Editorial Team

Sanjay Dixit

Sanjay Dixit

About the Author

Sanjay Dixit, Additional Chief Secretary to the Government of Rajasthan, has many feathers in his cap. He graduated as a marine engineer, and sailed the high seas for a few years before changing course to civil services. He is also well-recognised as a cricket administrator who once defeated Lalit Modi in a famous election for the post of the president of the Rajasthan Cricket Association. He considers Rajasthan's first Ranji Trophy title triumph as his crowning achievement. He is also credited with bringing a revolutionary new technology for production of date palms on a large scale in western Rajasthan, transforming livelihoods.

Dixit is a prolific columnist on contemporary topics. He has a deep interest in Indian languages, culture, economics, history, philosophy and spirituality. His six-part series - 'All Religions Are Not the Same' - has won critical acclaim. He also heads The Jaipur Dialogues as its Chairman, creating an India-centric think tank in the process, and hosts the YouTube series 'Weekly Dialogues'.

Francois Gautier

Francois Gautier

About the Author

François Gautier was born in Paris, France. He was South Asia correspondent for Le Figaro, one of France’s leading newspapers. He also wrote columns for Indian newspapers: the ‘Ferengi’s column’ in the Indian Express, then the “French Connection” column in the Pioneer, as well as regular contributions for Rediff., New Indian Express, Times of India blogs, etc.

François has written several books – amongst the latest : A New History of India (Har Anand, 2008), The Art of Healing (Harper Collins, 2011), Quand l’Inde s’éveille, la France est endormie (Editions du Rocher, 2013), « Apprendre à Souffler (Hachette Marabout, 2016) & « Nouvelle Histoire de l’Inde » (Editions de l’Archipel, 2017), « Les Mots du Dernier Dalaï-lama » (Flammarion, 2018), « In Defense of a Billion Hindus » (Har Anand, 2018) & « Hindu Power in the 21st Century » (Har Anand, 2019)

Francois, who is married for 30 years to Namrita, shuttles between Pune and Delhi. He is building a Museum of (real) Indian History in Pune (factmuseum.com).

Makarand Pranjape

Makarand Pranjape

About the Author

Author, poet, and humanities professor. He has been the Director of the Indian Institute of Advanced Study, Shimla since August 2018. Prior to that he was a professor at the Jawaharlal Nehru University in New Delhi, India for 19 years.

Maria Wirth

Maria Wirth

About the Author

Maria Wirth, a German, came to India on a stopover on her way to Australia after finishing her psychology studies at Hamburg University and an internship with Lufthansa. By chance she landed up in spiritual India, realised the great value of Vedic wisdom, and never went to Australia.

She shared her insights with German readers through numerous articles and two books, as she felt this wisdom is lacking in the West. Only some 15 years ago, she became aware that even many Indians don’t know about their amazing heritage and worse, they look down on it and often consider Christianity and Islam as preferable. This shocked her and she started to compare on her blog the three main religions and also wrote her first book in English, titled “Thank you India”. For her it is clear that Hindu Dharma is the best option for humanity and she keeps explaining why.

Dr. Omendra Ratnu

Dr. Omendra Ratnu

About the Author

Dr Omendra Ratnu from Jaipur is an ENT surgeon who runs a hospital.

He runs an NGO, Nimittekam, with the purpose of helping displaced Hindu refugees from Pakistan and integrating Dalit Sahodaras into Hindu mainstream.

Issues of Hindu survival and conflict with violent faiths are his core concerns for which he roams around the world to raise funds and awareness.

He is also a singer, composer, writer, Geeta communicator and a ground activist for Hindu causes.

He has released a bhajan Album and a Ghazal album composed and sung by him.

