Author: सम्पादकीय टीम द्वारा अनुवादित

सम्पादकीय टीम द्वारा अनुवादित

Rebuilding the Hindutva Narrative
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हिंदुत्व कथात्मक का पुनर्निर्माण

हिन्दुत्व एक धार्मिक प्रतिरोध भविष्यकाल, विभिन्न प्रकार से, एक गहन एवं प्रचंड युद्ध होगा सभी धार्मिक शक्तियों का उन शक्तियों के विरुद्ध जो धर्म को भ्रष्ट एवं नष्ट करने की धमकी देती हैं, पृथ्वी के किसी भी स्थान पर । हिंदुत्व, ऐसी हानिकारक शक्तियों के विरुद्ध एक प्रथम पुष्ट मोर्चा है।   इस बात की पुनरावृत्ति आवश्यक है कि हिंदुत्व आक्रामक अथवा हिंसक नहीं हो सकता, क्योंकि सभी प्रकार की आक्रामकता तथा हिंसा हिंदुत्व के मूल स्वभाव का प्रतिवाद करती है। वह जो हिंदुत्व की रक्षा के लिए आगे आएँगे और संघर्ष करेंगे, उन्हें यह सदा स्मरण रखना चाहिए। हिंदुत्व की वास्तविक शक्ति उसकी आत्मा में है, उसके चेतना के विकास के मूल सिद्धांत में है। चेतना के निरंतर विस्तार तथा वर्धिकरण के मूल विचार के इर्द ही नवीन हिंदुत्व के कथानक का मूल सिद्धांत बनना चाहिए। इसमें कोई संदेह नहीं है कि जो शक्तियां हठधर्मिता पूर्वक हिंदुत्व की विरोधी हैं, उन शक्तिओं से संघर्षरत होना होगा, पीछे हटाना होगा,  हरसंभव प्रकार से उन्हें विफल करना होगा। लेकिन जैसे प्रायः सभी संघर्ष करते हैं, कट्टरता और शस्त्रीकरण से, वह हिंदुत्व का मार्ग नहीं हो सकता। हमें यह सरल तथ्य सदा स्मरण रहना चाहिए कि हम अंततः एक जीवनशैली की रक्षा के हेतु संघर्ष कर रहे हैं, और यह जीवनशैली, जिसकी हम कैसे भी व्याख्या करें, वह हिंसा या आक्रामकता को न्यायसंगत नहीं मानती। परन्तु, इसका अर्थ यह नहीं कि हमे आक्रामकता का विरोध नहीं करना चाहिए। जैसे की दैहिक या सैन्य हिंसा विकल्प नहीं है, दूसरा गाल आगे करना भी विकल्प नहीं है। हमें प्रतिरोध की कला सीखने की आवश्यकता है। गांधी का “निष्क्रिय प्रतिरोध” नहीं परन्तु श्रीकृष्ण का धार्मिक प्रतिरोध – स्वयं के गहनतम सत्य के प्रकाश में पूर्ण समभाव के साथ स्थापित रहना तथा सत्य एवं धर्म के लिए स्वयं का पूर्णत्याग करने के लिए तत्पर रहना; वीरगति को प्राप्त होने हेतु अथवा शत्रुवध करने हेतु तैयार रहना, परन्तु लेशमात्र व्यक्तिगत प्रतिक्रिया, घृणा या प्रतिशोध के बिना।  इसका अर्थ है की हमे युद्ध का आंतरिक संघर्ष के रूप में बोध करना होगा। आंतरिक स्थिति में स्थापित होना की विद्या को ग्रहण करना होगा, आध्यात्मिक आस्था तथा आत्मशक्ति पर आधारित आतंरिक स्थिति। अधिकतर युद्ध बाह्य जगत में घटित होते हैं, तथापि अशांति तथा अकारण विनाश होता है, परन्तु विकास विरोधी आसुरिक शक्तियां जीवित रह जाती हैं। बाह्य हिंसा विकास विरोधी आसुरिक शक्तिओं का नाश नहीं कर सकती, क्योंकि यह आसुरिक शक्तियां जन मानस की चेतना में वास करती हैं, तथा कोई भी बाह्य युद्ध उन्हें नष्ट नहीं कर सकता। आसुरिक शक्तियों को उनकी रिसती जड़ों से उखाड़ फेंकने के लिए, हमें सबसे महत्वपूर्ण युद्धक्षेत्र में युद्ध करने की कला का ज्ञान प्राप्त करना होगा – चेतना का युद्धक्षेत्र। यह धार्मिक प्रतिरोध का आयात है : अधर्म के समक्ष एक पर्वत के समान स्थिर अवस्था में रहना होगा , अडिग, अविचल तथा पूर्ण – ताकि सत्य की चेतना हमारे गिर्द एक शक्तिपूर्ण क्षेत्र का निर्माण कर सके ऐसे धार्मिक प्रतिरोध के लिए, योद्धा को निश्चय ही अपनी आत्मा से सत्य की खोज करनी होगी। धर्म योद्धा को निश्चय ही स्वयं के लिए चैतन्य के बल एवं साधनों की प्राप्ति करनी होगी, जो कि समस्त भौतिक, आर्थिक तथा सैन्य साधनों से, जिनका हम संग्रह कर सकते हैं, उनसे भी कल्पनातीत रूप से अत्यधिक विशाल हैं। वास्तव में, बाह्य साधन, भौतिक, आर्थिक एवं सैन्य, अपने यथार्थ उद्देश्य को तभी पाएंगे जब उनका नेतृत्व चैतन्य द्वारा होगा, आत्मिक सत्य एवं धर्म की शक्ति द्वारा होगा। यह सब सुनने में अमूर्त विचार तथा अव्यवहारिक लग सकता है, उनको जिनमे धर्म को लेकर अगाध उत्साह है, जिन्हें बाह्य संघर्ष का मार्ग अधिक प्रभावकरी प्रतीत होता है। परंतु हमें प्राचीन धर्मयुद्ध स्मरण करना चाहिए जो सर्वप्रथम मनस, बुद्धि तथा आत्मा की युद्धभूमि पर लड़ा गया था। श्रीकृष्ण सर्वप्रथम अर्जुन को धर्म की विशाल आत्मीय अनुभूति तक लाते हैं, आत्मा के बृहत सत्य तक लाते हैं, और उसके पश्चात ही वह अर्जुन को युद्धभूमि में शत्रुवध एवं विजय की प्राप्ति के लिए भेजते हैं। भगवद गीता केवल रूपक नहीं है, यह प्रत्येक शब्द तथा वाक्य में वास्तविक सत्य है। यद्यपि ऐसा प्रतीत होता है की आधुनिक विद्वानों में गीता की मनोवैज्ञानिक रूपक के रूप में व्याख्या करने का चलन चल गया है, पर हमें इस सबसे विचलित नहीं होना चाहिए; गीता प्रत्यक्ष रूप से वास्तविक सत्य है। अर्जुन का जिस धर्मयुद्ध के लिय आह्वान किया गया था वह जितना वास्तविक तब था उतना ही वर्तमान में भी है; अधर्म की शक्तियां उग्र रूप से, पूर्वकाल की अपेक्षा और भी अधिक प्रचण्डता एवं विकरालता से वर्तमान में कार्यरत हैं। हमें आज एवं अभी गीता का वास्तविक रूप से अपने ब्रहमास्त्र के रूप में उपयोग करने की आवश्यकता है। और वर्तमान में यह आवश्यकता पूर्व काल की किसी भी आवश्यकता से अधिक है। गीता के गूढ़ आध्यात्मिक संदेश को धर्मयुद्ध के ऐसे विकट समय में त्यागना और विनाश के शस्त्रों की तरफ भागना सर्वथा उजड्डपना होगा। गीता हमारे कर्म और कर्मशैली की नियमावली है, युद्ध की पूर्ण रणनीति है, विजय का आश्वासन है। और यह रणनीति यथार्थ में क्या है? यह केवल दो बिंदुओं में संक्षिप्त किया जा सकता है : सर्वप्रथम, स्वयं को स्वयं के सत्य में स्थापित करो, आत्मस्थित बनो। यह अत्यंत महत्वपूर्ण है। स्वयं को धर्म में दृढ़ता से स्थापित हुए बिना, धर्मयुद्ध में जाना, सैनिकों का बिना किसी प्रशिक्षण के युद्ध में जाने से भी अधिक अश्रेष्ठ है। आत्मस्थित होना एक अमूर्त विचार नहीं है, श्री कृष्ण ने अर्जुन को पूर्ण स्पष्टता से इसका बोध कराया था; वास्तव में यह विजयप्राप्ति का अचूक मार्ग है। आत्मा ही बल और ज्ञान का परम स्रोत है, वह योद्धा को पूर्णतः एक अन्य स्तर तक अवरोहित कर देती है। आत्मा इस धर्मयुद्ध की परिस्तिथीयों को पूर्णतः परिवर्तित करने का एकमात्र मार्ग है। द्वितीय, आत्मस्थित होने के पश्चात, युद्ध के निष्कर्ष को ईश्वर को समर्पित कर दो, विजय प्राप्ति की समस्त व्यक्तिगत माँग का त्याग कर दो और ईश्वर के अनंत बृहत् ज्ञान एवं दृष्टि पर अपना विश्वास स्थापित कर दो, जो कि अचुक रूप से विश्व में समस्त जीवन का मार्गदर्शन करता है। जब हम यह करते हैं, तब हम वास्तविक एवं व्यवहारिक रूप से स्वयं को ईश्वर के प्रत्यक्ष मार्गदर्शन एवं प्रेरणा के लिए प्रस्तुत करते हैं, हम इस विशाल ईश्वरीय शक्ति की प्रकिया में निमित्त बन जाते हैं और अपने अत्यल्प यंत्रों एवं साधनों तक सीमित नहीं रहते। यह कार्य अतिसरलता से किया जा सकता है अगर हमें इस गहन सत्य का बोध हो जाए की धर्म एवं धर्म युद्ध अंततः मनुष्य जाति के हाथ में नहीं बल्कि ईश्वर के हाथ में हैं। अगर धर्म सच में सनातन है तो उस की सुरक्षा सनातन चैतन्य के द्वारा होगी। हम केवल निमित्त मात्र हैं, चाहे हमें अच्छा लगे या ना लगे। वह जो ईश्वर की ब्रह्मण्डिया दृष्टि में घटित हो चुका है अंततः जगत में वही होगा। निमित्त के रूप में हमारा कार्य, अपनी बुद्धि एवं हृदय को, अपनी इच्छा एवं कर्म को, ईश्वर के प्रति संरेखित रखना है और युद्धभूमि में इस अंतर ज्ञान के कवच की सुरक्षा के साथ उतरना है, जिसका सामना किसी भी प्रकार की बाह्य शक्ति नहीं कर सकती।  इस प्रकार से हम धर्म के परम योद्धा में रूपांतरित हो जाते हैं। युद्ध में जाने के पूर्व इस विषय पर मनन करना अति आवश्यक है। Read Original Article in English
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The Mystery of Ganesha
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श्री गणेश का गूढ़ रहस्य

प्रतीक एवं उसका सार यह संवाद एक ऋषि एवं उनके तीन शिष्यों के मध्य पुरातन काल के एक आश्रम में हुआ था। ऋषिवर अपने युवा शिष्यों को श्री गणेश के रहस्य की गहनता के दर्शन कराते हैं। शिष्य ऋषिवर को आचार्य कह कर सम्बोधित कर रहे हैं। शिष्यों के नाम तो उपनिषद की कहानियों में जीवित हैं, परंतु यह ऋषिवर, उन कुछ ऋषिओं की भांति अज्ञात हैं जिन्होंने सर्वोच्च सत्य को पृथ्वी पर धारण किया था। ऐसे ऋषि, दीर्घ काल पूर्व ही नाम और रूप से परे जा चुके हैं। वह गणेश चतुर्थी से एक दिवस पूर्व की संध्या थी। सूर्यदेव क्षितिज पर नारंगी प्रकाश के रूप में विद्यमान थे। वृक्षों के मध्य से सरसराती हुई प्रवाहित हो रही मंद पवन को छोड़कर, आश्रम में और कोई हलचल नहीं थी। ऋषिवर के युवा शिष्य वटवृक्ष की छाया में विश्राम कर रहे थे। उनके ओजस्वी आचार्य, ऐसे प्रतीत हो रहे थे जैसे शांत ध्यान अवस्था में हों। कुछ दूर से उन्हें गायों की घंटियों की ध्वनि सुनाई दे रही थी, जो सम्भवतः अभी भी चर रहीं थीं। अरुणी, जो कि आचार्य के सबसे युवा शिष्यों में से था, ने नमन के लिए अपने हाथ जोड़े तथा अपने कण्ठ को निर्बाध किया। वह संध्या की शांति को भंग नहीं करना चाहता था इसलिए उसने मंद स्वर में पुकारा, “आचार्य?” आचार्य के अपने चक्षु खोले और अरुणी की ओर देखकर मुस्कुराते हुये कहा, —- “हाँ, अरुणी?” “क्या श्री गणेश सच में हैं या यह केवल एक आध्यात्मिक दन्तकथा है?” “अरुणी, सच क्या है?” “मेरा पूछने का अर्थ था, क्या वह सच में ईश्वर हैं?” “और ईश्वर क्या है?” ऋषिवर ने अपने नेत्र में एक चमक के साथ प्रश्न किया। अरुणी शांत रहा; उसे अच्छे से पता था की उसने अगर उत्तर दिया तो वह आचार्य की फाँस में आ जाएगा। ऋषिवर ने कुछ क्षण प्रतीक्षा की, उनके नेत्रों में वह नटखट सी चमक अभी भी थी। उन्हें प्रायः अपने इन किशोर शिष्यों को स्पष्ट प्रशनों से, जिनके उत्तर नहीं दिए जा सकते थे, छेड़ने में आनंद मिलता था, और ऐसा प्रतीत होता था की शिष्यगण इस के आदि थे। “ईश्वर,” आचार्य ने अपनी कोमल, मधुर वाणी में कहा, “वत्स, वह सर्वविद्यमानता है जिसमें समस्त ब्रह्माण्ड प्रवाहमान है। यह सर्वविद्यमानता सर्वव्यापी है, नित्य है। तो फिर क्या या कौन ईश्वर नहीं है?” शिष्यों ने सिर हिलाते हुए सहमति प्रकट की। पता नहीं क्यों, जब जब आचार्य ईश्वर के सम्बन्ध में कुछ वर्णन करते थे, उन्हें एक शांत विशालता के भाव का अनुभव होता था। उन्होंने कई अवसरों पर इसका अनुभव किया था। “वत्स, श्री गणेश एक द्वार हैं, उद्घाटन हैं इस सर्वविद्यमानता की ओर,” ऋषिवर ने आगे वर्णन किया, “श्री गणेश एक सांसारिक या दिव्य व्यक्ति नहीं हैं, परन्तु वह एक द्वार हैं जिसमें हम प्रवेश कर सकते हैं, अनंत रूप से! श्री गणेश का कोई अंत नहीं है।” “ क्या वह गज-ईश्वर…?” उपमन्यु, अरुणी से कुछ साल बड़े उसके मित्र, ने सकुचते हुए ऋषिवर की ओर देखकर कहा। “गज-ईश्वर, निसंदेह” ऋषिवर मुस्कुराए, “वह न तो गज हैं और ना ही ईश्वर!” किशोर शिष्य अब जिज्ञासु प्रतीत हो रहे थे। ऋषिवर कुछ क्षण के लिए चुप रहे। जैसे जैसे आकाश का वर्ण श्याम हुआ, गायों की घंटीयों का संगीत धीमा होता गया। कुछ क्षण मौन में बिताने के बाद ऋषिवर फिर से बोले : “श्री गणेश हमें अचिंत्य, अव्यक्त एवं अनंत रूप में ज्ञात हैं। क्या तुम जानते हो इन शब्दों के अर्थ क्या हैं?” “अचिंत्य वह है जिसके बारे में चिंतन या विचार नहीं किया जा सकता, वह विचार से परे है।” उपमन्यू ने कहा। “अव्यक्त,” अरुणी के कहा, “जो व्यक्त नहीं है, जो अभिव्यक्त नहीं है। और अनंत वह है, जिसका अंत नहीं है, शाश्वत।” “निसंदेह,” ऋषिवर ने कहा, “और इसलिये, उसका कोई रूप नहीं होता, कोई गुण नहीं होता, ना कोई अस्तित्व होता है, जैसा की तुम्हें या मुझे ज्ञात है!” “कोई अस्तित्व नहीं?” वरुण के प्रश्न किया। वह ऋषिवर का सबसे ज्येष्ठ शिष्य था, जो अब तक एक दार्शनिक बन चुका था। “वह जो किसी भी स्वरूप में उपस्थित नहीं है, वह अव्यक्त है – वरुण; तथापि, हमारी मानव चेतना के लिए वह अस्तित्वहीन है। यह एक गहन विषय है,” ऋषिवर के कहा, “श्री गणेश को परब्रह्म के वास्तविक रूप के रूप में जाना जाता है, परब्रह्म रूप:!” “परब्रह्म,” अरुणी ने कहा, “जो अवश्य ही निराकार है। तो निराकार का आकार कैसे हो सकता है, आचार्य?” “अगर तुमने यह समझ लिया, अरुणी,” ऋषिवर ने कहा, “तो तुम श्री गणेश को समझ जाओगे और यह भी समझोगे की उन्हें गज रूप में क्यों दर्शाया गया है।” “आचार्य,” अरुणी उसी क्षण बोला, “अब मैं यह रहस्य जानने के लिए अत्यधिक उत्सुक हूँ। कृपया हमें बताएं!” “यह निराकार वास्तव में निराकार नहीं है। सर्वप्रथम यह जानो। मानव चेतना केवल भौतिक या मानसिक रूप का बोध कर सकती है : वह रूप जो बाहर से हमें दिखाई देता है अथवा वह रूप जो हमारे मन एवं कल्पना में उत्पन्न होता है। इन प्रकट रूपों से परे भी एक रूप है, व्यक्त से परे, जो मन और इंद्रियों के लिए अव्यक्त है, पर अंतर चेतना के समक्ष स्पष्ट और व्यक्त है। यही है जिसको स्वरूप की संज्ञा दी गई है।” “क्या स्वरूप का बोध कभी सम्भव है, आचार्य?” अरुणी ने प्रशन किया। “अवश्य पुत्र, स्वरूप को वह जान सकता है जो स्वयं वो बन जाए जिसे वह जानना चाहता है। हमारे पूर्वजों ने इसे तदात्मय ज्ञान की संज्ञा दी है — आप जिसका बोध करते हैं वह आप बन जाते हैं, जैसे की जो आप बन जाते हैं उसका आपको बोध हो जाता है।” फिर ऋषिवर ने धीरे से उच्चारण किया, अधिकतर स्वयं से ना की शिष्यों की ओर— “अजम निर्विकलपम् निराकारमेकम… श्री गणेश अजन्में हैं, अपरिवर्तनीय एवं निराकार हैं… और उनके लिए जिनके पास आध्यात्मिक दृष्टि है, योग की दृष्टि है, उनके लिए गणेश साक्षात उस सर्वविद्यमानता की चेतना के रूप में ज्ञात हैं। वह स्वयं दिव्य शक्ति हैं, जो ब्रह्मांड को चलायमान करती है तथा वह भँवर हैं जिसमें समस्त ब्रह्मांड विलीन होगा…इस लिए यह कहा जाता है की उनका जन्म शिव और पार्वती से हुआ है, स्वयं परमेश्वर और उनकी शक्ति से।” वातावरण जैसे विद्युत से प्रभारित हो गया हो, ऋषिवर अपने रहस्यमय उच्चारण के पश्चात अपने आसन में स्थिरता से विराजमान थे; उनके नेत्र बंद थे और ऐसा प्रतीत हो रहा था कि वे किसी और लोक मैं हैं, जैसे कि गणेश में तल्लीन, ब्रह्म के किसी अगम्य आयाम में। तीनों किशोर शिष्य प्रतीक्षारत थे, प्रायः तन्मय अवस्था में लीन। एक अनंत प्रतीत होने वाली कालवधि के पश्चात, आचार्य बोले, “ दैवीय इच्छा और कृपा के बिना श्री गणेश का बोध कोई नहीं कर सकता, क्योंकि गणेश, जो कि दिव्य जोड़ी की प्रथम संतान हैं, उनका बोध स्वयं दिव्य ईश्वर को जानने के समान है। वह साधक जो गणेश पर ध्यान लगाता है और उनकी प्राप्ति करता है, वास्तव में शिव एवं उनकी शक्ति की प्राप्ति करता है।” “अब मैं तुम्हें प्रत्यक्ष रूप से बताता हूँ कि पार्वती के प्रतीक, दिव्य शक्ति से निर्मित, गणेश कैसे सृष्टि में अवतरण करते हैं। मेरे इन शब्दों का ध्यानपूर्वक श्रवण करो और उन पर मनन करो — क्योंकि यह शब्द जिन्हें मैं व्यक्त कर रहा हूँ इनके पीछे, सत्य की शुद्ध शक्ति विद्यमान है, और तुम्हें इस शक्ति को अवश्य ही स्वयं में सम्मिलित कर लेना चाहिए। वास्तव में, इसी शक्ति से, ना कि तुम्हारी बुद्धि या पूर्व ज्ञान से तुम गणेश के सत्य का साक्षात्कार करोगे।” इस प्रकार बात करते हुए, ऋषिवर ठहरे ताकि ये शब्द किशोर शिष्यों के अंतर में समा सकें। प्रत्येक शिष्य को ऐसा अनुभव हुआ कि जैसे आचार्य के शब्दों के द्वारा विद्युत उनके सूक्ष्म शरीर में प्रवेश कर रही थी। प्रत्येक को यह ज्ञात था कि कभी कभी आचार्य बुद्धि के स्तर से नहीं पर चेतना के उस स्तर से बोलते हैं जहाँ पर विचारों या वाणी के किसी भी हस्तक्षेप के बिना, जो प्रत्यक्ष रूप से दृष्ट होता है वही प्रत्यक्ष रूप से व्यक्त होता है। “श्री गणेश को गणपति के नाम से भी जाना जाता है — गणों के स्वामी,” आचार्य ने आगे बोला, “गण का अर्थ है समूह या झुंड। यह समस्त ब्रह्माण्ड समूहों एवं झुंडों से निर्मित है। वह परमाणु जिससे सारा भौतिक जगत निर्मित है, वह स्वयं सूक्ष्म परमाणु कणों का एक समूह है; जब तुम ब्रह्मांड के सूक्षमतम मापक्रम तक पहुँच जाओगे जहाँ पर दिक् और काल लुप्त हो जाते हैं, तुम देखोगे कि वहाँ केवल शक्ति के अदृश्य चक्रवात हैं जो स्वयं सूक्ष्म शक्ति-क्षेत्रों के समूह हैं। जैसे जैसे तुम मापक्रम में ऊपर जाते हो, तुम देखोगे कि यह समूह बड़े होते जाते हैं, सूक्ष्म शक्ति-क्षेत्रों से सूक्ष्म परमाणु कण, सूक्ष्म परमाणु कणों से अणु, अणुओं से वायुरूपी द्रव्य और वायुरूपी द्रव्य से तारे, और तारों से आकाशगंगाऐं। ब्रह्मांड को ध्यान से देखो और तुम्हें सब ओर समूह ही दृष्ट होंगे। सकल दिक् और काल समूहरूप हैं, कुछ प्रत्यक्ष हैं, परंतु बहुधा अप्रत्यक्ष हैं। तुम्हारे स्वयं का भौतिक शरीर भी कोशिकाओं, ऊतकों, अंगों का समूह है। पृथ्वी के समस्त जीव समूह ही हैं, रोगाणुओं एवं जीवाणुओं के विनीत समूहों से ले कर स्तनधारी पशुओं एवं मनुष्यों तक; और फिर व्यक्तियों के समूह, जन जातियों के, गाँव के, नगरों के और राष्ट्रों के समूह।” “हमारे स्वयं के अंदर, मानसिक स्तर पर, हमारी अनुभूति की इंद्रियाँ एवं कर्म की इंद्रियाँ, ज्ञानेन्द्रियां एवं कर्मेन्द्रियाँ, भी समूह ही हैं। मन इंद्रियों को नियंत्रित करता है। बुद्धि, जो की विवेक शक्ति है, मन को नियंत्रित करती है। तथापि, दस इंद्रियाँ, मन एवं बुद्धि मिला कर बारह बनते हैं और इन सबके समूह को अंतर्गण की संज्ञा दी गयी है।” “अस्तित्व के प्रत्येक स्तर पर,” आचार्य ने आगे कहा, “ऐसे समूह हैं। इसी तरह से सृष्टि या ब्रह्मण्डीय प्रकटीकरण विभेदित एवं व्यवस्थित है। और श्री गणपति गणेश इन सब समूहों के स्वामी या ईश्वर हैं। क्या तुम इस के सत्य को देख पा रहे हो? श्री