एक प्रतीक है, दुर्बल पृथ्वी लोक की ओर अवरोहित उच्च चैतन्यशक्ति के भीषण वेग का, जिसके कारण स्वरूप सकल पृथ्वी पर बाढ़ आ जाती। शिव की जटाएँ सहस्रार चक्र का प्रतीक हैं, केवल शिव के सहस्रार चक्र में ही गंगा के वेग को बिना किसी कठिनाई से धारण करने की क्षमता थी। गंगा के प्रवाह को अल्पधारा के रूप में मुक्त करना, एक गहन प्रक्रिया का प्रतीक है, जिसके द्वारा योगी, प्रकृति पर सम्पूर्ण नियंत्रण रखते हुए, एक के बाद एक सूक्ष्म चक्र द्वारा, उच्च चेतना की शक्ति को मुक्त करता है, बुद्धि, हृदय तथा शरीर में। शिव के जटाधारी रूप पर ध्यान लगाकर, शिव भक्त स्वयं की बुद्धि, हृदय एवं शरीर को उच्च चेतना के शक्ति के अवरोहण के प्रति अनावृत कर सकता है।

शिव को त्रियम्बकम् के नाम से भी सम्बोधित किया जाता है। त्रियम्बकम् अर्थात त्रीनेत्र धारी ईश्वर। शिव के दो नेत्र साधारण द्वैतवादी अवबोधन का प्रतिनिधित्व करते हैं, दाँया नेत्र सूर्यतत्व के प्रभाव का प्रतिनिधित्व करता है, बायाँ नेत्र चंद्रतत्व के प्रभाव का प्रतिनिधित्व करता है। तीसरा नेत्र: जो दूसरे नेत्रो के आवृत होने के पश्चात खुलता है, अग्नितत्व का प्रतिनिधित्व करता है। यह यौगिक दृष्टि तथा सत् का साक्षात बोध है जो समस्त द्वंद्वों को भस्म कर देता है। यह तीसरा नेत्र, जब सक्रिय होता है, तो बुद्धि के द्वंदवाद के साथ शक्तिशाली तादात्म्य का विनाश कर साक्षात बोध की उत्पत्ति करता है। इसी कारण ऐसा माना जाता है कि जब यह तीसरा नेत्र बाह्य संसार पर केंद्रित होता है तो उसका विनाश करने में सर्वथा सक्षम है। यह द्वंद्व के भ्रम का विनाश करता है। शिव के इस स्वरूप पर ध्यान लगा कर शिव भक्त, शिव के अद्वितीय बोध तक अरोहित हो सकता है।

अर्धचंद्र जिसे शिव अपने शीर्ष पर धारण करते हैं, वह समय और समय के माप का प्रतीक है। वेदान्त की दृष्टि से, समय का माप अथवा कोई भी माप, माया का‌ ही गुणधर्म है। अर्धचंद्र को शीर्ष पर धारण करने के कारण शिव समय एवं समय की माया के सम्पूर्ण नियंत्रण के द्योतक हैं। शिव शाश्वत हैं, कालातीत हैं, तभी वह अर्धचंद्र को समय के प्रतीक के रूप में, एक आभूषण की भाँति धारण करते हैं, जो कभी भी स्वेच्छा से उतारा जा सकता है।

शिव के कंठ का सर्प, जिसे पौराणिक कथाओं में वासुकि नाम से जाना जाता है, वह अहंकार की प्राणशक्ति एवं मृत्यु के भय का प्रतीक है। अहंकार एवं मृत्युभय में गहन सम्बंध है, यह आपस में गुँथे हुए हैं। शिव के कंठ का सर्प, अहंकार एवं मृत्यु भय, दोनों पर पूर्ण विजय का प्रतीक है। शिव इस सर्प को आभूषण की भाँति पहनते हैं जो स्वत: ही अहम एवं मृत्यु पर आधिपत्य का प्रतीक है। कुछ भक्त सर्प को काल के शाश्वत चक्र की मान्यता देते हैं। सर्प को अपने कंठ में तीन बार लपेट कर पहनने से, शिव काल पर सम्पूर्ण नियंत्रण का प्रतीक भी स्थापित करते हैं। काल नश्वरता का प्रतीक है इसलिए काल पर नियंत्रण, नश्वरता पर नियंत्रण के समान है।