Guru Purnima
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गुरु पूर्णिमा

सम्पादकीय टीम द्वारा अनुवादित गुरू वह है जो स्वयं हमें अज्ञान एवं अवचेतन के अंधकार से सत्य एवं अमरत्व के अंतहीन प्रकाश की ओर ले जाता है। गुरु उसी प्रकार हमारी आत्मा का पोषण करता है जैसे कि हमारी जैविक माता हमारे शरीर का पोषण करती है। गुरु उस पिता के समान है जो हमें अनुशासित करता है, जीवन के गुण-अवगुण की शिक्षा देता है, हमारा दिशा निर्देश करता है; वह मित्र एवं मार्गदर्शक है जो हमारे हर पद के साथ पद मिला कर चलता है, किसी भी पूर्वाग्रह एवं अपेक्षा से रहित। परंतु इस सब से परे, गुरु, उस दिव्य ईश्वर का साक्षात स्वरूप एवं जीवंत अवतार है। सनातन हिंदू धर्म का मूल आधार गुरु है, पुजारी, पंडित या उपदेशक नहीं, शास्त्र भी नहीं। गुरु ही सर्वप्रकाशित ज्ञान का स्तोत्र है, वह अमोघ संबल जो कठिन अवरोहण में हमें स्थिरता प्रदान करता है। गुरू वह महाशिला है जिस पर हम सकुशल एवं सुरक्षित रूप से प्रतिष्ठित हो सकते है। गुरु को सनातन हिंदू परम्परा में स्वयं ईश्वर के समान माना गया है – “आचार्य देवो भव:”। आचार्य- जो विद्या देता है तथा हमें नवीन आत्मिक स्वरूप देता है। गुरू को ही आचार्य कह कर भी सम्बोधित किया जाता है। गुरुपूर्णिमा का पावन पर्व वार्षिक रूप से उत्तरायण से पश्चात हिंदू पंचांग के प्रथम मास, आषाढ़ की प्रथम पूर्णिमा को मनाया जाता है, यह दिवस आंग्ल तिथि-पत्र के अनुसार प्रायः जून या जुलाई के मास में होता है। यह भारत में वर्षाऋतु के आरंभ का समय होता है। इस अवधि में भारतवर्ष के पारंपरिक परिभ्रामी संन्यासी, निरंतर वर्षा के कारण पूर्णतः विश्राम करते थे तथा अपनी अविरल यात्रा से कुछ समय के लिए विरामित होते थे। इस अवधि में यह संन्यासी प्रायः किसी आश्रम में निवास करते थे और आगामी लगभग तीन मास आध्यात्मिक विचार-विमर्श, अभ्यास व चिंतन-मनन को समर्पित करते थे। गुरूपूर्णिमा का दिवस एक अतीव शुभ आध्यात्मिक अवधि के आरम्भ का प्रतीकचिन्ह है, यह अवधि गम्भीर स्वाध्याय एवं प्रबल ध्यान साधनों को समर्पित है । गुरू पूर्णिमा का एक प्रतीकात्मक अर्थ भी है: गुरु पूर्णिमा भारतवर्ष में वर्षाऋतु के आगमन का लक्षण है, जब उष्ण एवं सूखी धरती वर्षाजल में संपूर्णतः भीग जाती है और भारतीय ग्रीष्मऋतु की दमनकारी उमस के उपरांत समस्त जीवन पुनः जीवित एवं गतिशील हो उठता है। यह दृश्य शिष्यों के अंतर्भाव को पूर्णतः दर्शाता है, दिव्य कृपा एवं ज्ञान की वर्षा के लिए शिष्यों की अनुकम्पा का भी प्रतीक है गुरु पूर्णिमा। जैसे कि शिष्य गुरु से प्राथना करता है:  हे गुरुदेवजिस प्रकार यह निर्जलीकृत धरा वर्षा को ग्रहण कर रही है, मैं भी, ज्ञान की असीम तृष्णा में, इस सुखी धरती के समान, आपकी कृपा की विशाल बाढ़ में जलथल हो जाऊँ। ऐसी मान्यता है की गुरु की कृपा एवं शक्ति का गुरुपूर्णिमा के दिवस सहस्त्रगुना वर्धन होता है । इसका मूल कारण यह है कि युगांतर से अनेक आत्मबुद्ध ऋषि एवं मनीषियों ने, समस्त मानवता के आध्यात्मिक कल्याण हेतु पृथ्वी के सूक्ष्म वातावरण में असीम उदारता से अपनी शक्ति एवं चैतन्य का प्रवाह किया है। यह सर्वविदित है की एक आत्मबोधि ऋषि के आशीर्वाद में सम्पूर्ण काल एवं देश में यथार्थी-करण की अमोघ शक्ति है – ऐसी है सत्य की शक्ति। तथापि, समस्त सत्यनिष्ठ एवं आत्मनिष्ट साधक, स्वयं की गुरुआस्था का पुनः नवीनीकरण करने हेतु, पुरुषोत्तम की ओर अवरोहण के संकल्प को पुनर्जीवित करने हेतु, स्वयं को पुनः अर्पित करने हेतु, इस दिवस की प्रतीक्षा करते हैं। एक ऐसा अवरोहण जो की गुरु के सजीव सहयोग के बिना प्राप्त करना प्रायः असम्भव हो जाएगा। गुरुपूर्णिमा का सनातन हिंदू धर्म के सभी आध्यात्मिक साधकों एवं भक्तों के लिए गहन महत्व है। यह आध्यात्मिक ऊर्जा एवं शक्ति से परिपूर्ण दिवस है, तथा आध्यात्मिक ऊर्जा से परिपूर्ण अवधि का प्रारम्भ है। यह एक ऐसी अवधि है जो कि उन सब के लिए, जो उच्च चेतना के प्रति अल्पमात्र भी जागृत हैं, विकास की एवं नवीनीकरण की असीम आध्यात्मिक सम्भावनाओं का प्रकटन करती है। ऐसी मूल्यवान अवधि व्यर्थ नहीं जानी चाहिए। शिष्यों को केवल अपने आत्मिक केंद्र पर ध्यान करना है, अपने भीतर की अंतर्तम अभीप्सा पर चित्त लगाना है तथा शेष कठिन श्रम पूर्ण निश्चिंतता से गुरु को सौंप देना है ।  