गणेश वह शक्ति हैं जो इन सब अनेक समूहों को एक साथ रखते हैं, वह धर्म हैं, सभी समूहों को साथ बाँधने वाली शक्ति हैं और उन के बिना जिस विश्वब्रह्मांड को हम जानते हैं, वह सरलता से टूट कर बिखर जाएगा।” ऋषिवर के शब्द इतने स्पष्ट थे कि किशोर शिष्य जो सुन रहे थे उसे प्रायः देख भी पा रहे थे। चेतना की उस शक्ति के द्वारा जिसका ज्ञान केवल इन चेतना के सिद्ध पुरुषों को ही होता है, ऋषिवर के वाक्, शिष्यों की साक्षात दृष्टि में परिवर्तित हो गए। जो श्रवण किया वह दृष्ट हो गया। इसीलिए चेतना के सिद्ध पुरुषों को द्रष्टा कह कर संबोधित किया जाता है। “आचार्य, क्या श्री गणेश का प्रत्यक्ष ज्ञान प्राप्त करना सम्भव है?” उपमन्यू ने उत्कटता से पूछा। ऋषिवर अपने शिष्य की ओर व्यापकता से मुस्कुराए, प्रत्यक्ष था कि प्रशन के पीछे की शक्ति से वह प्रसन्न थे। ”हाँ पुत्र,” ऋषिवर ने उत्तर दिया, “सब कुछ संभव है यदि एक व्यक्ति अपने व्यक्तित्व की समस्त ऊर्जा को अपनी इच्छाशक्ति एवं अभिप्सा में ध्यान केंद्रित कर दे। तपस [1] तुम्हारे व्यक्तित्व की शक्ति है और संकल्प तुम्हारी इच्छाशक्ति एवं अभिप्सा है। जब तपस को संकल्प पर केंद्रित किया जाता है, तब जो भी मन में धारित है वह आत्मा में साध्य हो जाता है। यह योग का गुप्त रहस्य है पुत्र।” संक्षिप्त व्याख्या का उद्देश्य तुरंत सिद्ध हो गया : सभी शिष्यों ने एक साथ एक धीमी एवं केंद्रित शक्ति की गति का अनुभव किया जो उनकी रीढ़ में अरोहित हो रही थी, निम्न चक्रों से ऊपर आज्ञा चक्र की ओर, भ्रूमध्य में – भौहें के मध्य का केंद्रबिंदु। तीनो शिष्यों के मन तत्काल शांत एवं ध्यान केंद्रित हो गए। “कल गणेश चतुर्थी है”, आचार्य ने सहज भाव से आगे कहा, अपने शिष्यों का आशय से अवलोकन करते हुए, जैसे की प्रत्येक की अंतर तत्पर्ता को परख रहे हों, “और कल ही तुम श्री गणेश की ओर प्रथम निर्णयात्मक सोपान कर सकते हो। मेरे गुरु कहते थे कि साधना प्रारम्भ करने का सर्वोच्च समय वह क्षण है जिस क्षण अभिप्सा या प्रशन व्यक्ति की बुद्धि में उदित होता है।” पुनः आचार्य ने शब्दों के शिष्यों के मन में गहनता से प्रवेश करने की प्रतीक्षा की, जैसे कि बहुत ध्यान से साधना भूमि को तैयार कर रहें हों, अधिकतम ध्यान एवं सावधानी से बीजारोपण करते हुए। वास्तव में, गुरु की कृपा असीम है। “मेरे बच्चों, समझो,” ऋषिवर ने कहा, “की चतुर्थी का क्या अर्थ होता है। तुम अपनी जागृत अवस्था से तो परिचित हो, और स्वप्न अवस्था से भी, एवं सुशुप्ति अवस्था – गहन निद्रा अवस्था से भी। इन अवस्थाओं की जानकारी तुम्हें अपनी दिनचर्या के अनुभव से है, तथा मैंने तुम्हें इन अवस्थाओं और इन के बीच के पारगमन के प्रति अत्यंत सचेत होने की शिक्षा दी है। पर एक चतुर्थ अवस्था भी है जिसका अनुभव तुम्हें अभी नहीं हुआ है, एक अवस्था जो तब तक अपने को प्रकट नहीं करती जब तक एक व्यक्ति की अंतर चेतना साधना के द्वारा पूर्णत: परिपक्व नहीं होती।” जैसे उनके मनों की शांति और गहन होती चली गयी, आचार्य ने आगे कहा: “चतुर्थी – तीन अवस्थाओं – जागृत, स्वप्न और सुशुप्ति के परे की अवस्था है – चतुर्थ अवस्था। यह ही चतुर्थी का गुप्त या अंतर महत्व है, मेरे बच्चों। चतुर्थी की प्राप्ति ही हमारे योग की अभिप्सा है, सदा चतुर्थ अवस्था में स्थित रहना, तुरिया अवस्था [2], जैसे हमारे पूर्वज सम्बोधित करते थे।” आचार्य ने एक बार फिर विराम लिया। अब तक अँधेरा हो चुका था और पूरा आश्रम एक गहन शांति से आवृत था। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि तीनो शिष्य आकाशीय ज्ञान से प्रकाशमान थे जो कि ऋषिवर की अर्ध-उद्घाटित चक्षुओं से प्रवाहित हो रहा था। बाह्य एवं अंतर रूप से सब स्थिर था। “केवल तब जब हमारा अंतरमन विचारशून्य हो जाता है और पूर्ण चेतना स्थिर हो जाती है, तब हम तुरिया अवस्था में प्रविष्ट होते हैं। यह चतुर्थी की साधना है — अपने मन को सर्वथा स्थिर बना लो, विचारशून्य, एकमात्र दिव्य ईश्वर की ज्योति की ओर केंद्रित – ज्योति: परस्य। एकमात्र वह ज्योति तुम्हें माया की महारात्रि से परे ले जाएगी, सत्य के नित्य प्रभात की ओर। इस प्रकार से अंतर मौन तक पहुँचने के लिए, मन को विचारों से मुक्त करने के लिए, व्यक्ति को उपवास करना होता है। यह चतुर्थी का प्रतीकात्मक उपवास है। उपवास केवल एक दिन तक भोजन का त्याग करना नहीं है परंतु स्वयं को इच्छा एवं द्वेतभाव की लीला से ऊपर के स्तर पर स्थापित करना है, प्रतीक स्वरूप तथा न्यूनतम एक दिवस के लिए। उपवास शब्द का ध्यानपूर्वक श्रवण करो — उप का अर्थ है निकट, जैसे की उपनिषद शब्द में उप, और वास यानी रहना या पालन करना। तथापि, जो व्यक्ति उपवास करता है, वह बाह्य जगत एवं उसके सब बाह्य एवं अंतर विकर्षणों से पृथक हो जाता है, और जिसके लिए वह उपवास करता है, चेतना में वह उस के निकट रहता है। मेरे बच्चों, इसलिए मैं तुम्हें यह कहता हूँ, उपवास के पूर्ण ज्ञान के साथ श्री गणेश के लिए चतुर्थी का उपवास रखो। यह बहुत कम महत्व रखता है कि तुम भोजन ग्रहण करते हो या नहीं; महत्व है ‘भोजन’ या अन्न का, जो तुम अपने मन और इंद्रियों को ग्रहण करने के लिए दोगे। जब तुम उपवास करते हो, तब तुम अपने मन और इंद्रियों का उपवास करते हो, और वह उपवास एक शुद्धि, एक परिमार्जन एवं एक दिव्य चेतना की तैयारी है। इसलिए सब प्रकार के उपवास शुद्धिकरण हैं। श्री गणेश के लिए उपवास करने का अर्थ है श्री गणेश की निकटता में वास करना, श्री गणेश को अपने मन एवं हृदय में स्थापित करना। यह गणेश चतुर्थी की वास्तविक महत्वपूर्णता है, मेरे बच्चों!” आचार्य शांत एवं स्थिर अवस्था में चले गए, और आचार्य का शांत भाव उनके भौतिक शरीर की सीमाओं के बाहर प्रवाहित होता प्रतीत हो रहा था तथा धीरे से शिष्यों के अंतरतम व्यक्तित्व को पल्लवित कर रहा था। शिष्यगण अत्यंत सौभाग्यवान थे, गुरु की जीवंत उपस्थिति के लाभार्थी, गुरु के शांतभाव एवं कृपा का पूर्णत: सेवन कर रहे थे, और अपनी चेतना के किसी लघु परंतु प्रबुद्ध अंश में, वह अपने आचार्य के साथ एकत्व का अनुभव कर रहे थे। अपने आचार्य के साथ कुछ अवधि के अन्तर योग के पश्चात, अरुणी ने अपने नेत्र खोले और फिर से पूछा : “श्री गणेश के जन्म का क्या रहस्य है आचार्य? यह एक गूढ़ रहस्य प्रतीत होता है, जिसे हम अंतर्ज्ञान के द्वारा केवल देखना प्रारम्भ कर पा रहे हैं। निराकार एवं अव्यक्त का जन्म कैसे हो सकता है?” आचार्य मुस्कुराए और एक विराम के पाश्चात्य बोले — “तुमने बहुत समझदारी से प्रशन किया है, वत्स। नित्यस्वरूपी का ना जन्म है ना मृत्यु, ना आना ना पार जाना, ना आरोहण ना अवरोहण, यह नित्यरूपी गतिशून्य भी है, अपरिवर्तनीय एवं अकारण भी है। तो श्री गणेश के जन्म का क्या रहस्य है? प्राचीनकाल से यह कहा जाता है कि उनका सृजन सर्वोच इश्वरी माँ, पार्वती के शरीर पर जमा हुए मैल से हुआ था। और माँ, जिन्हें एकाकी भाव सता रहा था, उन्हें संतान की कामना थी जो उनका सहयोगी बने। स्पष्ट रूप से, दिव्य माँ को एकाकी भाव नहीं सता सकता : यह एकाकी भाव ऋषिकवि की एक सांकेतिक अभिव्यक्ति है नित्य एकांत भाव की, अद्वितीयता के सम्पूर्ण एकांत की। हमें यह स्मरण रहना चाहिए कि पार्वती जो शिव की, स्वयं ईश्वर की, अर्धांगिनी हैं, सदा शिव के साथ अंतरएकत्व की वासी हैं, क्योंकि ईश्वर की शक्ति ईश्वर के अंतर में इसी प्रकार वास करती है। अर्थात्, बृहत् माँ का एकाकी भाव वास्तव में स्वयं को व्यक्त करने की ईश्वरीय इच्छा की अभिव्यक्ति है, एक के अनेक बनने की प्रक्रिया। इसी प्रक्रिया से स्वयं शिव, शक्ति के गर्भ से ब्रह्माण्ड का प्रकटन करते हैं। इसलिए श्री गणेश वास्तव में प्रथम निर्मित हैं, प्रथम संतान, जो स्वयं इस ब्रह्मांड का रूप ले लेते हैं। ऐसा नहीं है कि गणेश ब्रह्मांड को उत्तपन्न करते हैं, स्वयं गणेश का व्यक्ति-करण ही ब्रह्मांड है। यही है जो हमें समझना है, मेरे बच्चे। फिर तुम्हें ज्ञात होगा कि क्यों और कैसे श्री गणेश गणपति हैं और श्री गणेश स्वयं सर्वत्र विद्यमान सर्वविद्यमानता हैं, और क्यों वह स्वयं इस विशाल सर्वविद्यमानता के द्वार हैं। इस ज्ञान के साथ, इस चतुर्थी श्री गणेश पर अपना ध्यान केंद्रित करो।” शिष्यों ने आचार्य के शब्दों को गहन आनंद के साथ स्वीकार किया, जैसे शब्द स्वयं ही उनके अन्तर में आनंद के गहन स्रोत का उद्घाटन कर रहें हो, जैसे यह बोध स्वयं ईश्वर के आनंद स्वरूप था। “क्या वास्तव में उनका शिर काट दिया गया था?” वरुण ने, पूर्वकाल की एक कथा के बारे में विचार करते हुए पूछा। जिस कथा में शिव ने, क्योंकि वह गणेश का अपने पुत्र के रूप में अभिज्ञान नहीं कर पाए, अपने त्रिशूल से उनका शिर शरीर से पृथक कर दिया था, क्योंकि गणेश ने उन्हें पार्वती की ओर जाने से रोका था। आचार्य ने शिष्यों को फिर से कहा: “यहाँ एक रहस्य है जिसे हमें समझना चाहिए। आओ थोड़ा समझने का प्रयास करते हैं। शिर किस का निरूपण करता है, वरुण?” “मनस, बुद्धि, आचार्य,” वरुण ने उत्तर दिया। “हाँ, अवश्य,” आचार्य ने कहा, “शिर मनस, चित्त, बुद्धि एवं अहंकार का प्रतीक है। यह शिर हमारी समस्त समस्याओं की जड़ है, अगर हम इसे एक प्रतीक समान समझें। अतः गणेश के शिर को शरीर से पृथक करना समस्त समस्याओं की जड़ के नाश का प्रतीक था, व्यक्तिगत मनस, चित्त, बुद्धि एवं अहंकार का नाश। और शिव के उस त्रिशूल का स्मरण रखो जिससे शिव ने गणेश का शिर काटा था… शिव का त्रिशूल, जो कि प्रकृति के तीन गुणों का प्रतीक है।।” “हाँ आचार्य,” अरुणी ने कहा, “मैं स्पष्टता से देख सकता हूँ। यह अतिसुन्दर काव्य है, आचार्य!” “काव्य वास्तव में क्या है, स्वयं सत्य की प्रेरणास्वरूप अभिव्यक्ति ही तो है?” ऋषिवर ने पूछा, “कवि ही दृष्टा है। भारतीय संस्कृति की समस्त ज्ञान एवं प्रज्ञता हम तक हमारे कवियों के माध्यम से ही पहुंची है, वह जिन्होंने अपनी दिव्य दृष्टि के द्वारा सत्य का साक्षात्कार किया और उस सत्य के कुछ अंशों को अपनी चेतना में ला पाए और उसे शब्द एवं वाक में परिवर्तित कर पाए। इस तथ्य को अंकित कर लो कि वह श्री गणेश ही हैं जिनका ऋषिकवि, अपनी महान कविताओं की अभिव्यक्ति आरंभ करने से पूर्व, आह्वान करते हैं!” “वास्तव में, आचार्य!”, उपमन्यु ने कहा, “ऐसा क्यों?” “क्या यह इस कारण नहीं,” अरुणी ने उपमन्यु से कहा, “कि श्री गणेश द्वार हैं, ईश्वर की सर्वविद्यामानता एवं सर्वज्ञान के लिए?” “और,” वरुण ने एक और प्रश्न पूछा, “श्री गणेश का आह्वान सर्वप्रथम क्यों किया जाता है, अन्य देवी देवताओं से पूर्व?” “हाँ, सत्य है,” आचार्य ने कहा, “ऐसा ही है। श्री गणेश उद्घाटन हैं, द्वार हैं तथा उनके आह्वान के अभाव में, व्यक्ति को उन सभी शक्तियों और प्राणियों के विरुद्ध संघर्ष करना पड़ता है, जो हमारी साधना और कार्य का विरोध करती हैं। परंतु श्री गणेश के आह्वान से आरम्भ हो, तो व्यक्ति सभी विरोध एवं शत्रुता, सब समस्याओं, बाह्य एवं अंतरतम, को काटता हुआ अतिशीघ्र ही लक्ष्य तक पहुँच जाता है। जैसे कि श्रीगणेश की कृपा एवं शक्ति, कर्म और योग के सारे पथ खोल देती है तथा सारे अवरोध और कठिनाई हटा देती है। तथापि, श्री गणेश को अविघ्न एवं सिद्धिदाता के रूप में भी जाना जाता है, विघ्नों का नाश करने वाले एवं सर्वसफलता एवं प्राप्तियों के दाता।” “फिर शिर विघटन के पश्चात क्या होता है, आचार्य? गज का शिर क्यों?” वरुण ने फिर से प्रश्न किया। “यह विशेष रूप से रहस्यपूर्ण है,” आचार्य ने कहा, “गज का शिर ही क्यों? स्पष्ट प्रतिकवाद के अतिरिक्त, एक गज शिर शक्ति एवं बल का, ज्ञान एवं प्रज्ञता का प्रतीक है, यह ऋषि की एक सविचार काव्य युक्ति है, यह दर्शाने के लिए कि मनस, चित्त, बुद्धि, अहंकार के प्रतीक विघटित शिर के स्थान पर किसी और शिर का स्थापन नहीं हो सकता, क्योंकि उस प्रतिरूप को तो तोड़ना है, उस साँचे को अवश्य ही ध्वस्त करना चाहिए। तथापि एक गज का शिर — पूर्णतः विसंगत, पूर्णतः असाधारण और पूर्णतः उत्तेजक है। यह गहन एवं सम्मोहक आयात है — शिर का प्रस्थान अतिआवश्यक है, और सदा के लिए; कोई प्रतिस्थापन नहीं, कोई विकल्प नहीं है। यहाँ एक प्रतीकात्मक महत्व है पर उसे अत्यधिक गम्भीरता से नहीं लिया जाना चाहिए। इसे एक काव्य अलंकार के रूप में लेना चाहिए।” “अर्थात्,” वरुण ने ध्यान अवस्था से टिप्पणी की, “शेष गज-शरीर भी इसी प्रकार अलंकार होगा, एक प्रतीक और सुझाव जिससे अत्यधिक गंभीरता से नहीं लिया जाना चाहिए?” “अवश्य” ऋषिवर ने उत्तर दिया, “यह इसलिए क्योंकि प्रतिकवाद एक प्रकार की मनस-बुद्धि एवं स्वभाव वाले लोगों को आकर्षित करेगा ताकि वह अपनी भक्ति ईश्वर के कुछ विशेष गुणों पर केंद्रित कर सकें। उदाहरण के लिए, एक दंत, ऐसी ध्यान-अवस्था का प्रतीक है जिसमें व्यक्ति का ध्यान केवल एक वस्तु या विचार या विषय पर केंद्रित रहता है, विघटित दाँत उस सामर्थ्य का प्रतीक है जिसके द्वारा हम जो भी अनावश्यक है उसका त्याग करें, विशाल कान जो की गहन एवं सार्वलौकिक श्रवण के प्रतीक हैं, छोटा मुख वाणी की संयमता का प्रतीक है, विशाल उदर जो की सब कुछ ग्रहण और धारण करने की क्षमता का प्रतिनिधित्व करता है; उनके हाथ में धारित अंकुश या कुल्हाड़ी आत्मबोध का प्रतीक है क्योंकि उसमें बंधनों एवं अज्ञानता की समस्त गाँठों का विघटन करने का सामर्थ्य है, तथा पाश या रस्सी नियंत्रण का द्योतक है। किसी भी गूढ़ आध्यात्मिक उद्बोधन के लिए प्रगाढ़ नियंत्रण की आवश्यकता होती है क्योंकि इस उद्बोधन की प्रक्रिया में अगाध उर्जा का उत्पादन होता है।” “किन्तु प्रतीकवाद के परे गूढ़ आध्यात्मिक रहस्य है, कि निराकार का निरूपण साकार में हो ही नहीं सकता। श्रेष्टम् कविसुलभ या कलात्मक प्रतिरूप, आध्यात्मिक सत्य को प्रकट तो कर देंगे किन्तु यह प्रतिरूप समय के साथ क्षय तथा विकृत होकर आकारवाद एवं कर्मकांड का स्वरूप ले लेंगे। जिन्हे सूक्ष्म ज्ञान नहीं है वह अंततः केवल आकार को दृढ़ता से पकड़ लेते हैं और सार को भूल जाते हैं, जो सत्य स्वरुप है।” “इस सत्य, इस सार को, अपने हृदय में रखो : श्रीगणेश, जो परमात्मा के अंतर्यामी द्वार हैं, वह हमारे अंतर में हैं, हमें केवल अपने अंदर उनकी उपस्थिति का आह्वान करना है परमात्मा में प्रवेश के लिए…” अब वहां गहन शांति थी, अंतर में भी और बाहर भी, जैसे चैतन्य मन में कमल रूपी ज्ञान खिल गया हो। जैसे जैसे अंतर में ज्ञान पुष्य खिल रहा था, बाह्य जगत में अंधेरा बढ़ता जा रहा था। ऋषिवर फिर से उच्चारण करने लगे, गहन और धीरे, जैसे अपने अंतर की किसी अथाह चैतन्य की गहराई से स्वर निकाल रहे हों। ॐ नमस्ते गणपतायै  त्वमेव प्रत्यक्षम् तत्वम् असित्वमेव केवलम् कर्ता असित्वमेव केवलम् धर्ता असित्वमेव केवलम् भरता असित्वमेव सर्वम् खलुविदम् ब्रह्म असित्वम् स्कंद आत्मा असि नित्यम् (गणपति अथर्वशीर्ष, V.2) हे श्रीगणेशसब का एकमात्र व्यक्त सत्य एवं सार केवल आप हैं,केवल आप ही एकमात्र कर्ता है, आप ही एकमात्र पालनहार हैं,अंत में यह ब्रह्मांड आप में ही विलीन हो जाता हैं,एकमात्र आप ही अनंत एवं सर्वविद्यमान ब्रह्म हैं,एकमात्र आप ही शाश्वत व्यक्त आत्मा हैं। ॐ नमस्ते गणपतायै  Read Original Article in English 1तपस्तेज : तपस की, ध्यान केंद्रति आध्यात्मिक साधना का तेज़ अथवा शक्ति 2तुरिया : सरल भाषा में यह चतुर्थ अवस्था है, महाऋषि रमना इसे ‘जागृत सुशपती’ अवस्था कहते थे। कुछ योगीगण समाधि अवस्था को भी तुरिया अवस्था के समान मानते हैं।
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हिन्दू धर्म पर गहन चिंतन