गहन अर्थों में, अहंकार, काल एवं नश्वरता, तथा मृत्यु भय, सब आपस में गुँथे हुए हैं। शिव के इस स्वरूप पर ध्यानस्त हो, योगिनी अहंकार का अतिक्रमण कर सकती है एवं मृत्यु तथा नश्वरता के भय पर सम्पूर्ण विजय कर सकती है। इस सत्य का स्मरण रहे कि मृत्यु एवं नश्वरता की शक्तियों पर विजय प्राप्त करने का मार्ग, महामृतुंजय मंत्र, बीज मंत्र के रूप में शिव द्वारा ही दिया गया था।

त्रिशूल जिसे शिव शस्त्ररूप में धारण करते हैं, वह शिव के त्रीरूपी सत्य का प्रतीक है। शिव जो कि ब्रह्मांड को स्वयं से उत्पन्न करते हैं, अपने पूर्ण चैतन्य में उसे सुरक्षित रखते हैं, और अंततः उसे स्वयं में पुनः विलीन कर लेते हैं। कुछ योगी, त्रिशूल को प्रकृति के त्रीगुणों – सत्व, रजस एवं तमस के सर्वोच्च संतुलन का प्रतीक मानते हैं। सत्व के द्वारा शिव सृष्टि का सृजन करते हैं, रजस के द्वारा वह सृष्टि की सुरक्षा करते हैं तथा तमस् के द्वारा, उसे अपने दिव्य तम में पुनः विलीन कर लेते हैं। कुछ व्यक्ति त्रिशूल को मानव चेतना की तीन शक्तियों के रूप में देखते हैं : इच्छा, ज्ञान एवं क्रिया। इन तीन शक्तिओं को प्राप्त करने के उपरांत, जगत में कुछ भी असाध्य नहीं है। शिव के इस त्रिशूल स्वरूप पर ध्यानस्त हो कर, योगिनी स्वयं की प्रकृति के त्रिगुणों पर विजय प्राप्त कर सकती है तथा सर्वोच्च शुभ की सिद्धि के लिए, स्वयं शिव के समान, क्रिया कर सकती है।

शिव एक हाथ में, प्रतीकात्मक मुद्रा में, डमरू धारण करते हैं। इस मुद्रा को डमरूहस्त मुद्रा कहते हैं। यह एक और गहन रहस्यमयी प्रतीक है। डमरू शब्द- ब्रह्म अथवा आदिध्वनि ॐ का प्रतीक है। जब यह डमरू उचित ध्यान तथा उचित अंत:स्थिति से बजाया जाता है तो यह ॐ ध्वनि उत्पन्न करता है, जो नाद तक अवरोहण करता है जो की अ-ऊ-म का आदिकालीन ब्रह्मांडीय स्पंदन है। जो योगिनी डमरूधारी शिव पर ध्यान स्थापित करती हैं, वह उस सम्पूर्ण चिदाकाश में प्रवेश कर सकती हैं, जहां वह स्वयं को नाद में विलीन कर सकती हैं। उस दिव्य स्पंदन की कुछ तरंगो को स्वयं के चैत्य पुरुष के अन्तर तक ला सकती हैं।

शिव से जुड़े सबसे प्रचलित प्रतीकों में से एक है लिंग। लिंग के साथ, भक्त सनातन हिंदू धर्म के समस्त प्रतीकों में से शुद्धतम एवं सर्वाधिक शक्तिशाली प्रतीक के निकट आता है। शिवलिंग अनंत एवं निराकार शिव का प्रतीक है। यह लिंग सर्वाधिक पुरातन चिन्हों में से एक है। यह उस काल का चिन्ह है, जब वर्तमान में स्वीकृत शिव के चित्र एवं मूर्तिरूप का कोई अस्तित्व नहीं था। स्वयं लिंग शब्द का अर्थ प्रतीक या चिन्ह है। स्वामी विवेकानंद के एक बार लिंग को शाश्वत ब्रह्म के प्रतीक के रूप में वर्णित किया था।

कुछ पौराणिक कथाओं में, शिव के निवास स्थान कैलाश पर्वत, जो स्वयं सर्वोच्च चेतना का प्रतीक है, उसे लिंग रूप में सृष्टि के केंद्र से समान चिन्हित किया गया है, वह केंद्रीय धुरी जिसके इर्द-गिर्द ब्रह्मांड घूमता है।