सनातन हिंदू इतिहास के अनुसार, गुरु पूर्णिमा के दिन, महाभारत के रचयिता, कृष्ण द्वापायन व्यास का शुभजन्म हुआ था, वह ऋषि पराशर एवं मतस्यराज दुश्रज की सुपुत्री, देवी सत्यवती की संतान हैं। श्रीमद भागवत में यह कथित है की “ईश्वरत्व के सत्रहवें अवतार के रूप में, श्री व्यासदेव सत्यवती के गर्भ में ऋषि पराशर के द्वारा प्रकट हुए, उन्होंने पूर्वकाल में सरल प्रसार हेतु अखंडित वेद का अनेक खंडो एवं उपखंडों में विभाजन किया”। इस कारण से यह दिवस व्यास-पूर्णिमा के रूप में भी जाना जाता है। कृष्ण द्वापायन व्यास को सनातन हिंदू परम्परा के आद्यप्रारूपीय या मूलप्रारूपीय गुरु की मान्यता प्राप्त है। एक और प्रसिद्ध दन्तकथा, जो कि सम्भवतः काल के प्रारम्भ में घटित हुई थी, के अनुसार प्रथम गुरु, गुरुओं के महागुरु, स्वयं शिव, जो दक्षिणमूर्ती नाम से भी प्रसिद्ध हैं, वह जिसका मुख दक्षिण दिशा के ओर है, ने सर्वोच्च आत्मा की प्रथम विद्या मानवता को प्रदान की थी। इसी कारणवश शिव को आदिगुरू एवं आद्यप्ररूपी गुरु की मान्यता प्राप्त है। प्राचीनकाल में सदियों पूर्व इसी दिवस पर आदियोगी शिव ने गुरु का आवरण ग्रहण किया था। फलतः शिव आदिगुरु हैं, और यौगिक परम्परा के प्रथम गुरु हैं।  यह दन्तकथा कुछ इस प्रकार प्रचलित है: प्राचीन काल में, चार प्रबुद्ध पुरुष, अपने अस्तित्व सम्बन्धी प्रश्नों के गूढ़तम उत्तरों की खोज में थे, एक स्थान से दूसरे स्थान भ्रमण करते हुए किसी ऐसे व्यक्ति को खोज रहे थे जो उन्हें ज्ञान का मार्ग दिखा सके। इनमे से प्रथम व्यक्ति अक्षय आनंद एवं दुःख से सदा के लिए मुक्ति के गुप्त ज्ञान की प्राप्ति का इच्छुक था। दूसरा समृद्धि एवं स्वास्थ्य के ज्ञान तथा अभाव एवं असुरक्षा से पूर्ण मुक्ति के गुप्त ज्ञान की प्राप्ति का इच्छुक था। तीसरा बुद्धिमान व्यक्ति जीवन के अर्थ एवं महत्व को जानने का इच्छुक था,  क्या मनुष्य जीवन का स्थायी महत्व एवं मूल्य है ? चौथा व्यक्ति ज्ञान एवं मनीषा का उपासक था, परंतु अपूर्णता का अनुभव करता था क्योंकि उसकी मनीषा में, सर्वोच्च सत्य के भाँति, नवीनीकरण करने का सामर्थ्य नहीं था, जो केवल जीवंत गुरु के माध्यम से ही प्रकट रूप में प्राप्त हो सकता है। उसे इस ज्ञान को प्राप्त करने के मार्ग का बोध नहीं था। अंततः वह चार अन्वेषक एक दूरस्थ गाँव में स्थित एक पुरातन बरगद के वृक्ष तक पहुँचे। उन्हें वहाँ एक युवा पुरुष मिला, जो की शांति एवं स्थिरता में आसीत था, उसके मुखमंडल पर शुभ मंगलकारी मुस्कान थी। उसके मुखमंडल को देखते हुए, उन सभी के मन में एक साथ यह विचार उत्पन्न हुआ कि यह युवा हमें सर्वोच्च ज्ञान के गुप्तमार्ग का रहस्य बताएगा। तत्पश्चात् वह उसके समक्ष शांतिपूर्वक असीत हो गए, और उसकी आँखें खुलने की प्रतीक्षा करने लगे। युग के समान प्रतीत होती कालावधि के पश्चात उस रहस्यमयी युवा पुरुष ने अपने चक्षु खोले, और उन चारों का अवलोकन किया। उसकी मुस्कान अत्यंत दीप्तिमान हो गयी, उसके नेत्रों ने इस प्रकार देखा की जैसे उनके हृदयों की  अतिगहनता के सहज ही दर्शन कर रहा हो। परंतु वह पूर्णरूप से मौन रहा, उसने केवल एक असामान्य मुद्रा ग्रहण की। और, जैसे की एक गुप्त संचार से, चारों बुद्धिमान व्यक्तियों को ज्ञान की प्राप्ति हुई, उनको समस्त प्रश्नो के उत्तर प्राप्त हो गए एवं प्रबोधन की प्राप्ति हुई। प्रथम व्यक्ति को मनुष्य के दुःख के मूल का ज्ञान हो गया; दूसरे व्यक्ति को भय एवं अभाव के मूल का बोध हो गया, तीसरे को मानव अस्तित्व के वास्तविक मूल्य एवं महत्व का ज्ञान