“हिंदू धर्म… ने स्वयं को कोई नाम नहीं दिया, क्योंकि हिन्दू संस्कृति ने अपने लिए कोई सांप्रदायिक सीमाएं नहीं रखी; विश्व से अपने अनुसरण की कोई माँग नहीं रखी, किसी एक अचूक रूढ़ि का दावा नहीं किया, कोई एक संकरा मार्ग या मोक्ष का द्वार स्थापित नहीं किया; यह एक पंथ या सम्प्रदाय कम, बल्कि मानव आत्मा की ईश्वर की ओर बढ़ने की, उसके निरंतर विस्तृत होते प्रयास पर आधारित परंपरा ज़्यादा थी। आत्म साक्षात्कार एवं आत्म निर्माण का विशाल, बहु पक्षीय एवं बहु चरणीय प्रावधान, जिसके पास स्वयं को इस एक नाम से सम्बोधित करने का पूर्ण अधिकार था, और केवल एक ही नाम जो उसे ज्ञात था, सनातन धर्म ….” श्री अरविंद, भारत का पुनर्जन्म (India’s Rebirth) हिंदू धर्म और मानवता का भविष्य क्या एक धर्म-व्यवस्था समय के साथ विकासशील हो सकती है, अपने मूलतत्वों का संशोधन कर सकती है, और नवीन परिस्थितियों एवं माँगों के प्रति रचनात्मक ढंग से प्रतिक्रिया दे सकती है? या फिर एक धर्म- व्यवस्था को अपने संस्थापक या संस्थापकों द्वारा किए प्रकटीकरणों एवं मान्यताओं को निरंतर पुनरावृत्त करते हुए, सदा के लिए अपनी प्रारंभिक परिस्थितियों से बंधे रहना चाहिए? यदि मानव चेतना का समय के साथ विकास होता है, तो क्या धर्म-व्यवस्थाओं को भी विकसित नहीं होना चाहिए? क्या धर्म-व्यवस्थाओं का मानवता के लिए कोई विकासमूलक महत्व है? इन सभी अति महत्वपूर्ण प्रश्नों के उत्तर, व्यापक रुप से इन बातों पर निर्भर करेंगे कि वह धर्म-व्यवस्था कैसे आरंभ हुई और कैसे उसका समय के साथ विकास हुआ, इस धर्म-व्यवस्था के अनुयायी किस प्रकार उसका उपयोग अपने व्यक्तिगत आध्यात्मिक अन्वेषणों एवं यात्राओं के लिए कर पाए, या उन्हें करने दिया गया, धर्म-व्यवस्था के दिए गए अधिकारों की सीमाओं में। हमारी समीक्षा के प्रयोजन के लिए, हम धर्म-व्यवस्थाओं को गतिहीन या गतिशील श्रेणियों में बद्ध करेंगे। एक गतिहीन धर्म-व्यवस्था वह है जो की अपने संस्थापक या संस्थापकों से प्रत्यक्ष रूप से आरम्भ हुई केंद्रीय एवं स्थायी मान्यताओं के आधार पर व्यवस्थित है; एक गतिशील धर्म-व्यवस्था वह है जो की रहस्यपूर्ण एवं आध्यात्मिक है तथा वह मान्यताओं या मूल्यों की किसी विशेष व्यवस्था का पालन नहीं करती। अतः एक गतिशील धर्म-व्यवस्था विकासमूलक होती है जबकि गतिहीन धर्म-व्यवस्थाएँ अपरिवर्तनवादी होती हैं। परंतु यह हमेशा पूर्णतः सत्य नहीं होता। वास्तविकता में सत्य अधिक सूक्ष्म होता है। कोई भी धर्म-व्यवस्था पूर्णतः गतिशील या पूर्णतः गतिहीन नहीं है : सभी धर्म-व्यवस्थाओं में कुछ गतिशील तत्व एवं सम्भावनाएँ होती हैं तथा कुछ रूढ़िवादी तत्व एवं प्रक्रियाएँ होती हैं। किसी भी धर्म-व्यवस्था को यह बात गतिशील बनाती है कि प्रयोग एवं अभ्यास में किस प्रकार से विकासशील एवं रूढ़िवादी तत्वों का संतुलन बनाया जाता है, तथा समय के साथ किन तत्वों को महत्व दिया जाता है और किन तत्वों को महत्वहीन बनाया जाता है। संवेदनशीलता एवं अनुकूलन क्षमता निश्चय ही एक गतिशील एवं विकासमूलक धर्म-व्यवस्था के महत्वपूर्ण लक्षण होंगे, तथा जड़ता एवं कठोर अनुपालन एक गतिहीन धर्म-व्यवस्था के लक्षण होंगे। इस लेख के प्रारंभिक भागों में हम हिंदू धर्म का अन्वेषण करेंगे, यह जानने के लिए की उसकी विकासमूलक संभावनाएँ क्या हैं। और क्या वह इक्कीसवी शताब्दी की मानवता की लिए आध्यात्मिक रूप से प्रासंगिक रह सकता है? हिंदू धर्म और विकासक्रम : क्या एक धर्म-व्यवस्था समय के साथ विकसित हो सकती है?  अगर एक धर्म-व्यवस्था किसी विशेष अतिपवित्र परम्परा या अचूक ईश्वर मीमांसा, एक विशेष भविष्यवक्ता, मसीहा या शास्त्र से बंधी हुई है, तो यह स्पष्ट है कि वह विकसित नहीं हो सकती। एक धर्म-व्यवस्था को विकसित होने के लिए, उसे आवश्यक रूप से अपनी बहुत सारी परंपरागत मान्यताओं एवं प्रथाओं को पीछे छोड़ कर विकसित होना होगा। कोई भी वास्तविक विकास उन रूपों एवं सूत्रिकरणों को पीछे छोड़े बिना नहीं हो सकता, जो धर्म-व्यवस्था के अनुयायियों के लिए अप्रासंगिक एवं व्यर्थ हो चुके हैं। विकासशील होने के लिए एक धर्म-व्यवस्था को अपने आधारभूत मूल्य के रूप में सतत अनुसंधान भाव को एवं अनुभवात्मक आध्यात्मिक ज्ञान को अपने मूल के रूप में धारण करना ही चाहिए। हिंदू धर्म तार्किक रूप से एक ऐसी धर्म-व्यवस्था है जिसमें नवीन रूपों और अनुभव मंडलों में विकसित होने की एवं इक्कीसवीं सदी की मानवता के लिए अधिक अनुकूल समझ में विकसित होने की क्षमता है। और यह कार्य वह इस लिए‌‌ भी सटीक रूप से कर सकता है क्योंकि अपने 5000 वर्ष से अधिक के अस्तित्व काल में हिंदू धर्म केवल सतत संशोधन एवं विकास प्रक्रिया से ही विकसित हुआ है। हिंदू धर्म, श्री अरविंद के शब्दों में, सदा से ही मानव आत्मा के ईश्वर की ओर बढ़ने के प्रयास की एक विस्तृत होती परंपरा रही है। हिंदू धर्म इसी‌‌ प्रकार‌ से, आध्यात्मिक ज्ञान के एक विशाल एवं विभिन्न मंडल के रूप में, स्वयं को निरंतर विस्तृत करते हुए, मान्यताओं के कठोर अनुपालन की अपेक्षा अनुसंधान के असम्मत भाव पर बल देते हुए, और हठधर्मिता की अपेक्षा सत्य के चुनाव का आग्रह करते हुए, समय के साथ‌ विकसित हुआ है। हिंदू धर्म में प्रत्यक्ष आध्यात्मिक अनुभव का मूल्यांकन सदा से ही हठधर्मी मान्यताओं या शास्त्रीय संदर्भों से अधिक किया गया है। श्रुति (वह जो प्रकट एवं श्रुत अथवा‌ सुना जा सकता है), एवं साक्षात्कार (प्रत्यक्ष दृष्ट एवं ज्ञात) का सदा से ही हिंदू परंपरा में गहन महत्व रहा है और इन्हें अन्य सभी स्रोतों या प्रमाणों से उच्च माना जाता है। यहां यह तथ्य भी ध्यान देने योग्य है कि श्रुति, प्रत्यक्ष अंतरज्ञान एवं आध्यात्म द्वारा प्रकाशित, एक सतत गतिशील प्रक्रिया है। जो ज्ञान एक ऋषि (ऋषि, साधु या पैग़म्बर) के समक्ष प्रकाशित हुआ है उसका किसी दूसरे ऋषि के समक्ष प्रकाशित हुए ज्ञान से अधिक्रमण हो सकता है। यह अधिक्रमण कुछ काल के पश्चात या फिर समकाल में भी हो सकता है। किसी भी एक ऋषि या एक पैग़म्बर का वचन अंतिम वचन नहीं होगा, ऐसा हिंदू धर्म में स्पष्टता से विदित किया गया है। चेतना एक गतिशील एवं निरंतर विकासशील प्रक्रिया है और ऐसी प्रक्रिया का कोई एकमात्र अंतिम उत्पाद या अंतिम लक्ष्य नहीं हो सकता। किसी भी ऋषि या पैग़म्बर का वचन अंतिम नहीं हो सकता, यद्यपि हिंदू धर्म का प्रत्येक ऋषि एवं पैग़म्बर एक आवश्यक कड़ी हैं और एक उन्नति-सोपान हैं सर्वोच्च सत्य के मार्ग पर। हर ऋषि एवं पैग़म्बर एक मार्ग दर्शक एवं आचार्य है, और प्रत्येक का हिंदू जगत में अपना एक स्थान है। यह सत्य है कि हिंदू धर्म के अपने शास्त्र हैं, पर वह अपने किसी भी शास्त्र से बाधित नहीं है, वह किसी भी शास्त्र को अचूक नहीं मानता है, वह किसी भी आचार्य या ऋषि को अचूक नहीं मानता है। अशुद्धता, वास्तव में, हिंदू धर्म की एक मूल धारणा है। जब तक हम सापेक्ष अज्ञान में रहते हैं, और जब तक हम पूर्णतः सर्वोच्च सत्य चेतना के साथ तादात्म्य एवं एकत्व स्थापित ना कर लें, तब तक हम अशुद्ध या भ्रांत रहेंगे। एकमात्र “अचूक सत्ता” जिसे हिंदू धर्म मान्यता देता है और जिसका वह आदर करता है, वह है अन्तर्वासी दिव्य सत्य, अन्त: आचार्य एवं अन्तर्गुरु, वह अन्तर्वासी दिव्यता या ईश्वर। यह समझना महत्वपूर्ण है : अंतिम आध्यात्मिक स्वामित्व अन्तर्वासी सत्य का है, वेदों में जिसे सत की संज्ञा दी गयी है। यह सत हर उस व्यक्ति को उपलब्ध है जो इस सत की साधना के प्रति अपनी समस्त ऊर्जा, भवदीय रूप से समर्पित करने के लिए तैयार है। सत को इस बात से कोई आपत्ति नहीं है की साधक ऊँची जाति का है या नीची जाति का, नास्तिक है या आस्तिक, हिंदू समाज में जन्मा है या किसी और मत में – सत तो सत ही है, और काल एवं स्थान के परे, सभी मनुष्यों के लिए उसकी उपलब्धि एक समान है।। यदि हिंदू धर्म का यह मूल सिद्धांत है, तो इसका स्पष्ट अर्थ है की धर्म का स्तोत्र जीवंत एवं गतिशील है और उसे एक इतिहास या परम्परा के ढाँचे में अश्मीभूत नहीं किया जा सकता। इस तथ्य के विशाल निहितार्थ हैं। प्रथम, हिंदू धर्म का कोई भी सच्चा साधक वादविवाद, मतभेद और संशोधन को बाधित करने हेतु शास्त्र या आचार्य का उद्धरण नहीं कर सकता; चाहे वह गुरु या आचार्य कितना ही उच्च या अग्रवर्ती क्यों ना हो, अंतिम मध्यस्थ केवल अंतर्तम तत्व ही है। इसी कारण, मद्रास में हो रही एक वेदांत गोष्ठी में, शास्त्र सम्बन्धी किसी एक तथ्य पर हो रहे वादविवाद के मध्य में, जब एक पंडित ने स्वामी विवेकानंद के दृढ़कथन पर यह कह कर आपत्ति जतायी कि वह कथन शास्त्र द्वारा स्वीकृत नहीं था, स्वामी विवेकानंद यह प्रत्युत्तर दे पाए “परंतु मैं, विवेकानंद यह कहता हूँ !” इसी कारण श्री अरविंद, जो की हिंदू धर्म के सबसे अग्रणी प्रतिनिधि एवं आदर्शों में से एक है और जिन्हें हिंदू धर्म में एक महाऋषि के रूप में व्यापक मान्यता प्राप्त है, हिंदू धर्म को ना केवल उसकी शास्त्रीय एवं परंपरागत सीमाओं से आगे ले जाने में समर्थ हुए अपितु उसके विस्तार को, अविवादस्पद विश्व का सर्वोच्च श्रद्धेय हिंदू शास्त्र, भागवद गीता में श्री कृष्ण द्वारा सिद्ध एवं घोषित सीमाओं से भी कहीं आगे तक ले गए। अपेक्षाओं के अनुकूल, हिंदू धर्म का परंपरागत एवं रूढ़िवादी रूप में व्याख्या एवं अनुसरण करने वाले लोग श्री अरविंद के निर्भीक नवीनीकरणों को सहन नहीं कर पाए। इन लोगों ने प्रत्यक्ष रूप से श्री अरविंद की आलोचना की, यह दावा करने के लिए कि उनका योग, उस सब से जो आज तक हिंदू धर्म के समस्त पूर्व अवतारों एवं गुरुओं ने सिद्ध किया है, उससे कहीं आगे और परे है। यही नहीं, कई बार श्री अरविंद ने यह भी स्पष्ट किया था, कि हिंदू धर्म की अवतार परम्परा अभी समाप्त नहीं हुई है, हिंदू धर्म में अंतिम अवतार की कोई धारणा ही नहीं है। जब तक अवतारों की विकासमूलक आवश्यकता रहेगी, तब तक पृथ्वी पर अवतार जन्म लेते रहेंगे। अतः हिंदू धर्म में विकास की अनंत संभावनाएँ सम्मिलित है – प्राचीन काल से वर्तमान तक हिंदू धर्म अपने अग्रणी साधकों, योगियों, ऋषिओं, आचार्याओं के पुरुषार्थ की शक्ति से विकसित होता रहा है, और यह विकास प्रक्रिया निरंतर चलती रहेगी। परम्परावादियों की मान्यताएँ चाहे जैसी भी हों, चाहे शास्त्र सम्मत हिंदू (हिंदू धर्म, शास्त्र सम्मत एवं विधर्मी, परम्परावादी एवं आधुनिकतावादी, सबको अनुमति देता है तथा सबको स्वयं में विलीन कर लेता है) उससे सम्मत हो या ना हो, हिंदू धर्म एक गतिशील एवं सृजनशील धर्म-व्यवस्था है, गतिहीन नहीं। यह हिंदू धर्म एवं अधिकांश दूसरे विश्व धर्म-व्यवस्थाओं के बीच का मूल अंतर है। हिंदू धर्म मुख्य रूप से गतिशील एवं सृजनशील है क्योंकि यह मूलतः एक आध्यात्मिक एवं रहस्यपूर्ण धर्म-व्यवस्था है। एक आध्यात्मिक धर्म-व्यवस्था की परिभाषा के अनुसार उसे, आत्मा, जो मनुष्य में जीव है, का अनुसरण करना चाहिए। इसका विपरीत नहीं हो सकता जहाँ आत्मा को धर्म-व्यवस्था का अनुसरण करना पड़े। जो धर्म-व्यवस्था अपने को आत्मा से उच्च मानती है वह आध्यात्मिक नहीं है और वह एक बाह्य व्यवस्था में परिवर्तित हो जाती है। और जो धर्म-व्यवस्था आध्यात्मिक नहीं है वह निश्चित ही एक बाह्य स्वामित्व के अधीन हो जाती है (जैसे शास्त्र, पादरी या पंडित आदि के) और ऐसी व्यवस्था अपने अनुयायियों को स्वतंत्र आध्यात्मिक खोज एवं अभिव्यक्ति की अनुमति नहीं देगी। कोई भी व्यक्ति अगर एक आध्यात्मिक ज्ञान, जो कि इस व्यवस्था की ईश्वर मीमांसा या धर्मस्थान संबंधी सीमा-प्रदेश से बाहर है, उसे विधर्मिक एवं तिरस्कारी माना जाएगा। दूसरी ओर एक धार्मिक या गूढ़ धर्म-व्यवस्था में कोई भी ईश्वर मीमांसा या धर्मस्थान सम्बन्धी सीमाएँ मान्य नहीं हो सकती, वह स्पष्ट रूप से विचारानुचित एवं अंतर्विरोध है। सत्य की खोज में आत्मा निश्चित ही समस्त बाह्य रूपों एवं सूत्रिकरणों के परे और आगे जाएगी, क्योंकि जिस सत्य का अन्वेषण वह कर रही है, वह सत्य बुद्धि एवं मन की विशालतम और ज्ञानपूर्ण कल्पनाओं के अंत से भी परे एवं अनंत आगे है। इसीलिए चेतना के विकास के साथ साथ धर्म-व्यवस्था का भी विकास होना चाहिए। जैसा की वेद एवं वेदांत व्यक्त करते हैं: सत बृहत है, सर्वदेश एवं सर्वकाल उसके अंदर धारित हैं तथा वह स्वयं देशकाल से उत्कृष्ट है, तथापि किसी एक कालावधि में निहित नहीं हो सकता, चाहे वह कालावधि कितनी भी विशाल या ब्रह्मांडीय क्यों ना हो। सत केवल बृहत् नहीं है, वह ब्रह्मांडीय एवं अतिब्रह्मांडीय भी है, सकल ब्रह्माण्ड उसके अंदर धारित है तथा वह स्वयं ब्रह्माण्ड से उत्कृष्ट है, इस लिए वह किसी भी एक मानव संप्रदाय, समाज, राष्ट्र या धर्म-व्यवस्था में निहित नहीं हो सकता। यह दावा करना कि एक विशेष समुदाय, आस्था या राष्ट्र इस सत को पूर्णतः धारण करता है ठीक वैसा ही है, जैसे सागर की एक लहर यह दावा करे की वह सागर को पूर्णतः धारण करती है। हिंदू धर्म एक आध्यात्मिक एवं रहस्यपूर्ण धर्म-व्यवस्था है क्योंकि हिंदू विचार एवं धर्म का स्तोत्र नित्य एवं सदा जीवंत आत्मा का सत है; और वह रहस्यपूर्ण है क्योंकि उसकी सकल ज्ञाननिधि और अभ्यास प्रक्रिया प्रत्यक्ष एवं अंतर्ज्ञात आध्यात्मिक एवं योगिक अनुभव पर आधारित है। इसीलिए, अपने आध्यात्मिक एवं रहस्यपूर्ण मूलतत्व के आधार पर, हिंदू धर्म में भविष्य की मानवता की आवश्यकताओं एवं माँगों से संरेखित धर्म-व्यवस्था में विकसित होने की क्षमता है, और उसे इस कार्य को अवश्य ही सिद्ध करना चाहिए। उसे केवल प्रगतिशील ही नहीं परंतु मानवता की विकास प्रक्रिया को अतिगतिशील करने के लिए उग्र होना चाहिए। यदि ऐसा नहीं हुआ, तो हिंदू धर्म भी, विश्व की शेष धर्म-व्यवस्थाओं के समान शीघ्रता से अप्रचलित एवं अप्रासंगिक हो जाएगा, और कुछ पीढ़ियों के पश्चात मृत हो जाएगा। गतिशील एवं प्रासंगिक बने रहने के लिए हिंदू धर्म को अपने मूलतत्व एवं आत्मा के प्रति निष्ठावान रहना होगा, और परिवर्तन एवं संशोधन के प्रति अनावृत रहना होगा, पूर्वकाल के रूपों और सूत्रिकरणों से आगे विकसित होने के लिए इच्छुक होना होगा, और अपने अनेक पुरातन सिद्धांतों, प्रथाओं एवं मान्यताओं का परित्याग करना होगा। हिंदू धर्म को अपने सनातन मूलतत्व की रक्षा तथा उसे पुनः जीवंत करने की आवश्यकता होगी, उसका गहन एवं बृहत् वेदिक एवं वेदांत ज्ञान; तथा उसे समान रूप से बृहत् विकासमूलक भविष्य तक पहुँचना होगा, जिसके बीजतत्व उसने अपने हृदय में गुप्तरूप से, अपने सर्वोच्च एवं अंतिम रहस्य के रूप में रखे हुए हैं – रहस्यम् उत्तमम्। Read Original Article in English
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मूल भारतीय संस्कृति का पुनरुत्थान

सनातन धर्म पर आधारित, मूल भारतीय संस्कृति के पुनरुत्थान की ओर भारत में राजनीतिक एवं सांस्कृतिक धारणाएँ परिवर्तित हो रही है – जिसके संकेत तथा लक्षण हर ओर हैं। उभरते एवं नूतन भारतवर्ष में एक ओर जहां वामपंथी एवं उदारवादी मानसिकता से जुड़ी कथाएँ एवं धारणाएँ अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए संघर्षरत हैं, वहीं दूसरी ओर पुन: स्थापनशील मूल भारतीय संस्कृति, और अधिक तीव्रता से सशक्त एवं विस्तृत हो रही है। प्रधानमंत्री मोदी का शासनकाल, भारतवर्ष का अपने राष्ट्रीय ताद्रूप्य एवं राष्ट्रीय व्यक्तित्व के लिए संघर्ष के ऐतिहासिक काल के रूप में स्मरणीय होगा [1]। परंतु, संकेत चाहे जितने भी सकारात्मक एवं आश्वस्त करने वाले क्यों ना हों, हमारी यात्रा का दीर्घ भाग अभी शेष है और हमने अभी बस पृष्ठभाग ही खोला है। वर्तमान में, मूल भारतीय संस्कृति पर आधारित, राष्ट्रीय एवं वैश्विक दृष्टिकोण के प्रतिनिधि दलों एवं व्यक्तियों को साथ आ कर, अपनी ऊर्जा, शक्ति और साधनों को एकत्रित करके, उन्हें कार्यान्वित करने की आवश्यकता है। हमें एक केंद्रित कार्ययोजना की‌ तथा उसे शीघ्र एवं प्रभावी ढंग से क्रियान्वित करने की आवश्यकता है। मूलभूत दार्शनिक संरचना कोई भी सामाजिक अथवा राजनीतिक आंदोलन बिना मूलभूत धार्मिक एवं दार्शनिक आधार के सफल नहीं हो सकता। किसी भी सांस्कृतिक अथवा राजनैतिक धारणा का निर्माण एवं स्थायीकरण एक आधारभूत वैश्विक दृष्टिकोण तथा  मान्यताओं एवं सिद्धांतों के अभाव में नहीं हो सकता। अर्थात् एक दर्शन तथा एक धर्म की आवश्यकता सदा रहेगी। प्राचीन काल से भारतवर्ष का दार्शनिक आधार सनातन धर्म था तथा सर्वदा रहेगा। महाऋषि अरविंद के निर्णयात्मक शब्दों में — “ जब यह अभिव्यक्त किया जाता है की भारतवर्ष उदित होगा, तो वह सनातन धर्म ही है जो उदित होगा। जब यह अभिव्यक्त किया जाता है की भारतवर्ष भविष्य में महान होगा, तो वह सनातन धर्म है जो की महान होगा.. भारतवर्ष का अस्तित्व धर्म के लिए और धर्म के द्वारा ही है। मेरा यह कथन है की सनातन धर्म ही हमारे लिए राष्ट्रधर्म है। यह हिंदू राष्ट्र सनातन धर्म के साथ ही उत्पन्न हुआ था, उसके साथ ही यह गतिमान एवं विकासशील है। जब सनातन धर्म क्षीण होता है तब राष्ट्र भी क्षीण होता है, और यदि सनातन धर्म में स्वयं नाश का सामर्थ्य होता, तो उसके नाश के साथ भारत का भी नाश हो जाएगा। वह सनातन धर्म, स्वयं राष्ट्रधर्म है”। भारत का, राष्ट्रीय ताद्रूप्य एवं राष्ट्रीय व्यक्तित्व का संघर्ष, आधारभूत स्तर पर, भारत का हिंदू धर्म के लिए संघर्ष है, जो कि उसके अस्तित्व का प्रमुख सिद्धांत है। भारतवर्ष को अपने हिंदुत्व [2] के मूल स्वभाव एवं स्वरूप को अवश्य ही पुनः धारण करना चाहिए और एक हिंदू राष्ट्र के रूप में विश्व के समस्त राष्ट्रों के मध्य अपनी मूल भूमिका का पालन करने के लिए पूर्ण आत्मविश्वास के साथ खड़ा रहना चाहिए। हिंदुत्व के अभाव में भारत निर्बल एवं भेद्य रहेगा। वर्तमान के राजनीतिक परिवेश में हिंदुत्व एक अत्यंत ही भ्रांति युक्त एवं निन्दित शब्द है। इन भ्रांतियों को सुधारना आवश्यक है। हिंदुत्व हिन्दू होने का मूल तत्व है और इस मूल तत्व का बोध हमें तब तक नहीं हो सकता जब तक हमें सनातन हिंदू धर्म के दार्शनिक आधारों एवं तार्किक आधारों का बोध ना हो। सनातन धर्म पर आधारित हिंदू राष्ट्र का विचार, किसी भी प्रकार से धर्मनिरपेक्षता के विचार का उल्लंघन नहीं करता, जैसा की वामपंथियों-उदारपंथियों का मिथ्या विश्वास है तथा जिसका वह प्रचार भी करते हैं। यह मिथ्या एवं हानिकारक विश्वास केवल इस सरल तथ्य से उत्त्पन्न होता है कि उन्हें सनातन हिंदू धर्म का बोध ना तो है और ना ही वह इस बोध की प्राप्ति की इच्छा रखते हैं। सनातन धर्म, जो की हिंदुत्व का दार्शनिक एवं आध्यात्मिक आधार है, अपने मूल स्वभाव में स्वयं ही धर्मनिरपेक्ष है। समस्त विभिन्न प्रकार की पद्धतियाँ, धर्म, दर्शन शास्त्र एवं विचारधाराएँ सनातन धर्म के सार्वलौकिक विस्तार में सम्मिलित हैं। कोई भी मनुष्यता से जुड़ी धारणा या पद्धति सनातन धर्म के क्षेत्र से बाहर नहीं है। यहाँ तक की सनातन ब्रह्मांडीय परिकल्पना में असुर एवं उसके अमंगलकारी कर्म का भी एक उचित स्थान निर्धारित है। हमारे लिए तात्कालिक प्रश्न यह है कि राजनीतिक शक्तियों के असंतुलन की संरचना किए बिना सनातन धर्म को राष्ट्रीय चेतना के केंद्र में कैसे लाया जाए। अगर हम राजनीति को सारे प्रपंच से बाहर रखें तो सनातन धर्म पर आधारित हिंदू राष्ट्र के मार्ग में कोई चुनौती नहीं होगी। यह राजनीति है जिसने देश को धर्म आधारित, विरोधी समूहों में बाँटा है, संस्कृति या धर्म ने नहीं। और इसी कारण हमें धर्म के अराजनीतिकरण के द्वारा भारतीय समाज के इन धर्म आधारित विभाजनों का अंत करने की आवश्यकता है। धर्म के अराजनीतिकरण का एक निश्चित उपाय धर्म को पुनः सशक्त एवं सबल करना है। धर्म के बलवर्धन के आधार पर ही भारत, एक पूर्णतः धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के रूप में, एक उच्च एवं दृढ़ स्थान ग्रहण कर सकेगा, जहां विभिन्न संस्कृतियों एवं धर्मों को एक ईश्वर के लीलास्वरूप समान मान्यता प्राप्त होगी। धर्म के बलवर्धन के द्वारा ही हम, असहिष्णु दिव्य शक्तियाँ, अभ्रांत शास्त्र, उत्तम पैग़म्बर एवं उत्तम जन आदि, जैसी अपरिपक्व धारणाओं को ध्वस्त कर पाएँगे । असत्यता एवं अर्ध-सत्यों के विभिन्न रूपों का, उनके धार्मिक आवेशों में भी, युद्ध या प्रतिकार से नाश नहीं किया जा सकता, अपितु उनकी पूर्ण अप्रासंगिकता को सिद्ध करने से उनका नाश सहज ही हो जाएगा। यह ही धर्म का मूल स्वभाव है : जैसे जैसे धर्म के बल की वृद्धि होती है, वह असत्यता एवं अर्ध-सत्यों को पूर्णतः अप्रासंगिक बना देता है। हमें एक बच्चे के हाथों से खिलौने को छीनने की आवश्यकता नहीं होती; अगर हम बच्चे का ध्यान खिलौने की तुलना में अधिक वास्तविक एवं अर्थपूर्ण वस्तु की ओर आकर्षित करें तो खिलौना स्वतः ही अप्रासंगिक हो जाता है। इसीलिए धर्म का बलवर्धन करने की आवश्यकता है। और कोई विकल्प नहीं है। धर्म का प्रवचन देते रहने से हम कहीं नहीं पहुँचेंगे। धर्म को जीवन में धारण करना होगा तभी यह एक प्रभावकारी शक्ति बनेगा। धर्म के ज्ञान का जीवन में धारण कर स्वयं धर्म स्वरूप होना होगा तथा धर्म का जीवन में निरंतर पालन करना होगा। धर्म की पूजा या धर्म के अनुसरण का कोई वास्तविक महत्व नहीं, केवल धर्म को जीवन में पूर्ण रूप से धारण करने का ही महत्व है। धर्म आस्था नहीं है – वह जीवन भुक्त ज्ञान है, वह क्रियान्वित सत्य है – जिसे वेदों में ऋतम् कहा गया है। भारत को इस सत्य के प्रति जागृत होना होगा। केवल उसके उपरांत ही भारत धर्म की महान शिला पर दृढ़ता से स्थिर राष्ट्र होने की अभीप्सा के सुयोग्य होगा। सनातन धर्म को देश की चेतना के केंद्र में लाने के लिए, उसे भारतवर्ष का अग्रणी एवं उच्चतम आदर्श बनाने के लिए, कौन से कार्यों को तत्काल कार्यान्वित करना होगा?  