शिवलिंग केवल पत्थर का एक खंड मात्र नहीं है, बल्कि यह महान अव्यक्त ब्रह्म का चिन्ह है, और साथ ही, वह व्यक्त ब्रह्म का भी गहन प्रतीक चिन्ह है। यह पुरुषतत्व एवं नारीतत्व के पूर्ण संतुलन का प्रतीक है तथा दृश्य एवं अदृश्य का भी प्रतीक है। लिंग – शांत, असंग तथा पूर्ण रूप में प्रतिष्ठित है, भक्त के अंदर यह जिस शांति का आह्वान एवं स्थापन करता है, उसका विवरण शब्दातीत तथा विचारातीत है। जो भक्त शिवलिंग पर ध्यान लगाता है, उसके गहन यौगिक महत्व को समझते हुए, वह सृष्टि के सब द्वंद्वों का अतिक्रमण कर सकता है तथा अव्यक्त के विरल आनंद का अनुभव व्यक्त में कर सकता है। इस प्रकार शिवलिंग का ध्यान करने से, भक्त अपनी चेतना को शिव के शुद्धप्रकाश के उस स्तंभ में विलीन कर सकता है, जिसे हम ज्योतिर्लिंग भी कहते हैं। एक कथा के अनुसार, एक बार शिव ब्रह्मा और विष्णु के सामने एक ज्योतिर्मय स्तंभ के रूप में प्रकट हुए और शिव ने उन्हें स्तंभ के चरम तथा अंतिम सीमाओं को ढूँढने के लिए कहा। दोनो में से कोई भी देव उस चरम सीमा को नहीं ढूँढ पाया, और ढूँढते भी कैसे? अनन्तता का कोई माप नहीं होता, कोई अंत नहीं होता।

शिवलिंग, ज्ञात में अज्ञात का तथा व्यक्त में अव्यक्त का प्रतीक है। शिवलिंग पर ध्यान स्थित करना शिव के सर्वोच्च रहस्य पर प्रत्यक्ष रूप से ध्यान लगाने के समान है।

तथापि, इन सब विवरण और व्याख्यानों के पश्चात भी, हमें पता है के हमने इस अगाध रहस्य को केवल हल्का सा खुरचा भर है। शिव मानव बुद्धि के द्वारा जाने, समझे या समझाए नहीं जा सकते। शिव की व्याख्या करने का हमारा प्रयास किसी बच्चे का गूढ़ अंतरिक्ष की व्याख्या करने के प्रयास के समान है। जितनी अधिक गहराई में हम जाते हैं, उतना ही अधिक हमें शिव के रहस्य की असीम विशालता एवं गहनता का बोध होता है। शिव न तो ईश्वर हैं ना व्यक्ति। शिव का अस्तित्व कभी न था और ना कभी होगा। वह हैं भी और नहीं भी। सभी स्वरूप शिव के हैं पर स्वयं शिव स्वरूपहीन हैं। वह हमारे निकटतम से भी निकट हैं और हमारी श्वास से भी अधिक अंतरंग हैं। शिव सब हैं, सर्वत्र हैं। ऐसे शिव को कहाँ ढूँढें? क्योंकि जो शिव को रूपों एवं प्रतीकों में, बाहर के संसार में ढूँढते हैं, उनके लिए शिव रिक्त हैं, शिव अंधकार हैं। पर वह जो प्रतीकों के प्रतिकात्मवाद, और रूपों की रूपहीनता को भेद सकते हैं, उनके लिए, शिव स्वयं के अंश मात्र का प्रकटन करते हैं, तथा अपनी कुछ झलकें देते हैं, उनकी आत्मा को और आगे एवं और गहनता में ले जाने के लिए। परंतु उन्हें जो स्वयं को आंतरिक रूप से शिव को समर्पित करते हैं, जैसे कीट स्वयं को ज्योति को समर्पित करता है, यह जानते हुए की समस्त ब्रह्मांड में केवल शिव ही हैं, शिव स्वेच्छा से एवं अपार उदारता से स्वयं को उस भक्त को सुलभ कर देते हैं। शिव की कृपा दिव्य शक्ति की कृपा है। शिव का आह्वान करना शक्ति का आह्वान करना है। वह सदा-सर्वदा व्यक्त, अंतर्वासी तथा हमारी चेतना में प्रकाशित, ईश्वर और इश्वरी के रूप में विराजमान रहते हैं।

ॐ नमः शिवाय
प्रकाशमान ईश्वर, शिव को नमन।

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1संभवतः अर्द्धनारीश्वर का प्रथम वर्णन बृहदारण्यक उपनिषद् में आद्यप्ररूपीय जीव के रूप में हुआ था, इस जीव का परिमाप आलिंगन अवस्था में स्थित स्त्री-पुरुष के युगल के सामान था, यह दो रूप बाद में पृथक हो गए और इन में से पुरुष एवं स्त्री का जन्म हुआ।

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