हो गया एवं चौथे को सानिध्य का बोध हुआ; गुरु से साथ गहन आंतरिक संपर्क का ज्ञान हुआ। यह वास्तव में गुरु से शिष्य को योगिक ज्ञान का प्रथम संचार था। यह सनातन हिंदू धर्म की गुरु-शिष्य परम्परा का जन्म था। यही परम्परा हमारे सनातन धर्म का मूल आधार है। यह गुरु से शिष्य तक ज्ञान संचार की परम्परा आज तक निरंतर जीवित है। यह संचार कथित या लिखित शब्द के द्वारा, आंतरिक प्रेरणा एवं अंतर्दृष्टि के द्वारा, अथवा मौन के द्वारा प्रवाहित है। यही परम्परा आध्यात्मिक धर्म की रीढ़ है। आदि शंकराचार्य ने, प्रथम गुरु से प्रथम शिष्यों को प्रथम ज्ञान संचार के प्रतीक चिह्न के रूप में एक सुन्दर काव्य की रचना की है जो इस प्रकार है: मौनव्याख्या प्रकटित परब्रह्मतत्त्वं युवानंवर्षिष्ठांते वसद् ऋषिगणैः आवृतं ब्रह्मनिष्ठैः । आचार्येन्द्रं करकलित चिन्मुद्रमानंदमूर्तिं स्वात्मारामं मुदितवदनं दक्षिणामूर्तिमीडे ॥१॥ अनुवादित अर्थ यह है : उस दक्षिणमूर्ती की हम स्तुति एवं अभिवादन करते है, जो सर्वोच्च ब्रह्म के सत्यस्वरूप की व्यखाया करते है, अपने परम मौन के द्वारा, जो देखने में युवा हैं, शिष्यों से घिरे हुए, शिष्य जो कि स्वयं पुरातन ऋषि है, जिनकी बुद्धि ब्रह्मस्थित है, जो की गुरुओं में महागुरु हैं, जो अपने हस्त से चिनमुद्रा दर्शाते हैं, जो आनंद का साक्षातरूप हैं आनंद अंतर्भाव में अभिभूत हैं। गुरुपूर्णमा का पर्व बौद्ध एवं जैन परम्परा के अनुयायी भी मनाते है। बुद्ध धर्म के अनुयायी इस शुभ दिवस को सारनाथ में बुद्ध के प्रथम उपदेश के सम्मान एवं प्रतीक चिन्ह के रूप में मनाते है। अपनी निर्वाणप्राप्ति के पाँच सप्ताह के पश्चात बुद्ध बोधगया से सारनाथ, अपने पुराने पाँच साथियों- पंचवर्गिकाओं को ढूँढने गए थे। उन्हें यह पूर्वज्ञान हो गया था की यह पुराने साथी उनसे बौद्धधर्म की दीक्षा लेने के लिए परिपक्व एवं इच्छुक हैं। जब बुद्ध को अपने पुरातन साथी मिल गए तो उन्होंने उनको धर्मचक्रप्रवर्तन सूत्र का ज्ञान दिया। इस ज्ञान संचार से उनके साथी प्रबुद्ध हो गए और सम्भवतः बुद्ध धर्म के प्रथम भिक्षु बने। इस संचारस्वरूप ज्ञान से, आषाढ़ मास की पूर्णिमा के दिन बुद्ध के संघ के स्थापना हुई। बुद्ध ने निर्वाणप्राप्ति के पश्चात के प्रथम वर्षाऋतु के काल का सारनाथ में ही निर्वाह किया । जैन धर्म के अनुयायी गुरुपूर्णिमा का पर्व चौबीसवें तीर्थान्कर महावीर के प्रथम शिष्य, इंद्र्भूति गौतम, को ग्रहण करने के दिवस का पुनः स्मरण करने के लिए मनाते है। उस गुरुपूर्णिमा के दिवस के उपरांत महावीर ने गुरु का रूप धारण किया। गुप्त महत्व तथापि, शिष्य किस प्रकार इस दिवस की शक्ति एवं शुभत्व का उपयोग करता है ? साधारण रूप से लोग गुरुपूजन करते है। इसका अपना अलग महत्व है। पर गुरुपूजन केवल प्रथम कार्य है। पूजन का, आंतरिक जीवंत सम्पर्क एवं आत्मीयता में परिवर्तित होना अत्यंत आवश्यक है – जिसे एक शब्द में सानिध्य कहते हैं। गुरु के साथ आध्यात्मिक समीपता में होना, गुरु की जीवंत उपस्थिति में होना, गुरु-शिष्य के सम्बंध का सार है। गुरु से शारीरिक दूरस्थता या निकटता महत्वहीन होती है: गुरु के भौतिक शरीर में होना या ना होना भी महत्वहीन है। सानिध्य काल एवं देश, जन्म और मृत्यु से अतिक्रमित है; जिस गुरु ने आत्मा का साक्षात्कार कर लिया है वह अनश्वर है, शाश्वत है और उतनी ही सरलता से अतिभौतिक लोक में प्रकट हो सकता है जितनी सरलता से वह भौतिक लोक में प्रकट होता है। परंतु शिष्य को स्वयमेव गुरु के समक्ष आंतरिक एवं पूर्ण रूप से समर्पण करने की प्रक्रिया का बोध होना चाहिए, केवल इसके फलस्वरूप ही गुरु शिष्य की चेतना में व्यक्त हो सकता है । समस्त एवं पूर्ण समर्पण इस गुप्तप्रक्रिया का सर्वोच्च रहस्य है। गुरु का कार्य चित्त की तपस है। गुरु जिस ज्ञान का शब्द या मुद्रा के द्वारा संचार करता है सानिध्य की संचार क्षमता का वह अल्पांश मात्र है । गुरु की विद्या का समस्त गांभीर्य