सर्वप्रथम एवं सर्वाधिक अनिवार्य होगा कि धर्म को हम अपनी बुद्धि, हृदय एवं शरीर में धारण करें। जब तक यह कार्य संपन्न नहीं होगा, कुछ और सम्भव नहीं है। धर्म के महान गुरु इस प्रक्रिया को साधना के नाम से संबोधित करते थे – ज्ञान को जीवन के आधार में परिवर्तित करने की एक सघन व्यक्तिगत अनुशासित प्रक्रिया। एक के बाद एक व्यक्ति को यह साधना करने की आवश्यकता है। जैसे जैसे यह संख्या बढ़ेगी, देश के सूक्ष्म वातावरण में धर्म की वृद्धि होगी; हर विरोधी प्रवृति का नाश करते हुए और समस्त बाधाओं का विघटन करते हुए, धर्म मंदगति एवं निश्चितता पूर्वक एक वृहद प्राकट्य में परिवर्तित हो जाएगा। इस योजना को कार्यान्वित करने हेतु हमें तीन विशाल पद लेने होंगे : प्रथम : पूर्वकाल के धर्म को पुनः प्राप्त करना होगा और उसे वर्तमान में जीवंत करना होगा ताकि वह सक्रिय रूप से भविष्य निर्माण का उत्तरदायित्व धारण करे। द्वितीय : अपने शेष जीवन को पूर्णतः इस धर्म को जीवन में धारण करने के लिए समर्पित करना होगा ताकि हम व्यवस्थित ढंग से इसे पुनः प्राप्त करें और इसे अपने जीवन में शक्ति पूर्वक सक्रिय करें। तृतीय : बाह्य व्यवस्थाओं एवं सहायक प्रणालियों का सृजन करना होगा, धर्म पे आधारित सामूहिक जीवन के निर्माण के द्वारा – जैसे, सामाजिक, सांस्कृतिक, बौधिक एवं आध्यात्म आदि केंद्रित समूहों का निर्माण। धर्म की पुनः प्राप्ति स्वामी विवेकानन्द के शब्दों में: “भारतमाता की संतानों, आज मैं आप से कुछ व्यावहारिक विषयों के संदर्भ में चर्चा करने आया हूँ, और आपको पूर्वकाल के यश का स्मरण करवाने का मेरा औचित्य केवल यह है। कई बार मुझे यह बताया गया है कि भूतकाल के अवलोकन से हम केवल पतित होते हैं तथा इसका कोई लाभ नहीं होता, और हमें केवल भविष्य की ओर देखना चाहिए। यह सत्य है। परंतु भूतकाल से ही भविष्यकाल का निर्माण होता है। इसलिए पीछे मुड़ो और जितनी दूर तक देख सकते हो, देखो, पूर्वकाल के उन सनातन स्रोतों को अपनी गहराई में प्रवेश करने दो, तत्पश्चात् भविष्य की ओर देखो, आगे बढ़ो, और भारतमाता को उज्ज्वल एवं महान बनाओ, पूर्वकाल के उच्च शिखर से कहीं अधिक ऊँचा और कही अधिक महान बनाओ। हमारे पूर्वज महान थे। सर्वप्रथम हमें इसका स्मरण करना चाहिए। हमें अपने व्यक्तित्व के मूलतत्वों का ज्ञान होना चाहिये, वह रक्त जो हमारी धमनियों में चलायमान है; हमें उस रक्त में श्रद्धा होनी चाहिए और उसने पूर्वकाल में क्या सृजित एवं प्राप्त किया था, उस पूर्वकाल के यश की श्रद्धा एवं चेतना से, हमें महान भारत का पुनर्निर्माण करना चाहिए ताकि भारत पूर्वकाल की महानता से भी अधिक महान हो। और इसके सामने हम श्री अरविंद के शब्द रखते हैं : “…क्यों फिर भारतवर्ष विश्व की प्रथम शक्ति नहीं हो सकता? और कौन है जिसके पास समस्त विश्व में आध्यात्मिक प्रभाव को विस्तारित करने का अविवादित अधिकार है? यही था स्वामी विवेकानन्द की योजना का अभियान। भारतवर्ष में पुनः अपनी महानता का बोध जागृत किया जा सकता है अपनी आध्यात्मिकता के महानता के बोध के द्वारा। इसी महानता का बोध सकल राष्ट्रप्रेम का मुख्य पोषक है। केवल यही समस्त स्वावमूल्यन को समाप्त कर सकता है और भारत के खोए हुए स्थान की पुनः प्राप्ति की ज्वलंत इच्छा की उत्पत्ति कर सकता है।” तथा हमारे पास एक सटीक कार्य योजना है, हर उस व्यक्ति के लिए, जिसमें धर्म की पुनः प्राप्ति और स्वयं के अन्तर में उसे जीने की अभीप्सा है – जिन गहनताओं एवं ऊँचाइयों को हम पीढ़ी दर पीढ़ी खो चुके हैं, इनकी पुनः प्राप्ति करें; हमारे पूर्वकाल, धरोहर एवं संस्कृति का अधिक गहनता से आत्मसात् करें, तथा उसे वर्तमान में पुनः जीवंत करें। हमें उसे एक शक्ति का स्वरूप देना है ताकि वह हमारे भविष्य का निर्माण कर सके। यह तब होगा जब हम भारतवासी, हमारे स्वयं की गहनता में ज्ञान और तपस्या की उस शक्ति एवं ज्योति को जागृत करें जो कि हमारे राष्ट्र की आत्मा में नित्य सनातन धर्म के रूप में वास करती है। यह उद्देश्य विलक्षण एवं निरंतर व्यक्तिगत प्रतिबद्धता एवं प्रयास की माँग करेगा। प्रसार इस कार्ययोजना का आगामी पद होगा धर्म का प्रसार। उन सब को, जो कि बुद्धि एवं आत्मा में धर्म के लिए तैयार हैं, सनातन धर्म को सरलता से समझाना एवं उसके सम्बंध में उनसे संवाद करना होगा । सनातन धर्म के बारे में प्रसिद्ध मान्यता है कि वह अत्यधिक गुप्त है, दार्शनिक अथवा रहस्यमयी है। इस कारण से जनसाधारण के लिए उसे समझना या उसका अनुसरण करना कठिन है। यह कदाचित सत्य है, क्योंकि सनातन धर्म निशचित रूप से गूढ़ एवं सूक्ष्म है। और इसके कारण सनातन धर्म पूर्वकाल से सांस्कृतिक एवं बौधिक अभिजात वर्ग तक ही सीमित रहा है, जिसके फलस्वरूप समय के साथ-साथ धर्म पर दुर्भाग्यपूर्णता से ब्राह्मण जाति का प्रभाव अत्यधिक हुआ। और इसी प्रभाव के फलस्वरूप बौद्ध-धर्म की सुधारात्मक प्रतिक्रिया का जन्म हुआ। हमें इस दोष को तत्काल एवं शक्तिपूर्ण रूप से शुद्ध करना है। सर्वप्रथम हमें एक प्रबुद्ध मंडल की रचना करनी होगी। धर्म को जीने वाले उच्चतम क्षमताधारी बुद्धिजीवीयों एवं साधकों के एक केंद्रीय मंडल की रचना करनी होगी, ऐसे व्यक्ति जो स्वयं साक्षात धर्म का आचरण स्वरूप हों और जो आचार्य की भूमिका निभाने के योग्य हों। इनका चुनाव परिश्रमपूर्वक तथा राजनैतिक एवं सांस्कृतिक प्रभाव से अप्रभावित रह कर करना होगा। निर्विवाद निर्णय एवं विवेक शक्ति और निर्विवाद आचरण करने वाले कुछ व्यक्तियों को साथ लाना होगा। इसे कार्यान्वित करने का कोई सरल मार्ग संभव नहीं होगा। पर कार्य चाहे जितना भी चुनौतीपूर्ण हो, किसी भी प्रकार का समझौता या मध्यमार्ग स्वीकृत नहीं होगा। सर्वोच्च मापदंडों एवं सत्यनिष्ठा का पालन करना होगा। इस प्रबुद्ध मंडल या केंद्रीय मंडल को सनातन धर्म के प्रसार एवं उसकी व्याख्या का कार्यभार सम्भालना होगा, उसके मूलतत्व को मंद या विकृत किए बिना। इस मंडल को ना केवल धर्म के दर्शन का सम्पूर्ण ज्ञान होना चाहिये बल्कि उसके साथ-साथ धर्म के क्रियान्वयन के व्यावहारिक मनोविज्ञान का बोध भी होना चाहिये, लोक लुभावनवाद एवं उत्कृष्ट वर्गवाद को पूर्णतः अस्वीकृत करना होगा। धर्म को एक व्यापक व्यावहारिक एवं उपयोगी जीवन मार्ग के रूप में देखना अति महत्वपूर्ण होना चाहिए। प्रसार के साधन प्रथम : सनातन धर्म की मूल अवधारणाओं को लोकप्रिय बनाने के लिए विभिन्न प्रारूपों में साहित्य का प्रकाशन। द्वितीय : युवाओं के लिए सनातन विषयों एवं विचारों पर आधारित कार्यशालाएँ, उच्च पाठशाला से लेकर विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों के लिए, युवा वृत्तिक एवं व्यवसायियों एवं अध्यापकों के लिए अध्ययन गोष्ठी एवं कार्यशालाओं का आयोजन। अध्यापकों के लिए विशेष कार्यशालाएँ –  विभिन्न संदर्भों में विद्यार्थियों को सनातन धर्म का बोध कैसे कराया जाए, अध्यापक इस कार्य के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होंगे। जो अध्यापक इस कार्य का उत्तरदायित्व लेने हेतु तैयार हों, उनके लिए एक प्रखर पाठ्यक्रम सरलता से तैयार किया का सकता है। तृतीय : बहुमाध्यमिक प्रारूप – चलचित्र (cinema), ऑनलाइन (online), यूट्यूब (YouTube) आदि माध्यमों का धर्म के प्रसार एवं संचार के लिए व्यापक प्रयोग करना होगा। अनेक, अत्यधिक सृजनात्मक व्यक्ति वर्तमान में इस कार्य को कर रहे हैं, उन सब को एक मंच पर एकत्रित करना होगा। चतुर्थ : सोशल मीडिया (social media) का भी व्यापक एवं गहन प्रयोग करना होगा; सोशल मीडिया के द्वारा केंद्रित एवं अनुशासित प्रसार, संप्रेषण के लिए अत्यंत आवश्यक होगा। अगर हमें युवा पीढ़ी को जागृत करना है, तो हमें सोशल मीडिया की भाषा में महारत प्राप्त करनी होगी। तथापि, जो लोग सोशल मीडिया का संचालन करेंगे उनका अवश्य ही तत्परतापूर्वक चयन, प्रशिक्षण एवं सहयोग करना होगा। ऑनलाइन अध्ययन गोष्ठियाँ, संक्षिप्त बातचीत, विषय केंद्रित साक्षात्कार, टेड-एक्स (Ted-X) की तरह विषय केंद्रित व्याख्यान आदि का निरंतर प्रसार देशभर में होना चाहिए। पंचम : इन्फ़ार्मेशन टेक्नॉलजी (information technology) का व्यापक प्रयोग करना होगा, वर्तमान में विश्व इन्फ़ार्मेशन टेक्नॉलजी की ओर अत्यधिक निर्णयात्मक ढंग से अग्रसर हो रहा है। हमें नवीन विचारों और प्रक्रियाओं की रचना करनी होगी, संदेश को समुचित रूप से प्रसारित करने के लिए नये और प्रेरक मार्गों की रचना करनी होगी। अपनी कार्यनीति का निर्माण करते हुए हमें इन अति आवश्यक विषयों का पूर्णतः ध्यान रखना होगा :  प्रथम : युवा हमारे कार्य के लिए अत्यंत आवश्यक हैं। भारत एक युवा देश है, हमारी पचास प्रतिशत जनसंख्या पैंतीस वर्ष की आयु से कम है। युवाओं को मार्गदर्शन एवं निर्देशन की आवश्यकता है। यह विशेष रूप से असुरक्षित एवं प्रभाव्य हैं, किसी भी विश्वसनीय आख्यान से प्रभावित हो सकते हैं। सनातन आख्यान निश्चय ही उन तक प्रभावी रूप से पहुँचना चाहिए। द्वितीय : हमारे पास यह कार्य करने के लिए दीर्घ काल का समय नहीं है। हमें युवाओं तक आवश्यक रूप से पहुँचना है, परंतु हमें इस कार्य को एक निश्चित समय सीमा तक पूर्ण करना है, और इस समय सीमा का कड़ाई से पालन होना चाहिए। तृतीय : युवा पीढ़ी के किए हमें अवश्य ही “सही प्रस्तुतीकरण” करना होगा। सही भाषा का प्रयोग आवश्यक होगा। युवा पीढ़ी “युवा” भाषा को प्रतिक्रिया देती है, युवा दार्शनिक अथवा शैक्षिक भाषा को कोई प्रतिक्रिया नहीं देंगे; ना ही वह किसी उपदेशक अथवा अध्यापक को कोई प्रतिक्रिया देंगे। वह उन प्रखर युवाओं को प्रतिक्रिया देंगे जो कि उनकी भाषा में बात करते हैं तथा उनके मुद्दों को संबोधित करते हैं। क्या हम सनातन धर्म के सत्यों और अवधारणाओं को समकालीन उत्तर आधुनिक भाषा में प्रस्तुत कर सकते हैं जो की गम्भीर विचारधारा ना हो और जो कर्मकाण्ड से पूर्णतः मुक्त हो?  चतुर्थ : संभव है के हमें “सनातन धर्म” के स्थान पर कोई और पारिभाषिक शब्द या शब्दों का प्रयोग करना पड़े, जो की वर्तमानकाल के समकालीन एवं अनुकूल हो। इस कार्य के लिए, आंदोलन को सार्वजनिक क्षेत्र में ले जाने से पूर्व, बहुत सावधानी से विचार करना होगा। “धर्म” शब्द यद्यपि, हमारे लिए चाहे जितना भी प्रभावी हो, युवा पीढ़ी की समझ के अनुसार उसके अंदर पूर्वकाल के रूढ़िवादी सांस्कृतिक एवं धार्मिक अर्थ हैं, हमें इस सत्य को स्वीकृत करने के लिए तैयार रहना होगा। सम्भवतः हमें अनेकों बौधिक एवं सांस्कृतिक प्रतीकों का त्याग करना पड़े। शब्दावली यहाँ महत्वपूर्ण नहीं है, उचित अर्थ का संप्रेषण महत्वपूर्ण है। क्या धर्म की मूल शब्दावली को और भी वैज्ञानिक एवं समकालीन रूप दिया जा सकता है, ताकि युवा पीढ़ी के भीतर एक जीवंत प्रतिक्रिया का संचार किया जा सके? अगर हम विचार करें कि कैसे बौद्ध धर्म पश्चिमी देशों में इतना लोकप्रिय हो गया, और युवा पीढ़ी के मध्य भी – बौद्ध धर्म के कुछ आचार्य अपने धर्म को स्पष्ट तथा सटीक परिभाषित एवं विचारोत्तेजक भाषा में प्रस्तुत करने में सफल हुए। वह भाषा जो कि आधुनिक बुद्धि को भी उतनी ही आकर्षित करती है जितना कि भावनाओं को। हमें उस बुद्धि का आह्वान करना है जो साधारण बुद्धि से उच्च है, और हमें प्राणशक्ति का आह्वान करना है, जिसमें हमारी जीवन शक्ति एवं भावना शक्ति वास करती है। बुद्धि के दिशानिर्देश के बिना प्राणशक्ति सरलता से आक्रामकता एवं लम्पटवाद के मार्ग पर अग्रसर हो सकती है; प्राणशक्ति के अभाव में बुद्धि सरलता से विषयों के केवल बौद्धिकरण एवं अप्रभावी एकांतवाद के मार्ग पर अग्रसर हो सकती है। समकालीन भारत में हमने इन दोनो की चरम सीमाओं का अनुभव किया है और हमें सतर्कता एवं सावधानी से दोनो से बचना होगा। सनातन धर्म विश्वविद्यालय – एक आद्यरूप शिक्षा को, सनातन धर्म के अत्यधिक प्रभावी सशक्तिकरण एवं विस्तार के लिए, सबसे महत्वपूर्ण साधन के रूप में उपयोग करना होगा। सनातन धर्म एवं मानव चेतना के क्षेत्र में प्रगतिशील अनुसंधान एवं अध्ययन, विचार एवं ज्ञान का सतत विकास करना होगा। प्रसार की प्रक्रिया के आरम्भ होने के उपरांत विश्वविद्यालय की स्थापना हमारा प्रथम महत्वपूर्ण कार्य होना चाहिए। यह विश्वविद्यालय, धार्मिक शिक्षा प्रणाली का एक प्रारूप होगा, उपनिषदिक गुरुकुल का आधुनिक रूप, और अवश्य ही विश्व स्तर का होना चाहिए।अध्यापकों, विद्यार्थिओं और विषयों में विश्व में सबसे अग्रणी होना चाहिए। ईंट व पत्थर से निर्मित सम्पूर्ण विश्वविद्यालय की स्थापना में निश्चय ही अत्यधिक समय की आवश्यकता होगी : परंतु हमें यह समझ कर चलना होगा कि शिक्षा प्रणाली का अत्यधिक तीव्रता से डिजिटलीकरण (digitization) हो रहा है । भविष्य का गुरुकुल-विश्वविद्यालय, अगर एक तय भूमि पर स्थित भी हो, फिर भी उसके अधिकांश पाठ्यक्रम ऑनलाइन माध्यम से ही उपलब्ध होंगे। कोरोना महामारी के उपरांत यह प्रवृति और भी अधिक सक्रिय हो जाएगी। केवल वही गहन पाठ्यक्रम जिनके लिए गुरु या आचार्य की साक्षात उपस्थिति अनिवार्य होगी, उनका आयोजन ही अनिवार्य रूप से गुरुकुल के परिसर में किया जाएगा। महर्षि अरविंद ने भारत की मूल सभ्यता के पुनरुत्थान के लिए जिस कार्य को करना होगा, उसकी व्याख्या करते हुए कहा था : “पूर्वकाल के आध्यात्मिक ज्ञान व अनुभव की पूर्ण भव्यता, गहनता एवं परिपूर्णता की पुनः प्राप्ति, भारत का सर्वप्रथम एवं सर्वाधिक महत्वपूर्ण कार्य है। इस आध्यात्मिक शक्ति का प्रवाह दर्शन, साहित्य, कला, विज्ञान एवं आलोचनात्मक ज्ञानादि के नवीन स्वरूपों में, द्वितीय कार्य है। तथा भारतीय स्वभाव एवं मनोवृत्ति के प्रकाश में, आधुनिक समस्याओं के साथ मूलतः नवीन व्यवहार और आध्यात्मिक समाज के महान समन्वय के निर्माण का प्रयास, तृतीय एवं अधिकतम कठिन कार्य है। इन तीन कार्य क्षेत्रों में सफलता, उसकी मानवता के भविष्य की ओर उन्नति में सहयोग का माप होगी।”     यहाँ महर्षि अरविंद ने तीन भागों पर बल दिया है : – पूर्वकाल के आध्यात्मिक ज्ञान व अनुभव की पूर्ण भव्यता, गहनता एवं परिपूर्णता की पुनः प्राप्ति। – इस आध्यात्मिक शक्ति का प्रवाह – दर्शन, साहित्य, कला, विज्ञान एवं महत्वपूर्ण ज्ञान के नवीन स्वरूपों में।  – भारतीय स्वभाव एवं मनोवृत्ति के प्रकाश में आधुनिक समस्याओं के साथ मूलतः नवीन व्यवहार और आध्यात्मिक समाज के महान समन्वय के निर्माण का प्रयास। यह तीन भाग ही आवश्यक रूप से विश्वविद्यालय के पाठ्यकर्म का मूल ढाँचा एवं आधार होने चाहिए –  भारत के आध्यात्मिक ज्ञान एवं अनुभव की पुनः प्राप्ति एवं नवीन स्वरूपों में उनका प्रवाह, और आधुनिक विश्व में उनका उपयोग। पूरे विश्व में ऐसा कोई भी विश्वविद्यालय नहीं है जो इस आदर्श के कहीं निकट भी आता हो। भविष्यकाल के भारत का निर्माण करने के लिए, यही सर्वश्रेष्ठ मूल ढाँचा एवं आधार है। इस ढाँचे पर आधारित, विश्वविद्यालय की कार्यावली पूर्णतः स्पष्ट होगी : प्रथम : सनातन धर्म, मानव चित्त एवं विकासमूलक अध्यात्म और समकालीन राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय संदर्भों में योगसाधनाओं के क्षेत्र में विश्व स्तर के शोध को प्रोत्साहित करना। द्वितीय : सनातन धर्म के अध्यन एवं प्रसार हेतु सहयोगी वातावरण, माध्यम एवं मंच उपलब्ध कराना। इस में आवश्यक रूप से संचार प्रौद्योगिकी (websites), सोशल मीडिया, बहुमाध्यमिक एवं चलचित्र, ऑनलाइन एवं मुद्रित प्रकाशन सम्मिलित होने चाहिए। तृतीय : सनातन धर्म, विकासमूलक अध्यात्म तथा योग के क्षेत्र में राष्ट्रीय एवं वैश्विक केंद्र बनना। चतुर्थ : ‌योग एवं आयुर्वेद पर आधारित पूर्ण स्वास्थ्य (integral health) के क्षेत्र में शोध एवं अध्ययन के केन्द्र का निर्माण। जहा पर इस प्रकार की स्वास्थ्य व्यवस्था और देखभाल जनसाधारण को भी उपलब्ध होगी। पंचम : धार्मिक एवं चेतना प्रधान विश्वावलोकन पर आधारित – प्रबंधन एवं नेतृत्व, अर्थशास्त्र, विज्ञान, पूर्ण एवं भारतीय मनोविज्ञान, प्राकृतिक वातावरण एवं पर्यावरण, इतिहास एवं राजनीति आदि विविध प्रकार के क्षेत्रों में अध्ययन एवं शोध के लिए विद्या केंद्रों की स्थापना। पाठ्यकर्मों के अलावा, जो अधिकतर ऑनलाइन चलेंगे, उनके साथ-साथ विश्वविद्यालय की मूल कार्यावली को सुदृढ़ करने के लिए सम्बद्ध गतिविधियों का भी प्रावधान करना होगा। प्रथम : सभी विद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों में – जहां भी लोग तैयार और इच्छुक हों, वहां पूर्ण विस्तार पूर्वक, युवाओं के लिए शिविरों, अध्यापन गोष्ठियों एवं कार्यशालाओं का आयोजन। द्वितीय : युवाओं के मध्य प्रत्यक्ष हस्तक्षेप करने हेतु – प्रेरणादायक, चुनौतीपूर्ण एवं सुदृढ़ कार्यक्रम का निर्माण। इस कार्यक्रम का विकास एवं कार्यान्वयन प्रबुद्ध विचारकों एवं प्रभावी संचारकों के द्वारा होना चाहिए। विद्वान, दार्शनिक, सामाजिक एवं धार्मिक विचारक, वैज्ञानिक, व्यवसाय एवं निगमित प्रतिनिधियों को इस प्रयास में सम्मिलित करना चाहिए, ताकि जो कार्यक्रम विकसित हों वह सम्पन्न, विभिन्न, बहु-विषयक और बहुमुखी हों। तृतीय : इस विश्वविद्यालय को विद्यालयों एवं अन्य विश्वविद्यालयों से निकट एवं निरंतर समन्वय बना कर रखना होगा ताकि इस कार्यक्रम के लिए सहमति सुनिश्चित हो सके। ऐसा कार्यक्रम बिलकुल भी प्रतिस्पर्धात्मक नहीं हो सकता, वह आवश्यक रूप से सहयोगपूर्ण ही होना चाहिए।  