गुरु के मौन के द्वारा प्रवाहित होता है; गुरु के मौन के द्वारा ही सत्य की सर्वशक्ति का एवं सर्वशुद्धता का संचार होता है । फलतः शिष्य को अपनी बुद्धि एवं हृदय को गुरु के मौन को ग्रहण करने के लिए तैयार करना चाहिए। और यह तभी श्रेष्ठता पूर्वक कार्यान्वित हो सकता है जब शिष्य स्वयं गहन ग्रहणशीलता एवं शांतभाव में स्थित हो। अतः गुरुपूर्णिमा अंतर्मौन को ग्रहण करने का दिवस है। आवाहन, सम्पूर्ण समर्पण एवं ध्यान की तिथि है। ध्यान के फलस्वरूप शिष्य के अंदर तपस-तेज उत्पन्न होता है। वह तप शक्ति, जिसके बिना गुरु के प्रकाश अथवा शक्ति के किसी भी अंश को ग्रहण या आत्मसात् नहीं किया जा सकता। हमें स्मरण रखना चाहिए, वास्तविकता में संचार केवल आध्यात्मिक शक्ति का होता है, मानसिक ज्ञान या समझ का नहीं। मानसिक ज्ञान एवं समझ बोधित कर सकता है परंतु आध्यात्मिक शक्ति पूर्ण नवीनीकरण करती है, पुराने स्वभाव एवं शरीर को दिव्य स्वर्णरूप में परिणत करती है। समर्पण, ध्यान के समान ही महत्वपूर्ण है। समर्पण स्वयं को पूर्णतः गुरु के चरणो में अर्पित करने की क्रिया है, और स्वयं का समर्पण करने के फलस्वरूप, अपने को गुरु की कृपा एवं शक्ति के योग्य बनाने की प्रक्रिया। समर्पण का वास्तविक अर्थ है – पवित्र बनाना, बुद्धि, हृदय एवं शरीर में ईश्वर को ग्रहण करने के लिए स्वयं को तैयार करना। क्योंकि गुरु या ईश्वर केवल तभी प्रकट होंगे जब पात्र शुद्ध एवं पूर्ण होगा। जब समर्पण हो जाता है तथा ध्यान की दृढ़ता से स्थापना हो जाती है, उसके बाद शिष्य आवाहन के लिए तैयार हो जाता है। गुरु की आध्यात्मिक शक्ति का आवाहन एवं उसे अपनी अंतरात्मा में धारण करने के लिए शिष्य परिपक्व हो जाता है। यह आवाहन है गुरु के व्यक्त होने का, पूर्ण नियंत्रण करने का, अंतर्गुरु बनने का, स्वयं के सम्पूर्ण अस्तित्व का ईश्वर बनने का, अंतर् ईश्वरत्व, अन्तर्दिव्यता प्रदान करने का। पांडिचेर्री आश्रम की श्री माँ ने हमें इस प्रकार के आवाहन के लिए अति उत्तम मंत्र दिया है : ॐ नमो भगवते … हे ईश्वर, आओ, स्वयं को प्रकट करो, मुझे दिव्यरूप में परिवर्तित कर दो।स्वयं श्री माँ के शब्दों में: प्रथम शब्द, ॐ, का अर्थ है सर्वोच्च आवाहन, सर्वोच्च का आवाहन। द्वितीय शब्द, नमो, का अर्थ है स्वयं का पूर्ण समर्पण। तृतीय शब्द, भगवते, का अर्थ है अभीप्सा, उस दिव्यतत्व की जिसमें सृष्टि को परिवर्तित होना है। यह आत्मा का परमात्मा के लिए नित्य निरंतर आवाहन है, शिष्य का दिव्य आत्मा के लिए आवाहन है। गुरु, मानव तथा ईश्वर के बीच का माध्यम है, आत्मा और परमात्मा के बीच, नश्वर और शाश्वत के बीच का सेतु है। शिष्य को यह स्मरण होना चाहिए कि गुरु और ईश्वर के बीच कोई अन्तर नहीं है। गुरु मध्यभूमि पर, दृश्य और अदृश्य के बीच खड़ा होता है, अव्यक्त और व्यक्त के बीच रहता है, आत्मबोध के उच्चतम शिखर एवं हमारी मानव अभीप्सा का आधार शिविर, हमारी साधना। गुरु के बिना, हमारा अवरोहण अत्यंत कठिन होगा और कई वर्षों की साधना के पश्चात प्राप्य होगा; परंतु गुरु के साथ हम सीधा उड़ान भर सकते है, और कुछ वर्षों के अंदर सकल जीवनकाल की साधाना को संकुचित कर सकते है । ऐसी होती है गुरु कि शक्ति। गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुर्गुरुर्देवो महेश्वरः । गुरु साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥ गुरु ही ब्रह्मा है – रचयिता है, गुरु ही विष्णु है – पालनहार है, गुरु ही शिव है – विनाशकर्ता है। गुरु स्वयं ही शरीरस्थ सर्वोच्च ब्रह्म है: उस दिव्य गुरु को मेरा नमन। इस वर्ष 2020 में गुरु पूर्णिमा 5 जुलाई को है  पूर्णिमा तिथि का आरम्भ – 4 जुलाई, सुबह 11.33 पूर्वाह्न पूर्णिमा तिथि का अंत – 5 जुलाई, सुबह 10.13 पूर्वाह्न  Read original article in English
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अग्नि पुरुष
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अग्नि पुरुष

सम्पादकीय टीम द्वारा अनुवादित श्रद्धाशक्ति तथा भविष्य निर्माण कुछ ऐसे व्यक्ति होते हैं जो वर्तमान के अपने अस्तित्व और कर्मों के प्रति सतत असंतुष्टि की अनुभूति करते हैं| ऐसे व्यक्ति अथवा व्यक्तित्व का बोध आप सरलता से कर सकते हैं| उनके स्वभाव में कौतूहल और गाम्भीर्य ध्यानाकर्षक होता है तथा वर्तमान की स्वीकृत मान्यताओं एवं रूढ़ियों के प्रति एक निर्भीक व विनम्र नकारात्मकता उनके व्यक्तित्व मे वास करती है| आप ऐसे व्यक्ति को सरलता से किसी परिभाषा या वर्ग में नहीं बांध सकते| इनसे मित्रता रखना भी एक कठिन कार्य है| यह बार बार आपको उकसायेंगे, आपके दौर्बल्य पर प्रहार करेंगे| असीम विनम्रता भी इनका एक गुण है और इनकी विनम्रता ही इनकी मर्मस्थली भी होती है | प्राय: यह असंतुष्टि किसी विफलता या विफलता की आशंका से उतपन्न नहीं होती, बल्कि, सफलता के कारणस्वरूप जन्म लेती है | जितनी अधिक कुशलता से वह कार्यों को कर पाते हैं, जितनी उनकी कार्यकुशलता को स्वीकृति मिलती है, उतना ही वो विरक्त हो जाते हैं  | और यह विरक्ति, प्रेरणास्वरूप उन्हें उच्चतम उच्चता और गहनतम गहनता कि ओर अग्रसर करती है l जब तक वह अपनी क्षमता की चरमसीमा तक नहीं पहुँचते, एक क्षण भी विश्राम नहीं करते | आपको ऐसे व्यक्ति हर कार्यक्षेत्र में मिल जाएँगे जैसे : खेल, व्यवसाय, कला, समाचार और मनोरंजन एवं धर्मकार्य आदि क्षेत्रों में। मैं इन्हें “अग्नि पुरुष” के नाम से संबोधित करता हूँ | कई वर्ष पूर्व हिमालय की पर्वत श्रेणियों में मेरी एक परिपक्व योगी बाबा से भेंट हुई थी | उनके कथनानुसर पृथ्वी का अस्तित्व उसके भीतर की आध्यात्मिक ज्योति पर निर्भर है । यह ज्योति जो सूर्य का मूलभूत तत्व है तथा मानव अस्तित्व का भी मूलभूत तत्व है, उन्होंने इस ज्योति को अग्नि के नाम से सम्बोधित किया था । योगी बाबा के अनुसार, इस अग्नि की विहीनता में पृथ्वी एक अतिशीत मृत ग्रह में और सक्रिय जीवन एक शीत रात्रि में परिवर्तित हो जायेगा। समस्त जीवनशक्ति एवं चित्तशक्ति इस ब्रह्मांडीय अग्नि का तेज अंश है, यह अग्नी ही आत्मा के गर्भ में है ।उन्होंने अत्यंत गम्भीरता से बताया था कि , “इस सन्तुलन को परिवर्तित करने का समय अब आ गया है। अब या तो तमसपूर्ण अतिशीत मृतरात्रि में पृथ्वी का अंत होगा अथवा पवित्र तेजमय ज्वाला – अग्नि में शाश्वत दिव्य दिवस की उषा फैलेगी।” “बाबा, इस संतुलन के परिवर्तन का उत्तरदायित्व किसका है?” मैंने भययुक्त निष्कपट भाव से प्रश्न किया था । “तुम्हारा”, उन्होंने नि:संकोच पर अर्थपूर्ण उत्तर दिया था और बोले, “तुम्हारा और तुम्हारे जैसे उन सब का, जिनमे सत्य के मार्ग पर चलने का साहस है, सत्य का आवाहन करने का पराक्रम है तथा जीवन से एकमात्र उच्चतम सत्य की अपेक्षा करने का साहस एवं धैर्य है।” “परन्तु हम तो केवल सत्य के साधक हैं बाबा, सत्य के ज्ञानी नहीं। प्राय: हमें तो इसका बोध भी नहीं होता कि हमारे जीवन की अपेक्षा काल्पनिक है या अकल्पित”, मेरे मन के पृष्ठ पटल पर अनायास ही यह प्रश्न उभर आया था। “असत्य”, योगी बाबा ने कहा, “तुम साक्षात अग्निपुरुष हो। तुम्हारे जैसे अग्निपुरुष ही सूर्य को जीवंत रखेंगे। अन्यथा पृथ्वी पर मृत्यु और अंधकार का वास होगा।” यही अग्नि मानव अस्तित्व के केंद्र में वास करती है। वह मूलशक्ति, जो जीवन को गति व ऊर्जा प्रदान करती है, उसे विकास की ओर अग्रसर करती है, चैतन्यशक्ति का एवं जीवनशक्ति का विकास करती है। यह अग्नि ही समस्त जगत की विकास शक्ति है। कई वर्ष और उन वर्षों के कठिन आत्मिक परिश्रम के उपरांत ही मुझे योगीबाबा के शब्दों के अर्थ का बोध होना प्रारम्भ हुआ। पर जिस क्षण यह बोध आरम्भ हुआ, उसी क्षण से मैंने ऐसे अग्निपुरूषों की खोज आरम्भ करदी। सर्वप्रथम, मेरे स्वयं के भीतर, और फिर उन सब के भीतर, जिनसे मैं मिलता था। एक तथ्य तत्काल अतिस्पष्ट हो गया कि ऐसे अग्नि पुरुष दुर्लभ हैं। यह मानो एक भिन्न मानव प्रजाति है, जो कि अल्पसंखया में है और अतिदुर्लभ है। सम्भवतः उन प्रारम्भिक स्तनधारी प्रजातीयों की भाँति जिनसे डायनॉसॉरो का युग आरम्भ हुआ होगा। विश्व पर अग्निविहीन व्यक्तियों का प्रभुत्व है। यह तेजमयी दीप्तिमान अग्निपुरुष, अज्ञातवास में चले जाते हैं या हमारे इस निराशाजनक अंधकारमय जगत से सन्यास ले लेते हैं। और अपनी अनुपस्थिति से वह, इस विश्व को, अग्निविहीन व्यक्तियों को स्वत: ही सौंप देते हैं।  