चतुर्थ : युवाओं के लिए कार्यक्रम के समांतर – वृत्तिकों, वैज्ञानिकों, निगमित कार्यपालकों, व्यावसायिक प्रधानों के मध्य में धर्म के प्रसार के लिए एवं मीडिया के माध्यम से, सारे देश में धर्म के प्रसार के लिए भी एक चुनौतीपूर्ण एवं सुदृढ़ कार्यक्रम अवश्य होना चाहिए। हमारे संदेश के अधिकतम विस्तार के लिए यह आवश्यक रूप से उत्तम कार्यक्रम होना चाहिए जिसके अंदर देशभर के विभिन्न शिक्षक एवं शिक्षार्थी सम्मिलित होंगे। पंचम : विश्वविद्यालय को विभिन्न संभावित हितधारकों से संपर्क बनाने की आवश्यकता होगी – लेखक, दार्शनिक, विचारक एवं सामाज के प्रभावी व्यक्ति, धार्मिक आचार्य एवं गुरुजन, राजनीतिक कार्यकर्ता एवं नेतागण और मीडिया कर्मी, जो कि समाज के विशाल भागों को प्रभावित कर सकते हैं, ऐसे व्यक्तियों की आवश्यकता होगी। हमें एक मंच पर, धार्मिक हित से जुड़े, सभी संभव प्रभावशाली व्यक्तियों एवं समर्थकों को एकत्रित करना होगा। व्यापक जनसंख्या से जुड़ने की प्रक्रिया में, निस्संदेह ही हम अनेक ऐसे व्यक्तियों से मिलेंगे जो पहले से ही अपनी मान्यताओं एवं धारणाओं से दृढ़तापूर्वक जुड़े हुए हैं, बहुधा यह व्यक्ति सनातन विचारधारा के विरोधी या फिर सनातन विचारधारा के प्रति शत्रुता रखने वाले भी हो सकते हैं। हमें कभी भी ऐसे व्यक्तियों से मुख नहीं मोड़ना चाहिए, क्योंकि किसी की भी उपेक्षा करके उसे दूर नहीं किया जा सकता। तर्क-वितर्क एवं संवाद के लिए सदा स्थान होना चाहिए। वास्तविकता में धर्मनिरपेक्ष एवं लोकतांत्रिक समाज को अवश्य ही सर्वदा मतभेद एवं संवाद के प्रति सहनशील होना चाहिए, सभी भिन्न विशावलोकनों, विचारों एवं मान्यताओं के प्रति सम्मानपूर्ण दृष्टि रखनी चाहिए तथा असहमति प्रकट करने की पूर्ण स्वतंत्रता देनी चाहिए। मान्यताओं एवं विचारों की कठोरता, असहिष्णुता एवं प्रभुत्ववादी प्रवृतियों के लिए एक धार्मिक समाज में कोई स्थान या प्रासंगिकता नहीं है। धार्मिक संभाषण एवं आख्यान राजनीतिक एवं सांस्कृतिक पक्षपात से परे होना चाहिए। धर्म राजनीति को प्रेरित कर सकता है, उसे नेतृत्व प्रदान कर सकता है, किन्तु किसी भी परिस्थिति में धर्म, राजनीति या राजनीतिक लक्ष्यों का सेवक नहीं बन सकता। अर्थशक्ति का उत्पादन धर्म एवं अर्थ, सनातन धर्म की मान्यता के अनुसार चार पुरुषार्थों में दो पुरुषार्थ हैं। धर्म को सहायता प्रदान करने के लिए, हमें अर्थ की भी आवश्यकता होती है। हमें सब सम-विचारक एवं सम-आत्मिक व्यक्तियों को एकत्रित करना होगा और धर्म को शक्ति प्रदान करने के लिए अर्थ शक्ति का निर्माण करना होगा। यह कार्य अवश्य ही किया जा सकता है और इसे करना ही होगा। अर्थ शक्ति के साधन धर्मांश अर्थ शक्ति के निर्माण के लिए एक शक्तिशाली साधन हो सकता है। धर्मांश का तात्पर्य है की हर सनातन विचारधारा का व्यक्ति अपनी आय एवं धन का एक तय प्रतिशत नियमित तौर पर धार्मिक कार्य के लिए दान करे। यदि हम सब अपनी आय का एक से पाँच प्रतिशत अंश भी धार्मिक कार्य के लिए दान करते हैं तो हम इस कार्य की प्रगति के लिए पर्याप्त सम्पदा एकत्रित कर लेंगे। ऐसा अंशदान मुस्लिम एवं ईसाई समाज के सदस्यों द्वारा नियमित रूप से किया जाता है। ईसाई समाज में इसे टाइध (tithe) कहते है, अर्थात् अपनी आय के दस प्रतिशत भाग का धार्मिक कार्यों के लिए अंशदान। व्यावसायिक एवं निगमित क्षेत्र के अग्रणी धर्मरत जन, आर्थिक संसाधनों एवं प्रतिभाशाली व्यक्तियों का एक शक्तिशाली संघ बना सकते हैं, और धार्मिक कार्य के निधिकरण के लिए एक निधि का निर्माण कर सकते हैं। वह इस संघ की व्यवस्था के द्वारा व्यवसाय की विभिन्न संभावनाओं का भी निर्माण कर सकते हैं और संघ से जुड़े सभी व्यवसायों के लिए अर्थशक्ति का उत्पादन कर सकते हैं। यह संघ फिर प्रत्यक्ष रूप से धार्मिक कार्य में सहयोग कर सकता है। यह इस्लाम की हलाल अर्थव्यवस्था के समरूप होगा जोकि इस्लाम के लिए अरबों डॉलर का उत्पादन करती है। जन समुदाय से अल्पदान माँगने की प्रक्रिया (crowd sourcing) भी धनशक्ति के उत्पादन का एक और साधन हो सकती है। धार्मिक आंदोलन में सहयोग करने के इच्छुक कई व्यक्ति एवं समूह निश्चित रूप से मिलेंगे। एक स्पष्ट दिशा एवं एक पारदर्शी कार्ययोजना इस कार्य के लिए पर्याप्त होगी। जन समुदाय की दृढ़ शक्ति असाधारण सिद्ध हो सकती है। हमें केवल विस्तारपूर्वक संपर्क स्थापित करना है और अपनी बात को व्यक्त करना है। मुख्य विचारों की पुनरावृत्ति सनातन धर्म का संदेश युवाओं तक अवश्य पहुँचना चाहिए अगर हम सभ्यताओं के इस युद्ध में विजय प्राप्ति की कामना करते हैं। परंतु हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि हमारा कार्यक्रम आक्रामक व न्यूनकारी “प्रचारकों” के हाथों में ना चला जाए, जो कि सनातन धर्म और हिंदू धर्म को धार्मिक संस्कारों एवं नियमों में बांधने में ही प्रसन्न रहते हैं।सनातन धर्म अत्यधिक एकीकृत एवं पूर्णता से जीवन जीने के मार्ग का प्रतिनिधित्व करता है जो कि एक ही समय पर सूक्ष्म भी है और जटिल भी है। इसे सरल प्रकार के नियमों और अनुष्ठान में परिवर्तित कर एक और रूढ़िवादी धर्म बनाने की अनुमति नहीं दी जा सकती। जिस क्षण सनातन धर्म को रूढ़िवादी प्रथाओं और अनुष्ठानों में परिवर्तित कर दिया जाएगा, उसी क्षण वह विश्व के अन्य धर्मों के स्थान पर आ जाएगा। यह किसी भी परिस्थिति में नहीं होने देना चाहिए। सनातन धर्म स्वयं जीवन है, वह पूर्ण एवं विकासशील है, और इसे इसी रूप में जानना एवं देखना चाहिए।सनातन धर्म तथा हिंदू धर्म में गहन प्रतिकात्मकताएं समायोजित हैं। हम में इस प्रतीकात्मकता को बिना अधिक सरल बनाए या बिना उसकी गूढ़ता कम किए समझाने की क्षमता होनी चाहिए। इस कार्य के लिए बहुत सचेत बौधिक पथ प्रदर्शित करने की क्षमता की आवश्यकता होगी। बौधिक अभिजात वर्ग के लोग जिस एक महत्वपूर्ण कारण से हिंदू सनातन धर्म से सावधान एवं दूर रहते हैं, वह कारण इसके जटिल एवं गहन प्रतीकवाद को जनसाधारण को समझाने में आने वाली निरी कठिनाई है। सरलीकरण का तात्पर्य वास्तविक अर्थ को कम करना नहीं होना चाहिए। सनातन धर्म का यह कार्य विशाल एवं गहन है, यह किसी एक व्यक्ति या समूह के द्वारा नहीं किया जा सकता, सभी को इस विशाल यज्ञ के लिए एकत्रित होना चाहिए; धर्म के लिए यह त्याग आवश्यक है। हर एक व्यक्ति आवश्यक है, और सब को अपना उच्चतम एवं श्रेष्ठतम योगदान देना होगा। यह कार्य सर्वसहयोगी एवं एकीकरण वाला होना चाहिए – यहाँ दाँव बहुत उच्च है और समय तीव्रता से निकल रहा है। सनातन धर्म क्या नहीं है  प्रथम : सनातन धर्म एक सीमित एवं स्थापित प्रणाली पर आधारित धर्म नहीं है; सनातन धर्म का कोई सर्वोच्च पुरोहितवर्ग या गुरुवर्ग नहीं है, कोई केंद्रित प्राधिकरण नहीं है, धर्म की व्याख्या या धर्मसंगत जीवन क्या है, यह निर्धारित करने के लिए कोई अंतिम मध्यस्थ नहीं है, कोई एक सबसे महान शास्त्र नहीं है, कोई धर्मशास्र नहीं है। द्वितीय : धर्म का अर्थ आंग्ल भाषा के शब्द रेलिजन (religion) से भिन्न है; यह शब्द संस्कृत में ‘धृ’ धातु से उत्पत्त किया गया है; ‘धृ’ का अर्थ है धारण करना या बांधना (स्थिर करना या शक्ति देना) [3]. इसलिए धर्म वह सब है जो धारण करता है या एक साथ बांधता है, स्थिरता लाता है या शक्ति देता है; धर्म को व्यापक रूप से सामंजस्य के आधार के समान माना जाता है, जिसके अभाव में एक वस्तु या व्यक्ति का अव्यवस्था में पतन हो जाता है। इसी कारण यह सूक्ष्म है और रिलिजस मानस (religious mind) की पकड़ से बहुत दूर है। तृतीय : सनातन धर्म का संस्कारों और अनुष्ठानों से कोई सम्बंध नहीं है। सनातन धर्म की दिनचर्या में जिन भी अनुष्ठानों का प्रावधान है वह सब अत्यधिक प्रतीकात्मक हैं। उदाहरणार्थ, यज्ञ – यज्ञ प्रक्रिया प्रतीकात्मक एवं लाक्षणिक है, अग्नि भी प्रतीकात्मक है, और आहुति एवं यज्ञसामग्री भी और पुरोहित स्वयं प्रतीकात्मक है। चतुर्थ : वह नैतिक एवं धार्मिक व्यवहार के लिए अनिवार्य या विहित नियमों का संग्रह नहीं है। धर्म के अनुसार कुछ भी पूर्णतः उचित या पूर्णतः अनुचित नहीं है, सब कुछ सापेक्ष एवं प्रासंगिक है। उचित और अनुचित की यह समझ हमारे अंतरतम अस्तित्व (आत्मा) से या फिर हमारी बुद्धि से आनी चाहिए। इसीलिए सनातन परंपरा में सबसे महत्वपूर्ण साधना अपनी आत्मा एवं बुद्धि, जो की अनिवार्य रूप से विवेकयुक्त है, को विकसित करना है। पंचम : सनातन धर्म हमें यह नहीं बताता कि – हमें क्या खाना है और क्या नहीं, कौन से वस्त्र धारण करने हैं कौन से नहीं, कैसे अपना जीवन जीना है और कैसे व्यवहार करना है। सनातन धर्म के लिए, आध्यात्मिक, सामाजिक एवं नैतिक रूप से हमारी चेतना का विकास ही एकमात्र महत्वपूर्ण विषय है। नैतिक एवं सामाजिक नियमों एवं विधियों के एक संग्रह की तुलना में चेतना की ऊँचाई एवं गहराई अतुलनीय रूप से अत्यधिक महत्वपूर्ण है। षष्ठ : सनातन धर्म वेद, भागवत गीता या उपनिषद नहीं है, ना ही वह महाभारत या रामायण है, ना वह पुराण ही है – यह शास्त्र या ग्रंथ, धर्म को परिभाषित या सीमित नहीं करते हैं। तथापि यह शास्त्र बुद्धि को धर्म के साथ संरेखित करते है, धर्म को मानवता के मानसिक एवं प्राणमय व्यवहार के लिए अधिक उपलब्ध कराते है। उदाहरण स्वरूप, जो व्यक्ति धर्मयुक्त जीवन जीने का अभिलाषी है, उसके लिए – वेदों, गीता और उपनिषदों का गहन ज्ञान, अत्यधिक महत्वपूर्ण हो सकता है, परंतु यह शास्त्र धर्म के एकमात्र श्रोत या मार्गदर्शक नहीं हैं। धर्म का परम स्रोत और उसका एकमात्र अचूक मार्गदर्शक, हमारी आत्मा के अंत: में स्थापित नित्य एवं अनंत ज्ञान ही है और प्रत्येक चेतनव्यक्ति के अंतर् में विराजमान – वह गुप्त वेद है [4]। यह ही सनातन धर्म का एकमात्र भव्य शास्त्र एवं मंदिर है। इसीलिए आत्मा काअनुसंधान सनातन धर्म की एकमात्र परम आवश्यक साधना है – और सब माध्यमिक या परिधीय रुचि के विषय हैं। Read Original Article in English 1प्रधानमंत्री मोदी का शासनकाल(2014 से अभी तक) केवल एक राजनीतिक परिवर्तन की कालावधि नहीं है। वास्तविकता में यह एक सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिवर्तन की कालावधि है। मिथ्या प्रकार की धर्मनिरपेक्षता एवं उदारतावाद से दक्षिणापथ समर्थक राष्ट्रीयता की ओर भारत के राजनीतिक एवं सामाजिक दिशा परिवर्तन का श्रेय प्रधानमंत्री मोदी के निजी उपक्रम को दिया जाएगा, जिसके द्वारा उन्होंने भारतीय जनता दल की कार्यसूची को तीव्रता से एवं निर्णायक रूप से उसके निष्कर्ष तक पहुँचा दिया है। और यह प्रक्रिया, जब मैं यह लेख लिख रहा हूं, तब भी सक्रिय है। 2एक हिन्दू होने का मूलतत्व। 3धारण, धरति, धैर्य – यह सभी शब्द ‘‘धृ’ धातु से ही उत्पन्न हुए हैं 4श्री अरविंद : “जिस प्रकार से इस पूर्ण योग का सर्वोच्च शास्त्र हर मानव के हृदय अन्तर गुप्त रूप से विराजमान सनातन वेद है, उसी प्रकार इस का सर्वोच्च गुरु एवं आचार्य वह अन्तर गुरु है, यह जगत गुरु, जो हमारे अंदर गुप्त रूप से विराजमान है.” (योग समन्वय, The Synthesis of Yoga) लेखक के मतानुसार श्री अरविंद का पूर्ण योग सनातन धर्म का अवश्य ही सर्वाधिक स्पष्ट एवं व्यवस्थित रूप है, जो कि मानवता को ज्ञात है।
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विचारशृंखला : सनातन हिंदू धर्म (भाग 6)
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सनातन हिंदू धर्म (भाग 6)

महादेव शिव नित्यता के श्वेत शिखर पर विराजमानविवृत अनन्ताओं की अद्वितीय आत्मा, सदासतर्क शांतिरूपी अग्नि-आवरण धारीनग्न परमानंद की शिव की गुह्य एकांत (शिव, महाऋषि अरविंद की आंग्लभाषा में रचित कविता) शिव, सनातन हिंदू परम्परा के, आध्यात्मिक तथा यौगिक प्रतीक चिन्हों में परमचैतन्य के सम्भवतः सर्वोच्च उदबोधक प्रतीक हैं। वास्तव में शिव स्वयं परमचैतन्य हैं, वह नित्य अस्तित्व हैं, शिव ही सत्‌ हैं। शिव अनंत चैतन्य हैं, वह चित्त हैं जिसके गर्भ से सम्पूर्ण सृष्टि की उत्पत्ति होती है और जिसके गर्भ में सृष्टि अंततः विलीन हो जाती है। योगियों के मतानुसार शिव वह परम शून्य हैं जिससे समस्त सृष्टि जन्म लेती है। शून्यस्वरूपी शिव वह अतिब्रह्मांडीय गर्भाशय हैं जिसमें से सभी प्राणियों की उत्पत्ति हुई है। समस्त ब्रह्मांडों के आदि बीज भी शिव हैं। शिव के अंतर में ही शक्ति, प्रकृति की अनंत संभावनाओं के रूप में, विश्रामरत हैं। शिव तब तक अव्यक्त हैं, जब तक शक्ति; प्रकृति को अभिव्यक्त करते हुए, जागृत और गतिशील नहीं होती। प्रकृति में वह सब अंतरभूत है जो भी ब्रह्मांड स्वरूप में प्रकट होता है, जगत और जीव, जिसको हम व्यावहारिक भाषा में सृष्टि की संज्ञा देते हैं। शिव ही वह दिव्य अन्धकार हैं जहां से प्रकाश, प्रकृति का जनक, स्वयं जन्म लेता है। शिव के इस दैवीय अंधकार में समग्र प्रकाश समाविष्ट है, और फलतः, संभावना रूप में सम्पूर्ण सृष्टि विद्यमान है। शिव एक कृष्ण-विवर (black hole) के समान हैं, असीमित सघन। शिव शक्ति एवं भौतिक पदार्थों से परिपूर्ण हैं पर स्वयं अदृश्य हैं। प्रकाश की एक भी किरण, कृष्ण-विवर के अनन्त गुरुत्वाकर्षण के परिणामस्वरूप, कृष्ण-विवर से बाहर नहीं निकल सकती। बाह्य दृष्टि से, अगर शिव से बाहर कुछ होने की कोई सम्भावना हो और हम अगर बाहर से देख पाए, तो शिव शून्य या रिक्त प्रतीत होंगे। परंतु अन्तर में, स्वयं की परम गहनता में, शिव सर्वभूत एवं सर्वव्यापी हैं। अस्तित्व की समस्त संभावनाएँ शिव के गर्भ में धारित हैं। सर्वदेश एवं सर्वकाल शिव के अंदर एक तात्त्विक सर्प के समान अजागृत अवस्था में कुंडलित पड़े रहते हैं। शिव अपनी पूर्ण स्थिरता में ब्रह्मांडों के अनंत विस्तार को धारण करते है; ब्रह्मगति की तरंगो का अनंत अनुक्रम धारण करते हैं। शिव का यह अंधतत्व, प्रकाश की अनुपस्थिति नहीं बल्कि प्रकाश की शुद्ध चैतन्य में अनंत एकाग्रता है जो कि अव्यक्त अवस्था में स्वयं शिव की भी स्थिति है। शिव का दैवीय तम रूप में बोध करना, सामान्य प्रकाश और द्वेतभाव से बने जगत का अतिक्रमण करने के समान है। शिव का दैवीय तम निराकार अद्वितीयता है जिसका बोध केवल तब होता है जब भौतिक चक्षु निर्विकल्प समाधि में आवृत हो जाते हैं, योगी की स्थिति अचल एवं अपरिवर्तनीय हो जाती है तथा तीसरा, अप्रत्यक्ष नेत्र, अवलोकन आरम्भ करता है, वह आत्म-प्रकाशित नेत्र, जिसे किसी बाह्य प्रकाश स्रोत की आवश्यकता नहीं है। यह शिव का वह नेत्र है जिसमें दृष्टा और दृश्य, करता और क़र्म, एक हैं। शिव वह निरायाम चैतन्य हैं जो अपने अंदर जीवन और अस्तित्व के अनंत आयामों को धारण करते हैं। शिव की इस कालातीत और अथाह समाधि में; व्यक्त होने की प्रक्रिया का प्रथम दिव्य स्फुलिंग प्रकाशित होता है। वह प्रथम दिव्य इच्छा; एक से अनेक होने की प्रकट होती है, इस इच्छा के परिणामस्वरूप शक्ति, शिव की सृजनशील चित्तशक्ति जो शिव के एकत्व को ईश्वर और इश्वरी के दो प्राचीन द्वैत रूपों में चीर देती है, की उत्पत्ति होती है। इस प्रकार से शिव के चैतन्य गर्भ से, सर्व अस्तित्व की अनंत आधात्री, सभी प्राणियों का स्रोत और व्यक्त होने की प्रकिया का स्रोत, दिव्य जगतजननी की उत्तपत्ति होती है। परंतु इस सम्पूर्ण पृथकीकरण एवं विघटन के मध्य में शिव और शक्ति सदा अद्वैत रहते हैं, एक के अंदर दूसरा, एक दिव्य उत्तमोत्तम रहस्य की भाँति। जब शिव अपने नेत्र खोल कर बाह्य अवलोकन अवस्था धारण करते हैं, तब शक्ति शिव का व्यक्त रूप है। जब शिव अपने नेत्र मूँद लेते हैं और अपने अन्तर का अवलोकन करते हैं, तब शिव वह शक्ति रूप हैं जो बीज में धारित है। जो योगी सत्यदृष्टि का धारण करते हैं उन्हें शक्ति, गतिशील शिव के रूप में दृष्ट होती हैं और शिव निष्क्रिय कुंडलित शक्ति के रूप में। शक्ति जो नित्य स्त्रीरूप और दिव्य जगजननी हैं, उस शक्ति के रूप में शिव स्वयं ब्रह्मांड में परिवर्तित हो जाते हैं। वह अपनी सृजनशक्ति से केवल ब्रह्मांड की प्रकल्पना नहीं करते, बल्कि स्वयं साक्षात ब्रह्मांड का रूप ले लेते हैं। इस प्रकार योगी को इस सत्य का बोध है की वह सब जो प्रत्यक्ष है, जो अस्तित्व में है, जो दृष्टिगोचर है, जिसका बोध किया जा सकता है, आभास किया जा सकता है एवं छुआ जा सकता है, वह स्वयं शिव ही हैं, अपनी शक्ति के रूप में। और वह आत्मा जो योगी के अन्तर में अपने अस्तित्व के प्रति चैतन्य है, वह जो उसकी तत्वता का परम सत्य है, वह शिव ही हैं। इसलिए “शिवोहम” को योग के प्रथम एवं सर्वप्रधान मंत्र की मान्यता प्राप्त है : मैं स्वयं शिव हूँ।