तुच्छ तथा मूर्खतापूर्ण कार्यों में ध्यानमग्न कई पीढ़ीयां नष्ट हो जाती हैं, तथा उस अवधि में पृथ्वी की आत्मा का निरंतर पतन और क्षय होता रहता है। किसी व्यक्ति को तो पृथ्वी के पक्ष में तथा आध्यात्मिक सत्य के पक्ष में विचार प्रकट करने ही होंगे। अभी नहीं या कभी नहीं। क्योंकि यदि हम अब भी जागृत नहीं हुए तो हम अपना भविष्य सदा के लिए ध्यानहीन और धर्मभ्रष्ट लोगों के हाथों गँवा देंगे। यह निर्णायक काल है। यही काल विश्वसंतुलन में परिवर्तन लाएगा । और यह, जैसा कि महाऋषि अरविंद ने लिखा है दिव्यकाल है (The hour of God)। हम मनुष्य –  जो कि पृथ्वी की विकासप्रक्रिया के योग्य हैं- हम क्या कर रहे हैं? जो कर्म, परिश्रम और सर्जन करने में सक्षम हैं, उन्होंने अपनी आत्माओं को, सर्वविदित धन के ईश्वर को भेंट कर दिया है। उनका मूलभूत अस्तित्व ही भौतिक सफलता तथा धन सम्पत्ति की अधिक प्राप्ति पर आधारित है। और वो लोग, जिनमे विचार, अध्ययन, मनन और अध्यापन की योग्यता है, हमारे दार्शनिक तथा बुद्धिजीवी वर्ग, वह आज अपने दर्शन और अध्यापन से हमें प्रेरणा और नेतृत्व देने में असमर्थ हैं। किसी कारणवश, उनके वाक में जागृत करने की शक्ति (अग्नि) नहीं बची है। तथापि आज की बाल एवं युवा पीढ़ी स्वयं के और विश्व के भविष्य के प्रति अबोधित रहती है। और जो उनके परिजनों की पीढ़ी है वह या तो अतीत की स्मृति में लुप्त हैं या अपने निराशावादी दोषदर्षिता के व्यसन में मुग्ध हैं। जो चिंतक और विचारक है  वह केवल संभाषण करते हैं। उन्होंने संभाषण की कला में दक्षता प्राप्त कर ली है – और ईश्वर का धन्यवाद की किसी क्षेत्र में तो दक्ष्यता की प्राप्ति हुई। और जो कर्ता वर्ग है और जो प्रबंधक हैं, वह विश्व के रंगमंच पर केवल एक कार्य की सिद्धि से अगली सिद्धि के बीच अंधगति से भागते रहते है। जो घट रहा है तथा वह स्वयं कहाँ जा रहे है, इसका उन्हें कोई बोध नहीं होता। इन कर्ताओं के पास विचारकों के लिए समय या सहनशीलता का अभाव होता है, और वहीं विचारक जिनकी अस्थियों के मज़्ज़े में भी निराशवादिता भरी हुई है, अज्ञानी कर्ता के प्रति अविश्वास का भाव रखते हैं। हमारे समाज का विशालकाय विभाजन यहीं पर  है। दार्शनिक अपने विशाल आसन पर विराजमान होकर अपनी प्रतीकात्मक धूम्रनलिका से धूम्रपान करता है, किसी दूरस्थ आदर्श समाज के स्वपनदर्शन करता है। वहीं कर्ता कुढ़ता और अकड़ता है, अपने वैश्विक रंगमंच के क्षणों का सर्वनाश करता है, और लुप्त हो जाता है । तो प्रशन यह है – कौन करेगा मार्गदर्शन? या अगर और सटीकता से पूछें तो, वह कौनसा तत्व है जो मार्गदर्शन करने योग्य है? क्या वह बुद्धि है? पर बुद्धि तो अतिभ्रमित है, उसकी अपनी ही विशिष्ट शब्दावली है और तार्किक आँकड़ों से भरी हुई है। यह बुद्धि या तो अत्यंत निराशावादी दोषदर्षिता में लिप्त है अथवा अपने सर्वभक्षी निजी स्वार्थ से प्रेरित होकर उदासीन है। क्या वह हृदय तत्व है? पर हृदय तो कातर है, एवं दृढ़ता और प्रभावकारी ढंग से क्रिया करने हेतु अति संकोची है। दूसरे शब्दों में कहें तो बुद्धि और हृदय दोनो ही विचल और प्रभावहीन हो गए हैं। अवश्य ही कोई और महाशक्ति होगी। और वह महाशक्ति क्या है – क्या वह आत्मा है? वह आत्मा जिसे हमारे गुरु और ऋषीगणों ने उच्चतम प्राप्ति कहा है? क्या यह आतंरिक बुद्ध, बौद्ध गुरुओं के द्वारा बताई गई अंतर्प्रज्ञा है, जिसे वेदिक ज्ञान की अंतरात्मा भी कहते हैं? आप किस नाम से उसका सम्बोधन करें वह कदाचित महत्वहीन है। महत्वपूर्ण यह है कि आप इस आत्मिक शक्ति में विश्वास करते है, आपको यह ज्ञान है कि ऐसी एक शक्ति आपके अंदर भी विद्यमान है‌ चित्तशक्ति की शुद्ध ज्योति के रूप में, एक अपरिवर्तनीय ज्ञानस्तोत्र के रूप में, और असीम करुणा और प्रेम के रूप में जो सभी परिस्थीयों और संबंधों से पूर्णतः स्वतंत्र है। यह एक अचूक इच्छाशक्ति, धारण सामर्थ्य एवं विवेकशक्ति है जो सहजता से जान लेती है की क्या उचित है और क्या न्यायशील है। इस शक्ति को प्रतिस्पर्धित या प्रतिरोधी भावनाओं से संघर्षरत होने की आवश्यकता नहीं पड़ती। इस धारणा में विश्वास स्थापित करना हमारा अग्रणी एवं महत्वपूर्ण पद होगा। और यह अग्रणी पद अपनेआप में इस निराशवाद के भयावह रोग के निवारण का आरम्भ है जिसने वर्तमान की सभी सभ्यताओं और समाजों के प्रत्येक व्यक्ति को अपने चपेट में ले लिया है। यह निराशावादिता एक शक्तिहीन करने वाली अयोग्यता है, जिसके कारणवश हम किसी भी उचित अथवा श्रेष्ठ वस्तु, विचार या पुरुष पर विश्वास करने में असमर्थ है।और यही वो बिंदु है जहाँ आकर सब बिखर जाता है: क्योंकि बिना विश्वासशक्ति के हम कुछ नहीं कर सकते। हम नेतृत्व में नेतृत्व में, प्रेरित और प्रभावित करने में अक्षम हैं। । हमारी सामूहिक सामाजिक नपुंसकता का वास्तविक कारण ही यह है – की हम में विश्वास करने की क्षमता नहीं है। हमारा समाज नास्तिक, निराशावादी और अविश्वासी लोगों का समाज बन गया है। और जीवन के अलङ्घ्य सिद्धांत का अनुसरण करते हुए, हम अंततः अपने निजी और सामूहिक जीवन में वह सब वास्तविकता में ले आते हैं जिसे हमने अपनी अपेक्षाओं में धारण किया था। इसलिए हमें अधम की प्राप्ति होती है क्योंकि हम अधम की निरंतर अपेक्षा करते है। हमें असुर तत्वों की प्राप्ति इसी कारणवश होती है क्योंकि हम, हमारे धार्मिक विचारो के होते हुए भी, ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास नहीं कर पाते। इसलिए एक सार्थक नेतृत्व के निर्माण करने हेतु हमें सर्वप्रथम – अपने अंदर, अपनी सभ्यता एवं संस्कृति में और मानवता के भविष्य में – आस्था का, श्रद्धा का, अभिलाषा का और दृढ़ विश्वास का निर्माण एवं स्थापन करना होगा। पर यह उम्मीद और श्रद्धाभाव केवल आशावादी विचारों और स्वयं सम्मोहन पर क़तई आधारित ना हो इसका भी ध्यान रखना होगा। इस श्रद्धा एवं आस्था; आशा