और जैसे जैसे यह मंत्र योगी के चित्त का भेद कर उसमें प्रवेश करता है और उसे अपने स्पंदन से परिपूर्ण कर देता है, वैसे वैसे समस्त भेद एवं द्वंद्व सहज ही नष्ट हो जाते हैं, केवल और स्वयं शिव – आत्मा, जगत एवं ब्रह्मांड रूप में प्रकाशमान होते हैं। यद्यपि शिव समस्त सृष्टि में व्याप्त हैं, फिर भी कोई भी शिव का पूर्ण ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकता, क्योंकि शिव स्वयं ही सकल सृष्टि के ज्ञाता एवं दृष्टा हैं, सर्व अस्तित्व के महासाक्षी वह स्वयं हैं। महाशिव के साथ एकत्व का बोध योगी की परमोपरम उपलब्धी है। शिव साक्षात एवं पूर्ण अद्वितीयता हैं, फलतः शिव में समस्त द्वंद्व, ज्ञाता एवं ज्ञात की समस्त श्रेणियाँ एवं विभाजन विलीन हो जाते हैं। शिव का ज्ञान होना असंभव है क्योंकि शिव के बाहर किसी ज्ञाता अथवा ज्ञान का अस्तित्व ही नहीं है। इसी कारण, शिव का बोध शून्यबोध के समान होता है, इसलिए नहीं क्योंकि यथार्थ में वह रिक्त एवं शून्य हैं परंतु इसलिए क्योंकि शिव द्वंदपूर्ण मानव चेतना और मनुष्य की सब ज्ञान इन्द्रीओं से परे हैं। कृष्ण-विवर (blackhole) के समान, शिव भी अदृश्य और अगम्य हैं, फलतः मानव चेतना के लिए शिव शून्यस्वरूपी हैं। यथार्थ मे शिव का यही शून्य स्वरूप समस्त व्यक्त सृष्टि की पृष्ठभूमि एवं मूलभूत आधार है, क्योंकि जब ब्रह्मांड के कालातीत कुंडलित चक्रों में समस्त सृष्टि का पूर्ण विलय हो जाता है तत्पश्चात भी यह शून्य शेष रहता है, अपरिवर्त्य एवं अगाध। जब समस्त प्रकाश जिससे सृष्टि की अभिव्यक्ति होती है, उस प्रकाश का प्रत्याहरण एवं निर्वापण होता है; उसके पश्चात जो शेष रह जाता है वह शिव का दिव्य तम है। शिव के दिव्य तम में प्रवेश करना एक सर्वोच्च रहस्य की हृदय गुहा में प्रवेश करने के समान है, क्योंकि वास्तव में इसी दिव्य गहन तम में स्वयं को स्वयं के गूढ़ अस्तित्व का ज्ञान होता है, शुद्ध एवं एकल अद्वितीय‌ आत्मा की प्रतक्ष्यता होती है, शंकराचार्य का शिवोहम शिवोहम चरितार्थ होता है। गहन हृदय की अन्तरम गुहा के अंदर साधक आत्मिक समाधि के सर्वोच्च आनंद में शिव स्वरूप का धारण करता है। जब शक्ति, प्रकृति स्वरूप में, जो की नित्य स्त्री स्वरूप हैं, सर्वोत्तम पुरुष, शिव के पास लौट जाती हैं, और स्वयं को शिव में विलीन कर लेती हैं। यह कोई अत्यंत दूरस्थ, केवल एकबार होने वाली अतिब्रह्माण्डिय घटना नहीं है पर एक आत्मीय यौगिक अनुभव है जो की निरन्तर पुनर्घटित होता रहता है, समस्त मानवता के माध्यम से। जहाँ भी और जब भी एक जीवात्मा शिव के साथ अपने एकत्व का साक्षात्कार कर लेती है और शिव के अगाध विस्तार में विलीन हो जाती है, तब यह मंगलकारी अतिब्रह्माण्डिय घटना उस जीवात्मा के साथ हो रही होती है। इस प्रकार की शिव में विलीनता ही सर्वोच्च निर्वाणस्थिति है एवं पूर्ण मोक्ष है। अधिकतर हिंदू शिव को विनाश के ईश्वर की मान्यता देते हैं एवं प्रलयकारी महादेव जैसे शब्दों से अलंकृत करते हैं। परंतु शिव विनाश नहीं करते, ईश्वर की इस व्यवस्था में विनाश अनावश्यक है – जब ब्रह्माण्डिय विकासशीलता की दिव्यानुभूति क्षीण हो जाती है तो शिव स्वयं की बनाई सृष्टि को पुनः स्वयं में विलीन कर लेते हैं, वैसे ही जैसे एक मकड़ी अपने जाल को स्वयं में पुनः ग्रहण करती है। अनेक नामरूप, एकत्व में विलीन हो जाते हैं, अनेकता अद्वितीयता में लुप्त हो जाती है। यह सृष्टि को स्वयं में प्रत्याहरित करने की शिव की प्रक्रिया है जिसमें शिव उसका विनाश नहीं बल्कि उसका रूपांतरण करते हैं। प्रलय के बारे में लोकप्रिय धारणाएँ ज्ञानोचित नहीं हैं। प्रलय ब्रह्मांड के पूर्णतम विनाश की प्रक्रिया नहीं है, यह असत्यवादी ब्रह्मांड और असत् अहम की शिव के सत्य में विलीनता मात्र है। इसीलिए योगीजन शिव को रूपांतरण के ईशवर के रूप में जानते हैं विनाश के ईशवर के रूप में नहीं। शिव की शुभ समक्षता में स्वयं मृत्यु का अस्तित्व व्यक्तिगत प्रलय के रूप में समाप्त हो जाता है, ज्ञानयुक्त योगी के लिए वह आत्मिक कायाकल्प में परिवर्तित हो जाती है। शिव की यह लीला – सृष्टि की अभिव्यक्ति एवं प्रत्याहरण, एकत्व और अनेकत्व, प्रक्षेपण एवं विक्षेपण, केवल युग-युगान्तर की अतिदीर्घ अवधि में ही होने वाला घटनाक्रम नहीं है बल्कि मानव चेतना के माध्यम से मानव जीवन की अवधि में होने वाला घटनाक्रम भी है। चेतना का सकारात्मक परिवर्तन ही समस्त योगसाधनाओं का स्वाभाविक परिणाम है। और शिव स्वयं, आदियोगी की भाँति, युगों की कालावधि में एवं मनुष्य की जीवन अवधि में, मानव चैतन्य की विकास प्रक्रिया का मार्गदर्शन करते हैं। इसीलिए शिव को हम योगेश्वर की संज्ञा भी देते हैं। पुरातन ऋषि जिन्होंने शिव का आत्मबोध किया था, उनके कथनानुसार, जो भी व्यक्ति निष्कपटभाव से स्वयं को शिव के चरणों में पूर्णतः समर्पित कर देता है, आदियोगी शिव, स्वयं उसका मार्गदर्शन करते हैं, और मात्र एक जीवन की अवधि में ही आत्मसाक्षात्कार की सर्वोच्च पराकाष्ठा तक ले जाते है। जो भी शिव का आह्वान निष्कपटता एवं निरंतरता से करता है, उसके प्रति शिव की करुणा एवं उदारता अतिप्रसिद्ध है। योगिजन शिव को स्वयंभू के नाम से भी जानते हैं, वह जो स्वयं प्रकट हुआ है। शिव स्वयं के गर्भ से समस्त सृष्टि की अभिव्यक्ति करते हैं पर स्वयमेव शिव का कोई स्रोत या मूल बीज नहीं है। यह एक गहन रहस्य है। यदि सृष्टि की उत्तपति शिव के गर्भ से होती है, तो स्वयं शिव सृष्टि से अतिरिक्त हैं, और जो सृष्टि से अतिरिक्त है वह कभी अस्तित्व में नहीं आ सकता। यह शिव तत्व जो की अस्तित्व से परे है, और ऋषियों के कथनानुसार मूल अस्तित्व है, वही सत् है। सत्, मूल अस्तित्व के रूप में स्रोत एवं वास्तविकता है, सकल सृष्टि का मूल तत्व; जिसमें से समस्त सृष्टि की उत्पत्ति, एवं प्रवाह होता है। इसीलिए शुद्ध अस्तित्व स्वयंभू है; स्वयं ही, स्वयं के गर्भ से उत्पन्न होता हुआ, अकारण एवं अकाल, एक ऐसा गूढ़ रहस्य जो कि अस्तित्व और चैतन्य के समस्त आयामों से परे है। जैसे कि शून्य से उत्तपत्त होता शून्य, क्योंकि जिसका कारणत्व में वास नहीं है वह भौतिकत्व से भी परे है, वह अत्यधिक अबोध्य निराकारता है, इसी फलस्वरूप वह शून्य के समान प्रतीत होती है। योगी अपनी साधना के द्वारा इस श्रेणी के अतिगूढ़ रहस्यों के साथ सहज हो जाता है, वह इन रहस्यों का अर्थ ढूंढने का कोई प्रयास नहीं करता। शिव के गूढ़तम रहस्यों का मार्ग उदासीनता एवं समर्पण के अगाध अनुभव से उत्कृष्ट होता है, जहाँ बुद्धि एवं हृदय प्रगाढ़ शांति में अवरोहित हो जाते हैं और दृष्टि अंतरात्मा की ओर केंद्रित हो जाती है, क्योंकि शिव इस अंतरात्मा के गर्भ में निवास करते हैं। शिव के स्वयंभू रूप पर इस प्रकार ध्यान लगाना, चैतन्य के द्वंद्वों के पार जाने एवं आत्मिक शांति में प्रवेश करने के लिये, सर्वाधिक शक्तिपूर्ण साधना है। अर्धनारीश्वर के रूप में, शिव गहन सत्तामूलक अद्वैत के प्रतीक हैं। पुरुष के रूप में – ईश्वर की सृजन शक्ति के सम्पूर्ण मिश्रण एवं संतुलकर्ता, और नारी के रूप में – इश्वरी की निर्वहन एवं पोषण करने की शक्ति। अद्वैत दिव्य चैतन्य-शक्ति स्वरूप शिव, अर्धनारीश्वर रूप में, पुरुषतत्व एवं नारीतत्व की अभेद्यता का प्रतीक हैं [1]। पुरुष एवं नारी तत्व का द्वंद्व, मानव ब्रह्मांड का मूल द्वंद्व है। शिव के अर्धनारीश्वर पर ध्यान करना, ब्रह्मांड के इस मूल द्वंद्व पर विजय प्राप्त करने की शक्तिपूर्ण साधना है। यह, ध्यान एवं कर्म, अव्यवस्था एवं व्यवस्था, विकास-प्रक्रिया एवं आत्मसात्-प्रक्रिया, बाह्य केंद्रित शक्ति एवं आंतरिक गुरुत्वाकर्षण के मूल गतिशील संतुलन को पुनः स्थापित करने का मार्ग है। जो भी इन मूल द्वंद्वों का अतिक्रमण करता है वह शिव के शांतस्वरूपी सम्पूर्ण तादात्म्य, एवं शिव के निराकार रूप के समीप आ जाता है। सनातन परंपरा में, शिव की आराधना को केवल सम्पूर्ण चैतन्यस्थिति में किया जाता है, यह एक आंतरिक दीक्षण की क्रिया है एवं शरीर, बुद्धि व हृदय का अर्पण है। यह आराधना, बाह्य प्रतीकों एवं मंत्रों की एक विस्तृत व्यवस्था के द्वारा, शिव के यौगिक एवं आत्मिक स्वरूप का निरंतर आह्वान करने की विधि है। यदि किसी को शिव के गूढ़तम एवं परम सुरक्षित रहस्य का ज्ञान हो तो शिव को संतुष्ट करना अत्यंत सरल है, क्योंकि शिव अंतर्वासी हैं, जो स्वयं ही आत्मा की गुहा में आसीन हैं। जो शिव का नाम रूप के ब्रह्मांड में अन्वेषण करता है वह सर्वथा ही विस्मित होता है, पर वह साधक जो नाम रूप का त्याग कर शिव के आंतरिक रूप का आह्वान करने में समर्थ है, उस विरले साधक को शिव के परमचैतन्य का वरदान प्राप्त होगा। इसीलिए अनेक साधक अपने शरीर पर भस्म का का लेप करते हैं, रूपकालंकार की भाँति में या वास्तविकता में, गृहस्ती का त्याग करते हैं, भिक्षु एवं सन्यासी बन जाते हैं, कठिन तप करते हैं, पर शिव के अन्तरम रहस्यों का अल्पाभास भी उन्हें नहीं हो पाता, किंचित दूरस्थ क्षितिज के समान शिव उनके लिए दुर्लभ ही रहते हैं। परन्तु जिनको यह बोध है की शिव हमारे व्यक्तित्व के अंतःस्वभाव ही हैं, केवल वही स्वयं के हृदय व जीवात्मा के गर्भ में शिव के रहस्यों का भेद करते है। यही वे साधक हैं जिन्हें यह स्पष्ट बोध होता है की शिव का वैराग्य भौतिक व बाह्य नहीं परंतु आंतरिक है; शिव की तपस्या सत्य और शुद्धता की तपस्या है। शिव भक्त को आवश्यक रूप से हृदय की अंधगुहाओं में उतरना होगा और वहाँ स्थापित शाश्वत ज्योति के प्रकाश का साक्षात्कार करना होगा। शिव को साधारणतः एक सन्यासी के रूप में दर्शाया जाता है जिसका शरीर शवों की भस्म से लिप्त होता है। यह शिव का एक नितांत प्रतीक है, आदियोगी – तपस्वीस्वरूप धारण किए हुए। तपस्या का तप वह अग्नि है जो भ्रम एवं अज्ञान को भस्म कर देती है। तपस्वी का बाह्यरूप उसके आंतरिक वैराग्य का प्रतीक है, वह इस नश्वर जगत में वास करता है, उसके समस्त आकर्षणों व विकर्षणों के बीच, परंतु उसे निरंतर उसकी नश्वर्ता का बोध रहता है। शवों की भस्म – नश्वर्ता, मृत्यु एवं विलीनता का प्रतीक है – भस्म नश्वर शरीर का अंतिम अवशेष है। इसलिए, भस्म से लिप्त तपस्वी को सदा अपनी बुद्धि एवं हृदय के भीतर निरंतर आंतरिक स्मरण में रखे हुए, योगिनी तीव्रता से अपने शरीर एवं भौतिक जगत के साथ अपनी समरूपता का अतिक्रमण कर सकती है, और शिव के वैराग्य एवं मोक्ष की अपने स्वयं चैतन्य में, प्राप्ति कर सकती हैं। आद्यप्रारूपीय योगी एवं तपस्वी, आदियोगी शिव, महादेव भी हैं जो नीलकंठ के रूप मे प्रसिद्ध हैं, उनके कंठ का यह नीला रंग उस विष का परिणाम है जो शिव ने सर्वोच्च करुणाभाव में, ब्रह्मांड की अमंगल से रक्षा करने हेतु, ग्रहण किया था। यह एक आदिकालीन प्रतीक है। जब देवासुर महासंग्राम के रूप में, अस्तित्व के महासागर का मंथन हो रहा था, महामंथन के फलस्वरूप – विध्वंशकारी, विषयुक्त पदार्थ पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करते है जिनसे समस्त जीवन नष्ट हो सकता था। शिव, जो करूणानिधि हैं, सृष्टि के रक्षा हेतु, इस समस्त विष को ग्रहण करते हैं, परंतु शिव के अन्तर में शाश्वत निवासीनी दिव्य शक्ति ने विष को शिव के शरीर में प्रवेश करने के पूर्व, कंठ में अवरुद्ध कर दिया, फलतः यह विष शिव के कंठ में ही अवशेषित है और उसके प्रभावस्वरूप शिव का कंठ नीलवर्ण है। शिव का यह नीलकंठ रूपी प्रतीक; गहन एवं शक्तिशाली है। मानव जगत के अनन्त विकास-प्रक्रिया-चक्र को मंथन की संज्ञा दी गयी है, जिसके द्वारा शुभ और अशुभ शक्तियों का विमोचन होता है: कुछ शक्तियाँ सम्पूर्ण चैतन्य की विकास-प्रक्रिया का बलवर्धन करती हैं और कुछ शक्तियाँ इस प्रक्रिया का विरोध करती हैं। शिव उस विष का पान करते हैं जो अशुभ एवं विकास विरोधी शक्तियों का प्रतीक है और उन्हें अपने कंठ में ही ग्रहण करते हैं। वह ना तो उसका उपभोग करते हैं और ना ही बहिष्कार करते हैं। शिव उसे विराम अवस्था में रखते हैं और उसके प्रभाव को सदाशुभ में परिवर्तित कर देते हैं। शिव के इस स्वरूप का ध्यान करते हुए, उनके नीलकंठ रूप का आह्वान करते हुए, योगी, देवों एवं असुरों के शुभ एवं अशुभ के द्वंद्व का अतिक्रमण कर सकता है; और इस कालातीत महायुद्ध में, जो कि अशुभ एवं विनाश की समस्त शक्तियों को सृष्टि में जीवन के सर्वोच्च शुभ की ओर परिवर्तित करने का युद्ध है, सहयोग दे सकता है। यथार्थ में यही महादेव शिव का सर्वोच्च उद्देश्य है – समस्त सृष्टि का परिवर्तन, ब्रह्मांड के सकल रूपों एवं शक्तियों का परिवर्तन, परम शुभ में। शिव का स्मरण जटाधारी रूप में भी किया जाता है, उनके कुंडलित केश जटाओं में बद्ध हैं तथा अर्धचंद्र से सुशोभित हैं। यह छवि शिव के जुड़े विविध चिन्हों का पुनः विस्तार करती है। पुराणों के अनुसार, शिव ने गंगा के स्वर्गलोक से तीव्र आगमन पर उसे अपनी जटाओं में अवशोषित कर गंगा के वेग को अवरोधित किया और उसके भीषण प्रवाह को अल्पधारा में परिवर्तित कर दिया। इस कथा में स्पष्ट एवं गहन यौगिक अर्थ है: गंगा एक नदी नहीं बल्कि एक प्रतीक है, दुर्बल पृथ्वी लोक की ओर अवरोहित उच्च चैतन्यशक्ति के भीषण वेग का, जिसके कारण स्वरूप सकल पृथ्वी पर बाढ़ आ जाती। शिव की जटाएँ सहस्रार चक्र का प्रतीक हैं, केवल शिव के सहस्रार चक्र में ही गंगा के वेग को बिना किसी कठिनाई से धारण करने की क्षमता थी। गंगा के प्रवाह को अल्पधारा के रूप में मुक्त करना, एक गहन प्रक्रिया का प्रतीक है, जिसके द्वारा योगी, प्रकृति पर सम्पूर्ण नियंत्रण रखते हुए, एक के बाद एक सूक्ष्म चक्र द्वारा, उच्च चेतना की शक्ति को मुक्त करता है, बुद्धि, हृदय तथा शरीर में। शिव के जटाधारी रूप पर ध्यान लगाकर, शिव भक्त स्वयं की बुद्धि, हृदय एवं शरीर को उच्च चेतना के शक्ति के अवरोहण के प्रति अनावृत कर सकता है। शिव को त्रियम्बकम् के नाम से भी सम्बोधित किया जाता है। त्रियम्बकम् अर्थात त्रीनेत्र धारी ईश्वर। शिव के दो नेत्र साधारण द्वैतवादी अवबोधन का प्रतिनिधित्व करते हैं, दाँया नेत्र सूर्यतत्व के प्रभाव का प्रतिनिधित्व करता है, बायाँ नेत्र चंद्रतत्व के प्रभाव का प्रतिनिधित्व करता है। तीसरा नेत्र: जो दूसरे नेत्रो के आवृत होने के पश्चात खुलता है, अग्नितत्व का प्रतिनिधित्व करता है। यह यौगिक दृष्टि तथा सत् का साक्षात बोध है जो समस्त द्वंद्वों को भस्म कर देता है। यह तीसरा नेत्र, जब सक्रिय होता है, तो बुद्धि के द्वंदवाद के साथ शक्तिशाली तादात्म्य का विनाश कर साक्षात बोध की उत्पत्ति करता है। इसी कारण ऐसा माना जाता है कि जब यह तीसरा नेत्र बाह्य संसार पर केंद्रित होता है तो उसका विनाश करने में सर्वथा सक्षम है। यह द्वंद्व के भ्रम का विनाश करता है। शिव के इस स्वरूप पर ध्यान लगा कर शिव भक्त, शिव के अद्वितीय बोध तक अरोहित हो सकता है। अर्धचंद्र जिसे शिव अपने शीर्ष पर धारण करते हैं, वह समय और समय के माप का प्रतीक है। वेदान्त की दृष्टि से, समय का माप अथवा कोई भी माप, माया का‌ ही गुणधर्म है। अर्धचंद्र को शीर्ष पर धारण करने के कारण शिव समय एवं समय की माया के सम्पूर्ण नियंत्रण के द्योतक हैं। शिव शाश्वत हैं, कालातीत हैं, तभी वह अर्धचंद्र को समय के प्रतीक के रूप में, एक आभूषण की भाँति धारण करते हैं, जो कभी भी स्वेच्छा से उतारा जा सकता है। शिव के कंठ का सर्प, जिसे पौराणिक कथाओं में वासुकि नाम से जाना जाता है, वह अहंकार की प्राणशक्ति एवं मृत्यु के भय का प्रतीक है। अहंकार एवं मृत्युभय में गहन सम्बंध है, यह आपस में गुँथे हुए हैं। शिव के कंठ का सर्प, अहंकार एवं मृत्यु भय, दोनों पर पूर्ण विजय का प्रतीक है। शिव इस सर्प को आभूषण की भाँति पहनते हैं जो स्वत: ही अहम एवं मृत्यु पर आधिपत्य का प्रतीक है। कुछ भक्त सर्प को काल के शाश्वत चक्र की मान्यता देते हैं। सर्प को अपने कंठ में तीन बार लपेट कर पहनने से, शिव काल पर सम्पूर्ण नियंत्रण का प्रतीक भी स्थापित करते हैं। काल नश्वरता का प्रतीक है इसलिए काल पर नियंत्रण, नश्वरता पर नियंत्रण के समान है। गहन अर्थों में, अहंकार, काल एवं नश्वरता, तथा मृत्यु भय, सब आपस में गुँथे हुए हैं। शिव के इस स्वरूप पर ध्यानस्त हो, योगिनी अहंकार का अतिक्रमण कर सकती है एवं मृत्यु तथा नश्वरता के भय पर सम्पूर्ण विजय कर सकती है। इस सत्य का स्मरण रहे कि मृत्यु एवं नश्वरता की शक्तियों पर विजय प्राप्त करने का मार्ग, महामृतुंजय मंत्र, बीज मंत्र के रूप में शिव द्वारा ही दिया गया था। त्रिशूल जिसे शिव शस्त्ररूप में धारण करते हैं, वह शिव के त्रीरूपी सत्य का प्रतीक है। शिव जो कि ब्रह्मांड को स्वयं से उत्पन्न करते हैं, अपने पूर्ण चैतन्य में उसे सुरक्षित रखते हैं, और अंततः उसे स्वयं में पुनः विलीन कर लेते हैं। कुछ योगी, त्रिशूल को प्रकृति के त्रीगुणों – सत्व, रजस एवं तमस के सर्वोच्च संतुलन का प्रतीक मानते हैं। सत्व के द्वारा शिव सृष्टि का सृजन करते हैं, रजस के द्वारा वह सृष्टि की सुरक्षा करते हैं तथा तमस् के द्वारा, उसे अपने दिव्य तम में पुनः विलीन कर लेते हैं। कुछ व्यक्ति त्रिशूल को मानव चेतना की तीन शक्तियों के रूप में देखते हैं : इच्छा, ज्ञान एवं क्रिया। इन तीन शक्तिओं को प्राप्त करने के उपरांत, जगत में कुछ भी असाध्य नहीं है। शिव के इस त्रिशूल स्वरूप पर ध्यानस्त हो कर, योगिनी स्वयं की प्रकृति के त्रिगुणों पर विजय प्राप्त कर सकती है तथा सर्वोच्च शुभ की सिद्धि के लिए, स्वयं शिव के समान, क्रिया कर सकती है। शिव एक हाथ में, प्रतीकात्मक मुद्रा में, डमरू धारण करते हैं। इस मुद्रा को डमरूहस्त मुद्रा कहते हैं। यह एक और गहन रहस्यमयी प्रतीक है। डमरू शब्द- ब्रह्म अथवा आदिध्वनि ॐ का प्रतीक है। जब यह डमरू उचित ध्यान तथा उचित अंत:स्थिति से बजाया जाता है तो यह ॐ ध्वनि उत्पन्न करता है, जो नाद तक अवरोहण करता है जो की अ-ऊ-म का आदिकालीन ब्रह्मांडीय स्पंदन है। जो योगिनी डमरूधारी शिव पर ध्यान स्थापित करती हैं, वह उस सम्पूर्ण चिदाकाश में प्रवेश कर सकती हैं, जहां वह स्वयं को नाद में विलीन कर सकती हैं। उस दिव्य स्पंदन की कुछ तरंगो को स्वयं के चैत्य पुरुष के अन्तर तक ला सकती हैं। शिव से जुड़े सबसे प्रचलित प्रतीकों में से एक है लिंग। लिंग के साथ, भक्त सनातन हिंदू धर्म के समस्त प्रतीकों में से शुद्धतम एवं सर्वाधिक शक्तिशाली प्रतीक के निकट आता है। शिवलिंग अनंत एवं निराकार शिव का प्रतीक है। यह लिंग सर्वाधिक पुरातन चिन्हों में से एक है। यह उस काल का चिन्ह है, जब वर्तमान में स्वीकृत शिव के चित्र एवं मूर्तिरूप का कोई अस्तित्व नहीं था। स्वयं लिंग शब्द का अर्थ प्रतीक या चिन्ह है। स्वामी विवेकानंद के एक बार लिंग को शाश्वत ब्रह्म के प्रतीक के रूप में वर्णित किया था। कुछ पौराणिक कथाओं में, शिव के निवास स्थान कैलाश पर्वत, जो स्वयं सर्वोच्च चेतना का प्रतीक है, उसे लिंग रूप में सृष्टि के केंद्र से समान चिन्हित किया गया है, वह केंद्रीय धुरी जिसके इर्द-गिर्द ब्रह्मांड घूमता है। शिवलिंग केवल पत्थर का एक खंड मात्र नहीं है, बल्कि यह महान अव्यक्त ब्रह्म का चिन्ह है, और साथ ही, वह व्यक्त ब्रह्म का भी गहन प्रतीक चिन्ह है। यह पुरुषतत्व एवं नारीतत्व के पूर्ण संतुलन का प्रतीक है तथा दृश्य एवं अदृश्य का भी प्रतीक है। लिंग – शांत, असंग तथा पूर्ण रूप में प्रतिष्ठित है, भक्त के अंदर यह जिस शांति का आह्वान एवं स्थापन करता है, उसका विवरण शब्दातीत तथा विचारातीत है। जो भक्त शिवलिंग पर ध्यान लगाता है, उसके गहन यौगिक महत्व को समझते हुए, वह सृष्टि के सब द्वंद्वों का अतिक्रमण कर सकता है तथा अव्यक्त के विरल आनंद का अनुभव व्यक्त में कर सकता है। इस प्रकार शिवलिंग का ध्यान करने से, भक्त अपनी चेतना को शिव के शुद्धप्रकाश के उस स्तंभ में विलीन कर सकता है, जिसे हम ज्योतिर्लिंग भी कहते हैं। एक कथा के अनुसार, एक बार शिव ब्रह्मा और विष्णु के सामने एक ज्योतिर्मय स्तंभ के रूप में प्रकट हुए और शिव ने उन्हें स्तंभ के चरम तथा अंतिम सीमाओं को ढूँढने के लिए कहा। दोनो में से कोई भी देव उस चरम सीमा को नहीं ढूँढ पाया, और ढूँढते भी कैसे? अनन्तता का कोई माप नहीं होता, कोई अंत नहीं होता। शिवलिंग, ज्ञात में अज्ञात का तथा व्यक्त में अव्यक्त का प्रतीक है। शिवलिंग पर ध्यान स्थित करना शिव के सर्वोच्च रहस्य पर प्रत्यक्ष रूप से ध्यान लगाने के समान है। तथापि, इन सब विवरण और व्याख्यानों के पश्चात भी, हमें पता है के हमने इस अगाध रहस्य को केवल हल्का सा खुरचा भर है। शिव मानव बुद्धि के द्वारा जाने, समझे या समझाए नहीं जा सकते। शिव की व्याख्या करने का हमारा प्रयास किसी बच्चे का गूढ़ अंतरिक्ष की व्याख्या करने के प्रयास के समान है। जितनी अधिक गहराई में हम जाते हैं, उतना ही अधिक हमें शिव के रहस्य की असीम विशालता एवं गहनता का बोध होता है। शिव न तो ईश्वर हैं ना व्यक्ति। शिव का अस्तित्व कभी न था और ना कभी होगा। वह हैं भी और नहीं भी। सभी स्वरूप शिव के हैं पर स्वयं शिव स्वरूपहीन हैं। वह हमारे निकटतम से भी निकट हैं और हमारी श्वास से भी अधिक अंतरंग हैं। शिव सब हैं, सर्वत्र हैं। ऐसे शिव को कहाँ ढूँढें? क्योंकि जो शिव को रूपों एवं प्रतीकों में, बाहर के संसार में ढूँढते हैं, उनके लिए शिव रिक्त हैं, शिव अंधकार हैं। पर वह जो प्रतीकों के प्रतिकात्मवाद, और रूपों की रूपहीनता को भेद सकते हैं, उनके लिए, शिव स्वयं के अंश मात्र का प्रकटन करते हैं, तथा अपनी कुछ झलकें देते हैं, उनकी आत्मा को और आगे एवं और गहनता में ले जाने के लिए। परंतु उन्हें जो स्वयं को आंतरिक रूप से शिव को समर्पित करते हैं, जैसे कीट स्वयं को ज्योति को समर्पित करता है, यह जानते हुए की समस्त ब्रह्मांड में केवल शिव ही हैं, शिव स्वेच्छा से एवं अपार उदारता से स्वयं को उस भक्त को सुलभ कर देते हैं। शिव की कृपा दिव्य शक्ति की कृपा है। शिव का आह्वान करना शक्ति का आह्वान करना है। वह सदा-सर्वदा व्यक्त, अंतर्वासी तथा हमारी चेतना में प्रकाशित, ईश्वर और इश्वरी के रूप में विराजमान रहते हैं। ॐ नमः शिवायप्रकाशमान ईश्वर, शिव को नमन। Read Original Article in English 1संभवतः अर्द्धनारीश्वर का प्रथम वर्णन बृहदारण्यक उपनिषद् में आद्यप्ररूपीय जीव के रूप में हुआ था, इस जीव का परिमाप आलिंगन अवस्था में स्थित स्त्री-पुरुष के युगल के सामान था, यह दो रूप बाद में पृथक हो गए और इन में से पुरुष एवं स्त्री का जन्म हुआ।
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Guru Purnima
Hindi

गुरु पूर्णिमा

गुरु वह है जो स्वयं हमें अज्ञान एवं अवचेतन के अंधकार से सत्य एवं अमरत्व के अंतहीन प्रकाश की ओर ले जाता है। गुरु उसी प्रकार हमारी आत्मा का पोषण करता है जैसे कि हमारी जैविक माता हमारे शरीर का पोषण करती है। गुरु उस पिता के समान है जो हमें अनुशासित करता है, जीवन के गुण-अवगुण की शिक्षा देता है, हमारा दिशा निर्देश करता है; वह मित्र एवं मार्गदर्शक है जो हमारे हर पग के साथ पग मिला कर चलता है, किसी भी पूर्वाग्रह एवं अपेक्षा से रहित। परंतु इस सब से परे, गुरु उस दिव्य ईश्वर का साक्षात स्वरूप एवं जीवंत अवतार है। सनातन हिंदू धर्म का मूल आधार गुरु है; पुजारी, पंडित या उपदेशक नहीं, शास्त्र भी नहीं। गुरु ही सर्वप्रकाशित ज्ञान का स्रोत है, वह अमोघ संबल है जो कठिन अवरोहण में हमें स्थिरता प्रदान करता है। गुरु वह महाशिला है जिस पर हम सकुशल एवं सुरक्षित रूप से प्रतिष्ठित हो सकते है। गुरु को सनातन हिंदू परम्परा में स्वयं ईश्वर के समान माना गया है – “आचार्य देवो भव:”। आचार्य – जो विद्या देता है तथा हमें नवीन आत्मिक स्वरूप देता है। गुरु को ही आचार्य कह कर भी सम्बोधित किया जाता है। गुरु पूर्णिमा का पावन पर्व वार्षिक रूप से उत्तरायण के पश्चात हिंदू पंचांग के प्रथम मास, आषाढ़ की प्रथम पूर्णिमा को मनाया जाता है, यह दिवस आंग्ल तिथि-पत्र के अनुसार प्रायः जून या जुलाई मास में होता है। यह भारत में वर्षा ऋतु के आरंभ का समय होता है। इस अवधि में भारतवर्ष के पारंपरिक परिभ्रामी संन्यासी, निरंतर वर्षा के कारण पूर्णतः विश्राम करते थे तथा अपनी अविरल यात्रा से कुछ समय के लिए विरामित होते थे। इस अवधि में यह संन्यासी प्रायः किसी आश्रम में निवास करते थे और आगामी लगभग तीन मास, आध्यात्मिक विचार-विमर्श, अभ्यास व चिंतन-मनन को समर्पित करते थे। गुरु पूर्णिमा का दिवस एक अतीव शुभ आध्यात्मिक अवधि के आरम्भ का प्रतीकचिन्ह है, यह अवधि गम्भीर स्वाध्याय एवं प्रबल ध्यान साधनों को समर्पित है। गुरु पूर्णिमा का एक प्रतीकात्मक अर्थ भी है: गुरु पूर्णिमा भारतवर्ष में वर्षा ऋतु के आगमन का लक्षण है, जब उष्ण एवं सूखी धरती वर्षाजल में संपूर्णतः भीग जाती है और भारतीय ग्रीष्म ऋतु की दमनकारी उमस के उपरांत समस्त जीवन पुनः जीवित एवं गतिशील हो उठता है। यह दृश्य शिष्यों के अंतर्भाव को पूर्णतः दर्शाता है, दिव्य कृपा एवं ज्ञान की वर्षा के लिए शिष्यों की अनुकम्पा का भी प्रतीक है गुरु पूर्णिमा। जैसे कि शिष्य गुरु से प्राथना करता है:  हे गुरुदेवजिस प्रकार यह निर्जलीकृत धरा वर्षा को ग्रहण कर रही है, मैं भी, ज्ञान की असीम तृष्णा में, इस सूखी धरती के समान, आपकी कृपा की विशाल बाढ़ में जलथल हो जाऊँ। ऐसी मान्यता है की गुरु की कृपा एवं शक्ति का गुरु पूर्णिमा के दिवस सहस्त्र गुना वर्धन होता है। इसका मूल कारण यह है कि युगांतर से अनेक आत्मबुद्ध ऋषियों एवं मनीषियों ने, समस्त मानवता के आध्यात्मिक कल्याण हेतु पृथ्वी के सूक्ष्म वातावरण में असीम उदारता से अपनी शक्ति एवं चैतन्य का प्रवाह किया है। यह सर्वविदित है कि एक आत्मबोधि ऋषि के आशीर्वाद में सम्पूर्ण काल एवं देश में यथार्थी-करण की अमोघ शक्ति है – ऐसी है सत्य की शक्ति। इसी कारण, समस्त सत्यनिष्ठ एवं आत्मनिष्ठ साधक, स्वयं की गुरुआस्था का पुनः नवीनीकरण करने हेतु, पुरुषोत्तम की ओर अवरोहण के संकल्प को पुनर्जीवित करने हेतु, स्वयं को पुनः अर्पित करने हेतु, इस दिवस की प्रतीक्षा करते हैं। एक ऐसा अवरोहण जो की गुरु के सजीव सहयोग के बिना प्राप्त करना प्रायः असम्भव हो जाएगा। गुरु पूर्णिमा का सनातन हिंदू धर्म के सभी आध्यात्मिक साधकों एवं भक्तों के लिए गहन महत्व है। यह आध्यात्मिक ऊर्जा एवं शक्ति से परिपूर्ण दिवस है, तथा आध्यात्मिक ऊर्जा से परिपूर्ण अवधि का प्रारम्भ है। यह एक ऐसी अवधि है जो कि उन सब के लिए, जो उच्च चेतना के प्रति अल्पमात्र भी जागृत हैं, विकास की एवं नवीनीकरण की असीम आध्यात्मिक सम्भावनाओं का प्रकटन करती है। ऐसी मूल्यवान अवधि व्यर्थ नहीं जानी चाहिए। शिष्यों को केवल अपने आत्मिक केंद्र पर ध्यान करना है, अपने भीतर की अंतर्तम अभीप्सा पर चित्त लगाना है तथा शेष कठिन श्रम पूर्ण निश्चिंतता से गुरु को सौंप देना है।  सनातन हिंदू इतिहास के अनुसार, गुरु पूर्णिमा के दिन, महाभारत के रचयिता, कृष्ण द्वापायन व्यास का शुभजन्म हुआ था, वह ऋषि पराशर एवं मतस्यराज दुश्रज की सुपुत्री, देवी सत्यवती की संतान हैं। श्रीमद् भागवत में यह कथित है की “ईश्वरत्व के सत्रहवें अवतार के रूप में, श्री व्यासदेव सत्यवती के गर्भ में ऋषि पराशर के द्वारा प्रकट हुए। उन्होंने पूर्वकाल में सरल प्रसार हेतु अखंडित वेद का अनेक खंडो एवं उपखंडों में विभाजन किया”। इस कारण से यह दिवस व्यास-पूर्णिमा के रूप में भी जाना जाता है। कृष्ण द्वापायन व्यास को सनातन हिंदू परम्परा के आद्यप्रारूपीय या मूलप्रारूपीय गुरु की मान्यता प्राप्त है। एक और प्रसिद्ध दन्तकथा, जो कि सम्भवतः काल के प्रारम्भ में घटित हुई थी, के अनुसार प्रथम गुरु, गुरुओं के महागुरु, स्वयं शिव, जो दक्षिणमूर्ती नाम से भी प्रसिद्ध हैं, वह जिसका मुख दक्षिण दिशा के ओर है, उन्होंने सर्वोच्च आत्मा की प्रथम विद्या मानवता को प्रदान की थी। इसी कारणवश शिव को आदिगुरु एवं आद्यप्ररूपी गुरु की मान्यता प्राप्त है। प्राचीनकाल में सदियों पूर्व इसी दिवस पर आदियोगी शिव ने गुरु का आवरण ग्रहण किया था। फलतः शिव आदिगुरु हैं, और यौगिक परम्परा के प्रथम गुरु हैं।  यह दन्तकथा कुछ इस प्रकार प्रचलित है: प्राचीन काल में, चार प्रबुद्ध पुरुष, अपने अस्तित्व सम्बन्धी प्रश्नों के गूढ़तम उत्तरों की खोज में, एक स्थान से दूसरे स्थान भ्रमण करते हुए किसी ऐसे व्यक्ति को खोज रहे थे जो उन्हें ज्ञान का मार्ग दिखा सके। इन मे से प्रथम व्यक्ति अक्षय आनंद एवं दुःख से सदा के लिए मुक्ति के गुप्त ज्ञान की प्राप्ति का इच्छुक था। दूसरा समृद्धि एवं स्वास्थ्य के ज्ञान तथा अभाव एवं असुरक्षा से पूर्ण मुक्ति के गुप्त ज्ञान की प्राप्ति का इच्छुक था। तीसरा बुद्धिमान व्यक्ति जीवन के अर्थ एवं महत्व को जानने का इच्छुक था, क्या मनुष्य जीवन का स्थायी महत्व एवं मूल्य है? चौथा व्यक्ति ज्ञान एवं मनीषा का उपासक था परंतु अपूर्णता का अनुभव करता था क्योंकि उसकी मनीषा में, सर्वोच्च सत्य के भाँति, नवीनीकरण करने का सामर्थ्य नहीं था, जो केवल जीवंत गुरु के माध्यम से ही प्रकट रूप में प्राप्त हो सकता है। उसे इस ज्ञान को प्राप्त करने के मार्ग का बोध नहीं था। अंततः वह चार अन्वेषक एक दूरस्थ गाँव में स्थित एक पुरातन बरगद के वृक्ष तक पहुँचे। उन्हें वहाँ एक युवा पुरुष मिला जो कि शांति एवं स्थिरता में आसीत था, उसके मुखमंडल पर शुभ मंगलकारी मुस्कान थी। उसके मुखमंडल को देखते हुए, उन सभी के मन में एक साथ यह विचार उत्पन्न हुआ कि यह युवा हमें सर्वोच्च ज्ञान के गुप्तमार्ग का रहस्य बताएगा। तत्पश्चात् वह उसके समक्ष शांतिपूर्वक बैठ गए, और उसके नेत्र खुलने की प्रतीक्षा करने लगे। युग के समान प्रतीत होती कालावधि के पश्चात उस रहस्यमयी युवा पुरुष ने अपने चक्षु खोले, और उन चारों का अवलोकन किया। उसकी मुस्कान अत्यंत दीप्तिमान हो गयी, उसके नेत्रों ने इस प्रकार देखा की जैसे उनके हृदयों की अतिगहनता के सहज ही दर्शन कर रहा हो। परंतु वह पूर्णरूप से मौन रहा, उसने केवल एक असामान्य मुद्रा ग्रहण की। और, जैसे की एक गुप्त संचार से, चारों बुद्धिमान व्यक्तियों को ज्ञान की प्राप्ति हुई, उनको समस्त प्रश्नों के उत्तर प्राप्त हो गए एवं प्रबोधन की प्राप्ति हुई। प्रथम व्यक्ति को मनुष्य के दुःख के मूल का ज्ञान हो गया; दूसरे व्यक्ति को भय एवं अभाव के मूल का बोध हो गया, तीसरे को मानव अस्तित्व के वास्तविक मूल्य एवं महत्व का ज्ञान हो गया एवं चौथे को सान्निध्य का बोध हुआ; गुरु के साथ गहन आंतरिक संपर्क का ज्ञान हुआ। यह वास्तव में गुरु से शिष्य को यौगिक ज्ञान का प्रथम संचार था। यह सनातन हिंदू धर्म की गुरु-शिष्य परम्परा का जन्म था। यही परम्परा हमारे सनातन धर्म का मूल आधार है। यह गुरु से शिष्य तक ज्ञान संचार की परम्परा आज तक निरंतर जीवित है। यह संचार कथित या लिखित शब्द के द्वारा, आंतरिक प्रेरणा एवं अंतर्दृष्टि के द्वारा, अथवा मौन के द्वारा प्रवाहित है। यही परम्परा आध्यात्मिक धर्म की रीढ़ है। आदि शंकराचार्य ने, प्रथम गुरु से प्रथम शिष्यों को प्रथम ज्ञान संचार के प्रतीक चिह्न के रूप में एक सुन्दर काव्य की रचना की है जो इस प्रकार है: मौनव्याख्या प्रकटित परब्रह्मतत्त्वं युवानंवर्षिष्ठांते वसद् ऋषिगणैः आवृतं ब्रह्मनिष्ठैः । आचार्येन्द्रं करकलित चिन्मुद्रमानंदमूर्तिं स्वात्मारामं मुदितवदनं दक्षिणामूर्तिमीडे ॥१॥ अनुवादित अर्थ यह है : उस दक्षिणमूर्ती की हम स्तुति एवं अभिवादन करते हैं, जो सर्वोच्च ब्रह्म के सत्यस्वरूप की व्याख्या करते हैं, अपने परम मौन के द्वारा, जो देखने में युवा हैं, शिष्यों से घिरे हुए, शिष्य जो कि स्वयं पुरातन ऋषि हैं, जिनकी बुद्धि ब्रह्मस्थित है, जो की गुरुओं में महागुरु हैं, जो अपने हस्त से चिनमुद्रा दर्शाते हैं, जो आनंद का साक्षातरूप हैं आनंद अंतर्भाव में अभिभूत हैं। गुरु पूर्णिमा का पर्व बौद्ध एवं जैन परम्परा के अनुयायी भी मनाते हैं। बुद्ध धर्म के अनुयायी इस शुभ दिवस को सारनाथ में बुद्ध के प्रथम उपदेश के सम्मान एवं प्रतीक चिन्ह के रूप में मनाते हैं। अपनी निर्वाण प्राप्ति के पाँच सप्ताह के पश्चात बुद्ध बोधगया से सारनाथ अपने पुराने पाँच साथियों- पंचवर्गिकाओं को ढूँढने गए थे। उन्हें यह पूर्वज्ञान हो गया था की यह पुराने साथी उनसे बौद्धधर्म की दीक्षा लेने के लिए परिपक्व एवं इच्छुक हैं। जब बुद्ध को अपने पुरातन साथी मिल गए तो उन्होंने उनको धर्मचक्रप्रवर्तन सूत्र का ज्ञान दिया। इस ज्ञान संचार से उनके साथी प्रबुद्ध हो गए और सम्भवतः बुद्ध धर्म के प्रथम भिक्षु बने। इस संचारस्वरूप ज्ञान से, आषाढ़ मास की पूर्णिमा के दिन बुद्ध के संघ की स्थापना हुई। बुद्ध ने निर्वाण प्राप्ति के पश्चात के प्रथम वर्षा ऋतु के काल का सारनाथ में ही निर्वाह किया। जैन धर्म के अनुयायी गुरुपूर्णिमा का पर्व चौबीसवें तीर्थान्कर महावीर के प्रथम शिष्य, इंद्र्भूति गौतम, को ग्रहण करने के दिवस का पुनः स्मरण करने के लिए मनाते हैं। उस गुरुपूर्णिमा के दिवस के उपरांत महावीर ने गुरु का रूप धारण किया था। गुप्त महत्व फिर शिष्य किस प्रकार इस दिवस की शक्ति एवं शुभत्व का उपयोग करता है? साधारण रूप से लोग गुरुपूजन करते हैं। इसका अपना अलग महत्व है। पर गुरुपूजन केवल प्रथम कार्य है। पूजन का आंतरिक जीवंत सम्पर्क एवं आत्मीयता में परिवर्तित होना अत्यंत आवश्यक है – जिसे एक शब्द में सान्निध्य कहते हैं। गुरु के साथ आध्यात्मिक समीपता में होना, गुरु की जीवंत उपस्थिति में होना, गुरु-शिष्य के सम्बंध का सार है। गुरु से शारीरिक दूरस्थता या निकटता महत्वहीन होती है: गुरु के भौतिक शरीर में होना या ना होना भी महत्वहीन है। सान्निध्य काल एवं देश, जन्म और मृत्यु से अतिक्रमित है; जिस गुरु ने आत्मा का साक्षात्कार कर लिया है वह अनश्वर है, शाश्वत है और उतनी ही सरलता से अतिभौतिक लोक में प्रकट हो सकता है जितनी सरलता से वह भौतिक लोक में प्रकट होता है। परंतु शिष्य को स्वयमेव गुरु के समक्ष आंतरिक एवं पूर्ण रूप से समर्पण करने की प्रक्रिया का बोध होना चाहिए, केवल इसके फलस्वरूप ही गुरु शिष्य की चेतना में व्यक्त हो सकता है। समस्त एवं पूर्ण समर्पण इस गुप्त प्रक्रिया का सर्वोच्च रहस्य है। गुरु का कार्य चित्त का तपस है। गुरु जिस ज्ञान का शब्द या मुद्रा के द्वारा संचार करता है, सान्निध्य की संचार क्षमता का वह अल्पांश मात्र है। गुरु की विद्या का समस्त गांभीर्य, गुरु के मौन के द्वारा प्रवाहित होता है; गुरु के मौन के द्वारा ही सत्य की सर्वशक्ति एवं सर्वशुद्धता का संचार होता है। फलतः शिष्य को अपनी बुद्धि एवं हृदय को गुरु के मौन को ग्रहण करने के लिए तैयार करना चाहिए। और यह तभी श्रेष्ठता पूर्वक कार्यान्वित हो सकता है जब शिष्य स्वयं गहन ग्रहणशीलता एवं शांतभाव में स्थित हो। अतः गुरुपूर्णिमा अंतर्मौन को ग्रहण करने का दिवस है तथा आह्वान, सम्पूर्ण समर्पण एवं ध्यान करने की तिथि है। ध्यान के फलस्वरूप शिष्य के अंदर तपस-तेज उत्पन्न होता है। वह तप शक्ति, जिसके बिना गुरु के प्रकाश अथवा शक्ति के किसी भी अंश को ग्रहण या आत्मसात् नहीं किया जा सकता। हमें स्मरण रखना चाहिए कि वास्तविकता में संचार केवल आध्यात्मिक शक्ति का होता है, मानसिक ज्ञान या समझ का नहीं। मानसिक ज्ञान एवं समझ बोधित कर सकता है परंतु आध्यात्मिक शक्ति पूर्ण नवीनीकरण करती है, पुराने स्वभाव एवं शरीर को दिव्य स्वर्णरूप में परिणत करती है। समर्पण, ध्यान के समान ही महत्वपूर्ण है। समर्पण स्वयं को पूर्णतः गुरु के चरणो में अर्पित करने की क्रिया है, और स्वयं का समर्पण करने के फलस्वरूप, अपने को गुरु की कृपा एवं शक्ति के योग्य बनाने की प्रक्रिया। समर्पण का वास्तविक अर्थ है – पवित्र बनाना, बुद्धि, हृदय एवं शरीर में ईश्वर को ग्रहण करने के लिए स्वयं को तैयार करना। क्योंकि गुरु या ईश्वर केवल तभी प्रकट होंगे जब पात्र शुद्ध एवं पूर्ण होगा। जब समर्पण हो जाता है तथा ध्यान की दृढ़ता से स्थापना हो जाती है, उसके बाद शिष्य आह्वान के लिए तैयार हो जाता है। गुरु की आध्यात्मिक शक्ति का आह्वान एवं उसे अपनी अंतरात्मा में धारण करने के लिए शिष्य परिपक्व हो जाता है। यह आह्वान है गुरु के व्यक्त होने का, पूर्ण नियंत्रण करने का, अंतर्गुरु बनने का, स्वयं के सम्पूर्ण अस्तित्व का ईश्वर बनने का, अंतर् ईश्वरत्व, अन्तर्दिव्यता प्रदान करने का। पांडिचेर्री आश्रम की श्री माँ ने हमें इस प्रकार के आह्वान के लिए अति उत्तम मंत्र दिया है : ॐ नमो भगवते … हे ईश्वर, आओ, स्वयं को प्रकट करो, मुझे दिव्यरूप में परिवर्तित कर दो।स्वयं श्री माँ के शब्दों में: प्रथम शब्द, ॐ, का अर्थ है सर्वोच्च आह्वान, सर्वोच्च का आह्वान। द्वितीय शब्द, नमो, का अर्थ है स्वयं का पूर्ण समर्पण। तृतीय शब्द, भगवते, का अर्थ है अभीप्सा, उस दिव्यतत्व की जिसमें सृष्टि को परिवर्तित होना है। यह आत्मा का परमात्मा के लिए नित्य निरंतर आह्वान है, शिष्य का दिव्य आत्मा के लिए आह्वान है। गुरु, मानव तथा ईश्वर के बीच का माध्यम है, आत्मा और परमात्मा के बीच, नश्वर और शाश्वत के बीच का सेतु है। शिष्य को यह स्मरण होना चाहिए कि गुरु और ईश्वर के बीच कोई अन्तर नहीं है। गुरु मध्यभूमि पर, दृश्य और अदृश्य के बीच खड़ा होता है, अव्यक्त और व्यक्त के बीच रहता है, आत्मबोध के उच्चतम शिखर तथा हमारी मानव अभीप्सा का आधार शिविर, हमारी साधना बीच। गुरु के बिना, हमारा अवरोहण अत्यंत कठिन होगा और कई वर्षों की साधना के पश्चात प्राप्य होगा; परंतु गुरु के साथ हम सीधा उड़ान भर सकते है, और कुछ वर्षों के अंदर सकल जीवनकाल की साधाना को संकुचित कर सकते है। ऐसी होती है गुरु कि शक्ति। गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुर्गुरुर्देवो महेश्वरः । गुरु साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥ गुरु ही ब्रह्मा है – रचयिता है, गुरु ही विष्णु है – पालनहार है, गुरु ही शिव है – विनाशकर्ता है। गुरु स्वयं ही शरीरस्थ सर्वोच्च ब्रह्म है: उस दिव्य गुरु को मेरा नमन। इस वर्ष 2020 में गुरु पूर्णिमा 5 जुलाई को है  पूर्णिमा तिथि का आरम्भ – 4 जुलाई, सुबह 11.33 पूर्वाह्न पूर्णिमा तिथि का अंत – 5 जुलाई, सुबह 10.13 पूर्वाह्न Read original article in English