एवं आत्मविश्वास की उत्तपत्ति, अनिवार्य रूप से, गहन आंतरिक स्रोत से होना अतिआवश्यक है , हमारा गहन एवं सतस्वरूप चित्त, हमारा अतिविश्वस्त एवं अतिप्रकाशित अंतर्बोध और ज्ञान आदि। दूसरे शब्दों में कहें तो हमें अपने अंदर की आध्यात्मिक श्रद्धा की पुनः प्राप्ति करनी है। और आध्यात्मिक श्रद्धा किसी स्वर्ग में वास करने वाले भगवान के प्रति नहीं, यद्यपि मानवता के गर्भ में वास करने वाली ईश्वरीय शक्ति के प्रति । हमें यह विश्वास जागृत है करना है की उच्चता के लिए, सत्यता के लिए और श्रेष्टता के लिए‌, हम पूरी तरह सक्षम हैं। हमें इस तथ्य पर अवश्य चिन्तन करना चाहिए की स्वर्ग में वास करने वाले भगवान में विश्वास करना सरल है पर हम सबके अंदर, अनेकों संभावनाओं के रूप में, वास करने वाले ईश्वर में श्रद्धा रखना अतिकठिन है। स्वर्गप्रवासी भगवान में आस्था, मानवता में आपके अविश्वास के साथ, सुखद रूप से सहमति में रह सकती है पर मानवता की इन संभावनाओं में आस्था, असाधारण प्रयासों की माँग करती है, जैसे – मानव स्वभाव के संपूर्णज्ञान की प्राप्ति का प्रयास, मानव स्वाभाव के भारी दोषों और मूर्खतापूर्ण कृत्यों को स्वीकृत करना और फिर भी आस ना छोड़ना, और बुद्धिहीन निराशवाद अथवा ह्रदयहीन दुःख के प्रति समर्पण को नकार देना, आदि अत्यंत ही कठिन पर संभव प्रयास है। इस प्रयास के लिए हमें हमारे भविष्य की एक असीम दूरदर्शी कल्पना करनी होगी। और मानव स्वभाव का सम्पूर्ण ज्ञान प्राप्त करना होगा, और मनुष्य की विकास सम्भावनाओं का एक गहन आभास करना होगा। अंततः निराशावाद का यथार्थ क्या है? क्या इसका सरल अर्थ यह नहीं कि हमने अपने अन्तर की गहराई को ढंग से टटोला नहीं है ? की हमें मनुष्य जीवन के यथार्थ महत्व का बोध नहीं है? की हम केवल जीवन सतह का ज्ञान ले रहे हैं, और अपने वर्तमान के क्षणिक दृश को सम्पूर्ण सत्य मान रहे है? यह तो एक कलाकार की अपूर्ण कलाकृति को देखने के पश्चात उसे कुरूप कह कर अस्वीकृत करने जैसा है। केवल इस कारण से की हमें यह बोध नहीं है की पूर्ण होने के पश्चात वह कलाकृति कैसी दिखेगी। क्या यह उच्च कोटि की अधीरता, या निम्न कोटि की बाल मूर्खता नहीं है? परंतु इस संघर्षरत भाग में उभरते हुए पूर्ण को ढूंढना, अन्धतम रात्रि में प्रभात की एक झलक देखना अथवा अतक्ष शिला में सिद्ध रूप की झलक देखना, एक संकुचित बीज में पुष्प की कल्पना करना या एक प्रचंड धारा का अनुभव करना अल्पधारा की बूँदभर में, यह विधाएं कल्पनाशक्ति का आवाहन करती हैं तथा श्रद्धा का, अंतर्दृष्टि का, ज्ञान का, धीरता का और नम्रता का आवाहन करती हैं। और अवश्य ही एक नवदृष्टि का, एक नए प्रकार के अवबोधन का आवाहन करती हैं। और यह नवीन प्रकार का अवबोधन कोई अर्थहीन रहस्मयी प्रक्रिया नहीं है। यह अपने आपको पुनः देखने और समझने की सहज और उपयोगी शैली है। अपने इतिहास के, अपनी सम्भावनाओं के, हमारे गतिशीलता से विकसित होते आध्यात्मिक सत्य के बोध की प्रक्रिया है। यह मनुष्य की गाथा का पुनर्मूल्यांकन करने का एक व्यावहारिक मार्ग है। गहन आकारों और सूक्ष्म भेदों के बोध की विद्या है यह । मैं इसे आत्मिक दृष्टि कहता हूँ । आत्मिक वो नहीं जिसकी चर्चा मंदिरों में होती है, पर वो जिसका अनुभव तात्कालिक है, साक्षात है । मूल दृष्टि : वह दृष्टि जो बुद्धि के पूर्वाग्रहों के और भावनात्मक प्रतिबंधों के आवरण से परे है, सामाजिक व सांस्कृतिक पक्षपातों से, व्यक्तिगत या व्यक्तित्व के अंधबिंदुओं से परे है । शुद्ध दृष्टि: अंतरज्ञान की दृष्टि, बौद्धिक अड़चनों से परे सूक्ष्मता का प्रत्यक्ष ज्ञान है ना की स्थूलता का आभास है। जब आप इस प्रकार से देखना प्रारम्भ करते हैं, तो आपका ध्यान स्वयं उन सूक्ष्म भागों पर जाता है जिन्हें आपने पहले कभी ध्यनापूर्वक देखा ही नहीं था। इस अतिविशाल ब्रह्मण्डिया पहेली के सब भाग स्वेच्छा से अपने अपने स्थान को ग्रहण करने लगते हैं । गूढ़तम अर्थ, स्वाभाविक और सहज रूप से स्वयं प्रकाशित हो जाते हैं । ज्ञानप्रज्ञा का स्वतः उदय होता है, एक शांत बोध का प्रकाश आपके दिन और रात्रि के घंटो को प्रभुद्ध कर देता है, आपके प्रतिदिन के जीवन का स्वरूप परिवर्तित हो जाता है, और आप साधारण जीवन में असाधारणता की, सामान्य जीवन में भव्यता की, प्रथम, पर किंचित अनिश्चित झलकियाँ पकड़ना प्रारम्भ कर देते हैं। इस प्रक्रिया के अनुसरण का क्रम अतिसरल है| अपने भीतर की उस सम्भावना में, अंतर्बुद्ध में, अंतर्ज्ञान में, श्रद्धा जागृत करें। अपनी उच्चतम सम्भावना के प्रकाश में, उसके प्रति ध्यानवर्धन करें, और वह स्वयं ही आपके अनुभव में अधिकाधिक चैतन्य एवं साकार होता जाएगा। एकबार जब यह प्रकिया आरम्भ हो जाएगी, फिर निरंतर प्रयास से उसे चेतना पूर्वक अधिकाधिक अपने नित्यजीवन और नित्यकर्म में और अपने विचारों और भावनाओं में धारण करें। यह करना कठिन नहीं है। यथार्थ में यह प्रक्रिया, उन सभी धारणाओं की अपेक्षा, अतिसरल है जिनका हम साधारणतः अनुसरण करते हैं, एवं यह अनंताधिक मुक्ति दायक है। Read original article in English
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