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अग्नि पुरुष
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अग्नि पुरुष

श्रद्धाशक्ति तथा भविष्य निर्माण कुछ ऐसे व्यक्ति होते हैं जो वर्तमान के अपने अस्तित्व और कर्मों के प्रति सतत असंतुष्टि की अनुभूति करते हैं। ऐसे व्यक्ति अथवा व्यक्तित्व का बोध आप सरलता से कर सकते हैं। उनके स्वभाव में कौतूहल और गाम्भीर्य ध्यानाकर्षक होता है तथा वर्तमान की स्वीकृत मान्यताओं एवं रूढ़ियों के प्रति एक निर्भीक व विनम्र नकारात्मकता उनके व्यक्तित्व में वास करती है। आप ऐसे व्यक्ति को सरलता से किसी परिभाषा या वर्ग में नहीं बांध सकते। इनसे मित्रता रखना भी एक कठिन कार्य है। यह बार बार आपको उकसायेंगे, आपके दौर्बल्य पर प्रहार करेंगे। असीम विनम्रता भी इनका एक गुण है और इनकी विनम्रता ही इनकी मर्मस्थली भी होती है। प्राय: यह असंतुष्टि किसी विफलता या विफलता की आशंका से उतपन्न नहीं होती, बल्कि सफलता के कारणस्वरूप जन्म लेती है। जितनी अधिक कुशलता से वह कार्यों को कर पाते हैं, जितनी उनकी कार्यकुशलता को स्वीकृति मिलती है, उतना ही वह विरक्त होते जाते हैं। और यह विरक्ति, प्रेरणास्वरूप उन्हें उच्चतम उच्चता और गहनतम गहनता कि ओर अग्रसर करती है तथा जब तक वह अपनी क्षमता की चरम सीमा तक नहीं पहुँचते, वह एक क्षण भी विश्राम नहीं करते। आपको ऐसे व्यक्ति हर कार्यक्षेत्र में मिल जाएँगे जैसे : खेल, व्यवसाय, कला, समाचार और मनोरंजन एवं धर्मकार्य आदि क्षेत्रों में। मैं इन्हें “अग्नि पुरुष” के नाम से संबोधित करता हूँ। कई वर्ष पूर्व हिमालय की पर्वत श्रेणियों में मेरी भेंट एक परिपक्व योगी बाबा से हुई थी। उनके कथनानुसार पृथ्वी का अस्तित्व उसके भीतर की आध्यात्मिक ज्योति पर निर्भर है। यह ज्योति जो सूर्य का मूलभूत तत्व है तथा मानव अस्तित्व का भी मूलभूत तत्व है, उन्होंने इस ज्योति को अग्नि के नाम से सम्बोधित किया था। योगी बाबा के अनुसार, इस अग्नि की विहीनता में पृथ्वी एक अतिशीत मृत ग्रह में और सक्रिय जीवन एक शीत रात्रि में परिवर्तित हो जायेगा। समस्त जीवनशक्ति एवं चित्तशक्ति इस ब्रह्मांडीय अग्नि का तेज अंश है, यह अग्नि ही आत्मा के गर्भ में है। उन्होंने अत्यंत गम्भीरता से बताया था कि, “इस सन्तुलन को परिवर्तित करने का समय अब आ गया है। अब या तो तमसपूर्ण अतिशीत मृतरात्रि में पृथ्वी का अंत होगा अथवा पवित्र तेजमय ज्वाला – अग्नि में शाश्वत दिव्य दिवस की उषा फैलेगी।” “बाबा, इस संतुलन के परिवर्तन का उत्तरदायित्व किसका है?” मैंने भययुक्त निष्कपट भाव से प्रश्न किया था। “तुम्हारा”, उन्होंने नि:संकोच पर अर्थपूर्ण उत्तर दिया था और बोले, “तुम्हारा और तुम्हारे जैसे उन सब का, जिनमे सत्य के मार्ग पर चलने का साहस है, सत्य का आह्वान करने का पराक्रम है तथा जीवन से एकमात्र उच्चतम सत्य की अपेक्षा करने का साहस एवं धैर्य है।” “परन्तु हम तो केवल सत्य के साधक हैं बाबा, सत्य के ज्ञानी नहीं। प्राय: हमें तो इसका बोध भी नहीं होता कि हमारे जीवन की अपेक्षा काल्पनिक है या अकल्पित”, मेरे मन के पृष्ठ पटल पर अनायास ही यह प्रश्न उभर आया था। “असत्य”, योगी बाबा ने कहा, “तुम साक्षात अग्निपुरुष हो। तुम्हारे जैसे अग्निपुरुष ही सूर्य को जीवंत रखेंगे। अन्यथा पृथ्वी पर मृत्यु और अंधकार का वास होगा।” यही अग्नि मानव अस्तित्व के केंद्र में वास करती है। वह मूलशक्ति, जो जीवन को गति व ऊर्जा प्रदान करती है, उसे विकास की ओर अग्रसर करती है, चैतन्यशक्ति का एवं जीवनशक्ति का विकास करती है। यह अग्नि ही समस्त जगत की विकास शक्ति है। कई वर्ष और उन वर्षों के कठिन आत्मिक परिश्रम के उपरांत ही मुझे योगीबाबा के शब्दों के अर्थ का बोध होना प्रारम्भ हुआ। पर जिस क्षण यह बोध आरम्भ हुआ, उसी क्षण से मैंने ऐसे अग्निपुरूषों को ढूंढना आरम्भ कर दिया। सर्वप्रथम, मेरे स्वयं के भीतर, और फिर उन सब के भीतर, जिनसे मैं मिलता था। एक तथ्य तत्काल अतिस्पष्ट हो गया कि ऐसे अग्नि पुरुष दुर्लभ हैं। यह मानो एक भिन्न मानव प्रजाति है, जो कि अल्पसंख्या में है और अतिदुर्लभ है। सम्भवतः उन प्रारम्भिक स्तनधारी प्रजातियों की भाँति जिनसे डायनासॉरों का युग आरम्भ हुआ होगा। विश्व पर अग्निविहीन व्यक्तियों का प्रभुत्व है। यह तेजमयी दीप्तिमान अग्निपुरुष, अज्ञातवास में चले जाते हैं या हमारे इस निराशाजनक अंधकारमय जगत से सन्यास ले लेते हैं। और अपनी अनुपस्थिति से वह, इस विश्व को, अग्निविहीन व्यक्तियों को स्वत: ही सौंप देते हैं। तुच्छ तथा मूर्खतापूर्ण कार्यों में ध्यानमग्न कई पीढ़ियां नष्ट हो जाती हैं, तथा उस अवधि में पृथ्वी की आत्मा का निरंतर पतन और क्षय होता रहता है। किसी ना किसी व्यक्ति को तो पृथ्वी के पक्ष में तथा आध्यात्मिक सत्य के पक्ष में विचार प्रकट करने ही होंगे। अभी नहीं या कभी नहीं। क्योंकि यदि हम अब भी जागृत नहीं हुए तो हम अपना भविष्य सदा के लिए ध्यानहीन और धर्मभ्रष्ट लोगों के हाथों गँवा देंगे। यह निर्णायक काल है। यही काल विश्वसंतुलन में परिवर्तन लाएगा। और यह, जैसा कि महाऋषि अरविंद ने लिखा है दिव्यकाल है (The hour of God)। हम मनुष्य – जो कि पृथ्वी की विकासप्रक्रिया के योग्य हैं- हम क्या कर रहे हैं? जो कर्म, परिश्रम और सृजन करने में सक्षम हैं, उन्होंने अपनी आत्माओं को सर्वविदित धन के ईश्वर को भेंट कर दिया है। उनका मूलभूत अस्तित्व ही भौतिक सफलता तथा धन सम्पत्ति की अधिक प्राप्ति पर आधारित है। और वो लोग, जिनमें विचार, अध्ययन, मनन और अध्यापन की योग्यता है, हमारे दार्शनिक तथा बुद्धिजीवी वर्ग, वह आज अपने दर्शन और अध्यापन से हमें प्रेरणा और नेतृत्व देने में असमर्थ हैं। किसी कारणवश, उनके वाक में जागृत करने की शक्ति (अग्नि) नहीं बची है। इसी कारण आज की बाल एवं युवा पीढ़ी स्वयं के और विश्व के भविष्य के प्रति अबोधित रहती है। और जो उनके परिजनों की पीढ़ी है वह या तो अतीत की स्मृति में लुप्त है या अपने निराशावादी दोषदर्षिता के व्यसन में मुग्ध है। जो चिंतक और विचारक है वह केवल संभाषण करते हैं। उन्होंने संभाषण की कला में दक्षता प्राप्त कर ली है – और ईश्वर का धन्यवाद है कि किसी क्षेत्र में तो दक्षता की प्राप्ति हुई। और जो कर्ता वर्ग है और जो प्रबंधक हैं, वह विश्व के रंगमंच पर केवल एक कार्य की सिद्धि से अगली सिद्धि के बीच अंधगति से भागते रहते है। जो घट रहा है तथा वह स्वयं कहाँ जा रहे है, इसका उन्हें कोई बोध नहीं होता। इन कर्ताओं के पास विचारकों के लिए समय या सहनशीलता का अभाव होता है, और वहीं विचारक जिनकी अस्थियों के मज़्ज़े में भी दोषदर्षिता भरी हुई है, अज्ञानी कर्ता के प्रति अविश्वास का भाव रखते हैं। हमारे समाज का विशालकाय विभाजन यहीं पर है। दार्शनिक अपने विशाल आसन पर विराजमान होकर अपनी प्रतीकात्मक धूम्रनलिका से धूम्रपान करता है, किसी दूरस्थ आदर्श समाज के स्वपनदर्शन करता है। वहीं कर्ता कुढ़ता और अकड़ता है, अपने वैश्विक रंगमंच के क्षणों का सर्वनाश करता है, और लुप्त हो जाता है। तो प्रश्न यह है – कौन करेगा मार्गदर्शन? या अगर और सटीकता से पूछें तो, वह कौन सा तत्व है जो मार्गदर्शन करने योग्य है? क्या वह बुद्धि है? पर बुद्धि तो अतिभ्रमित है, उसकी अपनी ही विशिष्ट शब्दावली है और तार्किक आँकड़ों से भरी हुई है। यह बुद्धि या तो अत्यंत निराशावादी दोषदर्षिता में लिप्त है अथवा अपने सर्वभक्षी निजी स्वार्थ से प्रेरित हो कर उदासीन है। क्या वह हृदय तत्व है? पर हृदय तो कातर है, एवं दृढ़ता और प्रभावकारी ढंग से क्रिया करने हेतु अति संकोची है। दूसरे शब्दों में कहें तो बुद्धि और हृदय दोनो ही विचल और प्रभावहीन हो गए हैं। अवश्य ही कोई और महाशक्ति होगी। और वह महाशक्ति क्या है – क्या वह आत्मा है? वह आत्मा जिसे हमारे गुरुओं और ऋषीगणों ने उच्चतम प्राप्ति कहा है? क्या यह आतंरिक बुद्ध, बौद्ध गुरुओं के द्वारा बताई गई अंतर्प्रज्ञा है, जिसे वैदिक ज्ञान की अंतरात्मा भी कहते हैं? आप किस नाम से उसका सम्बोधन करें वह कदाचित महत्वहीन है। महत्वपूर्ण यह है कि आप इस आत्मिक शक्ति में विश्वास करते हैं, आपको यह ज्ञान है कि ऐसी एक शक्ति आपके अंदर भी विद्यमान है‌ चित्तशक्ति की शुद्ध ज्योति के रूप में, एक अपरिवर्तनीय ज्ञानस्रोत के रूप में, और असीम करुणा और प्रेम के रूप में जो सभी परिस्थितियों और संबंधों से पूर्णतः स्वतंत्र है। यह एक अचूक इच्छाशक्ति, धारण सामर्थ्य एवं विवेकशक्ति है जो सहजता से जान लेती है कि क्या उचित है और क्या न्यायशील है। इस शक्ति को प्रतिस्पर्धित या प्रतिरोधी भावनाओं से संघर्षरत होने की आवश्यकता नहीं पड़ती। इस धारणा में विश्वास स्थापित करना हमारा अग्रणी एवं महत्वपूर्ण पद होगा। और यह अग्रणी पद अपने आप में इस निराशावाद के भयावह रोग के निवारण का आरम्भ है जिसने वर्तमान की सभी सभ्यताओं और समाजों के प्रत्येक व्यक्ति को अपनी चपेट में ले लिया है। यह निराशावाद एक शक्तिहीन करने वाली अयोग्यता है, जिसके कारणवश हम किसी भी उचित अथवा श्रेष्ठ वस्तु, विचार या पुरुष पर विश्वास करने में असमर्थ हैं। और यही वह बिंदु है जहाँ आकर सब बिखर जाता है: क्योंकि बिना विश्वासशक्ति के हम कुछ नहीं कर सकते। हम नेतृत्व में प्रेरित और प्रभावित करने में अक्षम हैं। हमारी सामूहिक सामाजिक नपुंसकता का वास्तविक कारण ही यह है – कि हम में विश्वास करने की क्षमता नहीं है। हमारा समाज नास्तिक, निराशावादी और अविश्वासी लोगों का समाज बन गया है। और जीवन के अलङ्घ्य सिद्धांत का अनुसरण करते हुए, हम अंततः अपने निजी और सामूहिक जीवन में वह सब वास्तविकता में ले आते हैं जिसे हमने अपनी अपेक्षाओं में धारण किया था। इसलिए हमें अधम की प्राप्ति होती है क्योंकि हम अधम की निरंतर अपेक्षा करते है। हमें असुर तत्वों की प्राप्ति इसी कारणवश होती है क्योंकि हम, हमारे धार्मिक विचारों के होते हुए भी, ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास नहीं कर पाते। इसलिए एक सार्थक नेतृत्व के निर्माण करने हेतु हमें सर्वप्रथम – अपने अंदर, अपनी सभ्यता एवं संस्कृति में और मानवता के भविष्य में – आस्था का, श्रद्धा का, अभिलाषा का और दृढ़ विश्वास का निर्माण एवं स्थापन करना होगा। पर यह उम्मीद और श्रद्धाभाव केवल आशावादी विचारों और स्वयं सम्मोहन पर क़तई आधारित ना हो इसका भी ध्यान रखना होगा। इस श्रद्धा एवं आस्था; आशा एवं आत्मविश्वास की उत्पत्ति, अनिवार्य रूप से, गहन आंतरिक स्रोत से होना अतिआवश्यक है, हमारे गहन एवं सतस्वरूप चित्त से, हमारे अतिविश्वस्त एवं अतिप्रकाशित अंतर्बोध और ज्ञान आदि से प्रकाशित होना आवश्यक है। दूसरे शब्दों में कहें तो हमें अपने अंदर की आध्यात्मिक श्रद्धा की पुनः प्राप्ति करनी है। और आध्यात्मिक श्रद्धा किसी स्वर्ग में वास करने वाले भगवान के प्रति नहीं, यद्यपि मानवता के गर्भ में वास करने वाली ईश्वरीय शक्ति के प्रति। हमें यह विश्वास जागृत करना है की उच्चता के लिए, सत्यता के लिए और श्रेष्ठता के लिए‌, हम पूरी तरह सक्षम हैं। हमें इस तथ्य पर अवश्य चिन्तन करना चाहिए की स्वर्ग में वास करने वाले भगवान में विश्वास करना सरल है पर हम सबके अंदर, अनेकों संभावनाओं के रूप में, वास करने वाले ईश्वर में श्रद्धा रखना अति कठिन है। स्वर्गप्रवासी भगवान में आस्था, मानवता में आपके अविश्वास के साथ, सुखद रूप से सहमति में रह सकती है पर मानवता की इन संभावनाओं में आस्था, असाधारण प्रयासों की माँग करती है, जैसे – मानव स्वभाव के संपूर्णज्ञान की प्राप्ति का प्रयास, मानव स्वाभाव के भारी दोषों और मूर्खतापूर्ण कृत्यों को स्वीकार करना और फिर भी आस ना छोड़ना, और बुद्धिहीन निराशावाद अथवा ह्रदयहीन दुःख के प्रति समर्पण को नकार देना, आदि अत्यंत ही कठिन पर संभव प्रयास है। इस प्रयास के लिए हमें हमारे भविष्य की एक असीम दूरदर्शी कल्पना करनी होगी। और मानव स्वभाव का सम्पूर्ण ज्ञान प्राप्त करना होगा, और मनुष्य की विकास सम्भावनाओं का एक गहन आभास करना होगा। अंततः निराशावाद का यथार्थ क्या है? क्या इसका सरल अर्थ यह नहीं कि हमने अपने अन्तर की गहराई को ढंग से टटोला नहीं है? कि हमें मनुष्य जीवन के यथार्थ महत्व का बोध नहीं है? कि हम केवल जीवन सतह का ज्ञान ले रहे हैं, और अपने वर्तमान के क्षणिक दृश को सम्पूर्ण सत्य मान रहे हैं? यह तो एक कलाकार की अपूर्ण कलाकृति को देखने के पश्चात उसे कुरूप कह कर अस्वीकृत करने जैसा है। केवल इस कारण से की हमें यह बोध नहीं है कि पूर्ण होने के पश्चात वह कलाकृति कैसी दिखेगी। क्या यह उच्च कोटि की अधीरता, या निम्न कोटि की बाल मूर्खता नहीं है? परंतु इस संघर्षरत भाग में उभरते हुए पूर्ण को ढूंढना, अन्धतम रात्रि में प्रभात की एक झलक देखना अथवा अतक्ष शिला में सिद्ध रूप की झलक देखना, एक संकुचित बीज में पुष्प की कल्पना करना या एक प्रचंड धारा का अनुभव करना अल्पधारा की बूँदभर में, यह विधाएं कल्पनाशक्ति का आह्वान करती हैं तथा श्रद्धा का, अंतर्दृष्टि का, ज्ञान का, धीरता का और नम्रता का आह्वान करती हैं। और अवश्य ही एक नवदृष्टि का, एक नए प्रकार के अवबोधन का आह्वान करती हैं। और यह नवीन प्रकार का अवबोधन कोई अर्थहीन रहस्मयी प्रक्रिया नहीं है। यह अपने आपको पुनः देखने और समझने की सहज और उपयोगी शैली है। अपने इतिहास के, अपनी सम्भावनाओं के, हमारे गतिशीलता से विकसित होते आध्यात्मिक सत्य के बोध की प्रक्रिया है। यह मनुष्य की गाथा का पुनर्मूल्यांकन करने का एक व्यावहारिक मार्ग है। गहन आकारों और सूक्ष्म भेदों के बोध की विद्या है यह। मैं इसे आत्मिक दृष्टि कहता हूँ। आत्मिक वो नहीं जिसकी चर्चा मंदिरों में होती है, पर वो जिसका अनुभव तात्कालिक है, साक्षात है। मूल दृष्टि : वह दृष्टि जो बुद्धि के पूर्वाग्रहों के और भावनात्मक प्रतिबंधों के आवरण से परे है, सामाजिक व सांस्कृतिक पक्षपातों से, व्यक्तिगत या व्यक्तित्व के अंधबिंदुओं से परे है। शुद्ध दृष्टि: अंतरज्ञान की दृष्टि, बौद्धिक अड़चनों से परे सूक्ष्मता का प्रत्यक्ष ज्ञान है ना कि स्थूलता का आभास है। जब आप इस प्रकार से देखना प्रारम्भ करते हैं, तो आपका ध्यान स्वयं उन सूक्ष्म भागों पर जाता है जिन्हें आपने पहले कभी ध्यनापूर्वक देखा ही नहीं था। इस अतिविशाल ब्रह्मांडीय पहेली के सब भाग स्वेच्छा से अपने अपने स्थान को ग्रहण करने लगते हैं। गूढ़तम अर्थ, स्वाभाविक और सहज रूप से स्वयं प्रकाशित हो जाते हैं। ज्ञानप्रज्ञा का स्वतः उदय होता है, एक शांत बोध का प्रकाश आपके दिन और रात्रि के घंटो को प्रबुद्ध कर देता है, आपके प्रतिदिन के जीवन का स्वरूप परिवर्तित हो जाता है, और आप साधारण जीवन में असाधारणता की, सामान्य जीवन में भव्यता की, प्रथम, पर किंचित अनिश्चित झलकियाँ पकड़ना प्रारम्भ कर देते हैं। इस प्रक्रिया के अनुसरण का क्रम अति सरल है। अपने भीतर की उस सम्भावना में, अंतर्बुद्ध में, अंतर्ज्ञान में, श्रद्धा जागृत करें। अपनी उच्चतम सम्भावना के प्रकाश में, उसके प्रति ध्यानवर्धन करें, और वह स्वयं ही आपके अनुभव में अधिकाधिक चैतन्य एवं साकार होता जाएगा। एक बार जब यह प्रकिया आरम्भ हो जाएगी, फिर निरंतर प्रयास से उसे चेतना पूर्वक अपने नित्यजीवन और नित्यकर्म में और अपने विचारों और भावनाओं में अधिकाधिक धारण करें। यह करना कठिन नहीं है। यथार्थ में यह प्रक्रिया, उन सभी धारणाओं की अपेक्षा, अतिसरल है जिनका हम साधारणतः अनुसरण करते हैं, एवं यह अनंताधिक मुक्ति दायक है। Read original article in English
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